Class 11 and 12 Hindi Abhivyakti Aur Madhyam NCERT Book Chapter Natak Likhne Ka Vyakran (Important Question)/ नाटक लिखने का व्याकरण Question Answer

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Class 11 and 12 Hindi Abhivyakti Aur Madhyam NCERT Book Chapter Natak Likhne Ka Vyakran (Important Question)/  नाटक लिखने का व्याकरण Question Answer


प्रश्न 1. नाटक किसे कहते हैं ?


उत्तर-साहित्य की वह विधा जिसके पढ़ने के साथ-साथ अभिनय भी किया जा सकता है उसे नाटक कहते हैं। भारतीय काव्य शास्त्र में नाटक को दृश्य काव्य माना जाता है। नाटक रंगमंच की एक प्रमुख विधा है। इसलिए इसे पढ़ा, सुना और देखा भी जा सकता है।

प्रश्न 2. नाटक में चित्रित पात्र कैसे होने चाहिए ?

उत्तर-नाटक में पात्रों का बहुत महत्त्व है नाटक में चित्रित पात्र निम्नलिखित प्रकार के होते हैं:-

(i) पात्र चरित्रवान होने चाहिए।

(ii) पात्र आदर्शवादी होने चाहिए।

(iii) पात्र अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के होने चाहिए।

(iv) पात्र जीवंत तथा जीवन से जुड़े होने चाहिए।

(v) पात्र सामाजिक परिवेश से जुड़े होने चाहिए।

(vi) पात्र कथानक से संबंधित होने चाहिए।

प्रश्न 3. नाटक की भाषा-शैली कैसी होनी चाहिए ?

उत्तर-नाटक की भाषा-शैली निम्नलिखित प्रकार की होनी चाहिए :-

(i) नाटक की भाषा-शैली सरल और सहज होनी चाहिए।

(ii) इसकी भाषा-शैली स्वाभाविक तथा प्रसंगानुकूल होनी चाहिए।

(iii) इसकी भाषा-शैली पात्रानुकूल होनी चाहिए।

(iv) इसकी भाषा-शैली विषयानुकूल होनी चाहिए।

(v) इसकी भाषा-शैली संवादों के अनुकूल होनी चाहिए।

(vi) इसकी भाषा-शैली सरस होनी चाहिए।

प्रश्न 4. नाटक और साहित्य की अन्य विधाओं में क्या अंतर है ? संक्षेप में बताइये। 

उत्तर-साहित्य में कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध आदि विधाएँ आती हैं। नाटक भी साहित्य की एक प्रमुख विधा है किंतु नाटक तथा अन्य विधाओं में बहुत अंतर है जो इस प्रकार है-

(i) नाटक को दृश्य काव्य कहा जाता है किसी अन्य विधा को नहीं।

(ii) नाटक रंगमंच की एक विधा है किसी अन्य विधाओं के अंतर्गत कोई रंगमंच नहीं आता।

(ii) नाटक का अभिनय होता है जबकि अन्य विधाओं का अभिनय नहीं हो सकता।

(iv) नाटक को पढ़ा, सुना तथा देखा जा सकता है जबकि अन्य विधाओं को केवल पढ़ा तथा सुना जा सकता है।

(v) नाटक में अभिनय का गुण विद्यमान होता है जबकि अन्य विधाओं में यह गुण नहीं होता।

(vi) नाटक का संबंध दर्शकों से है जबकि अन्य विधाओं का संबंध पाठकों से है।

(vii) नाटक एक 'दर्शनीय' विधा है जबकि अन्य पाठनीय विधाएँ हैं।

प्रश्न 5. नाटक के विभिन्न तत्वों पर प्रकाश डालिए।

उत्तर-नाटक की रचना में विभिन्न तत्वों का महत्त्वपूर्ण योगदान है जो निम्नलिखित है :


(i) कथानक / कथावस्तु-नाटक में जो कुछ कहा जाए उसे कथानक अथवा कथावस्तु कहते हैं। यह नाटक का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व है इसी के आधार पर नाटक को आरंभ, मध्य और समापन मुख्यतः तीन भागों में बांटा जा सकता है।


(it) पात्र योजना / चरित्र-चित्रण-यह नाटक का महत्त्वपूर्ण तत्व है। पात्रों के माध्यम से ही नाटककार कथानक को गतिशीलता प्रदान करता है। इनके माध्यम से ही यह नाटक का उद्देश्य स्पष्ट करता है। नाटक में एक प्रमुख पात्र तथा अन्य उसके सहायक पात्र होते हैं। प्रमुख पात्र को नायक अथवा नायिका कहते हैं।


(iii) संवाद योजना अथवा कथोपकथन-संवाद का शाब्दिक अर्थ है-परस्पर बातचीत अथवा नाटक में पात्रों की परस्पर बातचीत को संवाद अथवा कथोपकथन कहते हैं। संवाद योजना नाटक का प्रमुख तत्व है इसके बिना नाटक की कल्पना भी नहीं की जा सकती। संवाद ही कथानक को गतिशील बनाते हैं तथा पात्रों के चरित्र का उद्घाटन करते हैं। नाटक में संवाद योजना सहज, सरल, स्वाभाविक तथा पात्रानुकूल होना चाहिए।


(iv) अभिनेयता-यह नाटक का महत्त्वपूर्ण तत्व है। इसके द्वारा ही नाटक का मंच पर अभिनय किया जाता है। अभिनेयता के कारण ही नाटक अभिनय के योग्य बनता है।


(v) उद्देश्य-साहित्य की अन्य विधाओं के समान नाटक भी एक उद्देश्य पूर्ण रचना है। नाटककार अपने पात्रों के द्वारा इस उद्देश्य को स्पष्ट करता है।


(vi) भाषा-शैली-यह नाटक का महत्त्वपूर्ण तत्व है क्योंकि इसके माध्यम से ही नाटककार अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्त करता है। नाटक की भाषा-शैली सरल, सहज, स्वाभाविक, पात्रानुकूल तथा प्रसंगानुकूल होनी चाहिए।

प्रश्न 6. कथानक को कितने भागों में बाँटा गया है ?

उत्तर-कथानक को तीन भागों में बाँटा गया है-

(i) आरंभ, (ii) मध्य, (ii) समापन।

प्रश्न 7. नाटक में स्वीकार एवं अस्वीकार की अवधारणा से क्या तात्पर्य है ?

उत्तर-नाटक में स्वीकार के स्थान पर अस्वीकार का अधिक महत्त्व होता है। नाटक में स्वीकार तत्व के जाने से नाटक सशक्त हो जाता है। कोई भी दो चरित्र जब आपस में मिलते हैं तो विचारों के आदान-प्रदान में टकराहट पैदा होना स्वाभाविक है। रंगमंच में कभी भी यथास्थिति को स्वीकार नहीं किया जाता। वर्तमान स्थिति के प्रति असंतुष्टि, छटपटाहट, प्रतिरोध और अस्वीकार जैसे नकारात्मक तत्वों के समावेश से ही नाटक सशक्त बनता है। यही कारण है कि हमारे नाटककारों को राम की अपेक्षा रावण और प्रह्लाद की अपेक्षा हिरण्यकश्यप का चरित्र अधिक आकर्षित करता है। इसके विपरीत जब-जब किसी विचार, व्यवस्था या तात्कालिक समस्या को किसी नाटक में सहज स्वीकार किया गया है, वह नाटक अधिक सशक्त और लोगों के आकर्षण का केंद्र नहीं बन पाया है।





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