ग्यारहवीं काव्य-सौंदर्य

हे भूख मत मचल, हे मेरे जूही के फूल जैसे ईश्वर (काव्य-सौंदर्य /शिल्प-सौंदर्य)

चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती (काव्य-सौंदर्य /शिल्प-सौंदर्य)