Class 12 Hindi बाजार दर्शन Question Answer | NCERT Solutions | Aroh Bhag 2
कक्षा 12 हिंदी आरोह भाग-2 के पाठ 'बाजार दर्शन' के महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर यहाँ दिए गए हैं। यह पोस्ट Class 12 Hindi Bazaar Darshan Question Answer, NCERT Solutions Aroh Bhag 2, तथा बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए उपयोगी है।
बाजार दर्शन – प्रश्न अभ्यास (NCERT Textbook Solutions)
प्रश्न 1. बाजार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या क्या असर पड़ता है?
बाजार का जादू चढ़ने पर मनुष्य बाजार की आकर्षक वस्तुओं को खरीदने लगता है। जिनके मन खाली हैं तथा जिनके पास खरीदने की शक्ति अर्थात पर्चेजिंग पावर है। ऐसे लोग बाजार की चकाचौंध का शिकार हो जाते हैं और बाजार की अनावश्यक वस्तुएँ खरीदकर अपने मन की शांति भंग करते हैं। परंतु जब बाजार का जादू उतर जाता है तो उसे पता चलता है कि जो वस्तु उसने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए खरीदी थी, वह तो उसके आराम में बाधा उत्पन्न कर रही है।
प्रश्न 2. बाजार में भगत जी के व्यक्तित्व का कौनसा सशक्त पहलू उभर कर आता है?
भगत जी चौक बाजार में चारों और सब कुछ देखते हुए चलते हैं लेकिन वह बाजार की ओर आकृष्ट नहीं होते बल्कि संतुष्ट मन से सब कुछ देखते हुए चलते हैं। उन्हें तो केवल जीरा और काला नमक ही खरीदना होता है। उनके जीवन का यह सशक्त पहलू उभरकर सामने आता है निश्चय से भक्तिन का यह आचरण समाज में शांति स्थापित करने में मददगार हो सकता है यदि मनुष्य अपनी आवश्यकता के अनुसार वस्तुओं की खरीद करता है तो इससे बाजार में महंगाई भी नहीं बढ़ेगी और लोगों में संतोष की भावना उत्पन्न होगी।
प्रश्न 3. बाज़ारूपन से क्या तात्पर्य है?
बाजारूपन का अर्थ है- ओछापन। इसमें दिखावा अधिक होता है और आवश्यकता बहुत कम होती है। जिन लोगों में बाजारूपन होता है, वे बाजार को निरर्थक बना देते हैं; परंतु जो लोग आवश्यकता के अनुसार बाजार से वस्तु खरीदते हैं। वहीं बाजार को सार्थकता प्रदान करते हैं। ऐसे लोगों के कारण ही केवल वही वस्तुएँ बेची जाती हैं जिनकी लोगों को आवश्यकता होती है। ऐसी स्थिति में बाजार हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन बनता है। भगत जी जैसे लोग जानते हैं कि उन्हें बाजार से क्या खरीदना है । अतः ऐसे लोग ही बाजार को सार्थक बनाते हैं।
प्रश्न 4. बाजार किसी का लिंग, जाति, धर्म, क्षेत्र नहीं देखता; बस देखता है सिर्फ उसकी क्रय शक्ति को। आप कहाँ तक सहमत हैं?
यह कहना सही है कि बाजार किसी का लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र नहीं देखता। बाजार यह नहीं पूछता कि आप किस जाति, धर्म से संबंधित है वह तो केवल ग्राहक को महत्त्व देता है। ग्राहक के पास पैसे होने चाहिए, वह उसका स्वागत करता है। इस दृष्टि में बाजार निश्चय से सामाजिक समता की रचना करता है क्योंकि बाजार के समक्ष चाहे ब्राह्मण हो या निम्न जाति का व्यक्ति; मुसलमान हो या इसाई, सब बराबर है। वे ग्राहक के सिवाय कुछ नहीं है और इस दृष्टि से मैं पूर्णतया सहमत हूँ।
प्रश्न 5. (परीक्षोपयोगी नहीं है)
क. जब पैसा शक्ति के परिचायक के रूप में प्रतीत हुआ।
जब बड़ा से बड़ा अपराधी अपने पैसे की शक्ति से निर्दोष साबित कर दिया जाता है तब हमें पैसा शक्ति के परिचायक के रूप में प्रतीत होता है।
ख. जब पैसे की शक्ति काम नहीं आई।
असाध्य बीमारी के आगे पैसे की शक्ति काम नहीं आती है।
जब बड़ा से बड़ा अपराधी अपने पैसे की शक्ति से निर्दोष साबित कर दिया जाता है तब हमें पैसा शक्ति के परिचायक के रूप में प्रतीत होता है।
ख. जब पैसे की शक्ति काम नहीं आई।
असाध्य बीमारी के आगे पैसे की शक्ति काम नहीं आती है।
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Sir ji second question ke answer me भक्तिन kya kar rhi hai ??
ReplyDeleteRithik
DeleteBhagat ji ko bhkatin bola gya h
Deletekutte
ReplyDeleteBhaktin se sir kuch jyada lagav ho gya lagta hai😂
ReplyDeleteMaterjiii keshav kalwaii
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