आत्मत्राण : सप्रसंग व्याख्या (Atmatran Class 10 Explanation)
नमस्कार विद्यार्थियों! आज के इस ब्लॉग पोस्ट में हम कक्षा 10वीं हिंदी (स्पर्श भाग-2) की अत्यंत दार्शनिक और प्रेरणादायक कविता 'आत्मत्राण' का भावार्थ समझेंगे। इसके रचयिता नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ ठाकुर हैं। 'आत्मत्राण' का अर्थ है—आत्मा की रक्षा या अपना बचाव। इस प्रार्थना में कवि ईश्वर से यह नहीं माँगते कि उनके दुख दूर कर दो, बल्कि वे उन दुखों को सहने की शक्ति माँगते हैं।
कविता का सार (Summary of Atmatran)
कवि ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वे उन्हें विपत्तियों (मुसीबतों) से बचाएं नहीं, बल्कि विपत्तियों से न डरने की शक्ति दें। वे दुखों में सांत्वना नहीं चाहते, बल्कि दुखों पर विजय पाने का आत्मविश्वास चाहते हैं। कवि कहते हैं कि यदि कोई मदद न मिले, तो भी उनका अपना बल कम न हो। यदि दुनिया उन्हें धोखा दे, तो भी वे हार न मानें। अंत में कवि कहते हैं कि सुख के दिनों में तो वे ईश्वर को याद रखें ही, लेकिन दुख के दिनों में भी उनके मन में ईश्वर के प्रति कोई संदेह (शक) पैदा न हो।
पद्यांश 1: विपदाओं में निर्भयता
विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं;
केवल इतना हो (करुणामय), कभी न विपदा में पाऊँ भय।
दुख-ताप से व्यथित चित्त को न दो सांत्वना नहीं सही,
पर इतना होवे (करुणामय), दुख को मैं कर सकूँ सदा जय।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- विपदा : मुसीबत / संकट
- करुणामय : दयालु (ईश्वर)
- दुख-ताप : दुख की पीड़ा
- व्यथित : दुखी / पीड़ित
- चित्त : मन / हृदय
- सांत्वना : तसल्ली / दिलासा
- जय : विजय / जीत
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
कवि रवींद्रनाथ ठाकुर कहते हैं— "हे करुणामय ईश्वर! मेरी आपसे यह प्रार्थना बिल्कुल नहीं है कि आप मुझे मुसीबतों (विपदाओं) से बचा लें या मेरे जीवन से दुख दूर कर दें। मैं तो बस इतना चाहता हूँ कि जब मुझ पर मुसीबत आए, तो मैं उससे डरूँ नहीं (निर्भय रहूँ)।
यदि मेरे दुखी मन को आप सांत्वना (दिलासा) नहीं देते, तो कोई बात नहीं। लेकिन हे प्रभु! मुझे इतनी शक्ति जरूर देना कि मैं अपने दुखों पर विजय प्राप्त कर सकूँ (उन्हें हरा सकूँ)। मैं दुखों से घबराकर हार न मानूँ।"
विशेष (Vishesh):
- यह एक अपरंपरागत (Unconventional) प्रार्थना है।
- आत्मविश्वास और स्वावलंबन (Self-reliance) का भाव है।
- भाषा संस्कृतनिष्ठ हिंदी (खड़ी बोली) है।
पद्यांश 2: आत्मबल और धोखा
कोई कहीं सहायक न मिले, तो अपना बल पौरुष न हिले;
हानि उठानी पड़े जगत् में लाभ अगर वंचना रही,
तो भी मन में न मानूँ क्षय।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- सहायक : मददगार
- पौरुष : शक्ति / पराक्रम / आत्मबल
- वंचना : धोखा / छल
- क्षय : नाश / हार / कमी
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
कवि प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! यदि मुसीबत के समय मुझे कोई मददगार (सहायक) न मिले, तो भी मेरा अपना आत्मबल (पौरुष) डगमगाना नहीं चाहिए। मैं अकेला ही संघर्ष कर सकूँ।
अगर इस संसार में मुझे बार-बार हानि उठानी पड़े और लाभ के बदले केवल धोखा (वंचना) ही मिले, तब भी मेरा मन निराश न हो। मैं मन में यह न मान लूँ कि मेरा सब कुछ नष्ट (क्षय) हो गया है। मैं हार न मानूँ और संघर्ष करता रहूँ।
विशेष (Vishesh):
- 'बल-पौरुष' में आत्मशक्ति का महत्व बताया गया है।
- निराशा में भी आशा बनाए रखने का संदेश है।
पद्यांश 3: भार वहन करने की शक्ति
मेरा त्राण करो अनुदिन तुम यह मेरी प्रार्थना नहीं;
बस इतना होवे (करुणामय), तरने की हो शक्ति अनामय।
मेरा भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही।
केवल इतना रखना अनुनय—
वहन कर सकूँ इसको निर्भय।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- त्राण : रक्षा / बचाव
- अनुदिन : प्रतिदिन / हर रोज
- तरने की : पार करने की (भवसागर से)
- अनामय : रोग रहित / स्वस्थ / अटूट शक्ति
- लघु : कम / हल्का
- अनुनय : विनती / प्रार्थना
- वहन कर सकूँ : उठा सकूँ / सह सकूँ
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
कवि कहते हैं— "हे प्रभु! मेरी यह प्रार्थना नहीं है कि आप हर रोज (अनुदिन) आकर मेरी रक्षा (त्राण) करें। मैं बस इतना चाहता हूँ कि मुझमें इस संसार रूपी सागर को पार करने (तरने) की स्वस्थ और अटूट शक्ति (अनामय) हो।
मैं आपसे यह भी नहीं कहता कि आप मेरे जीवन के भार (जिम्मेदारियों/कष्टों) को कम (लघु) कर दें या मुझे तसल्ली दें। मेरी तो बस इतनी सी विनती (अनुनय) है कि आप मुझे इतनी शक्ति दें कि मैं जीवन के इस भार को बिना डरे (निर्भय होकर) उठा सकूँ।"
पद्यांश 4: सुख और दुख में ईश्वर स्मरण
नत शिर होकर सुख के दिन में तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।
दुख-रात्रि में करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही
उस दिन ऐसा हो करुणामय,
तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- नत शिर : सिर झुकाकर
- तव : तुम्हारा
- छिन-छिन : पल-पल / हर क्षण
- दुख-रात्रि : दुख भरी रात
- निखिल मही : पूरी धरती / सारी दुनिया
- संशय : शक / संदेह
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
कवि कहते हैं कि सुख के दिनों में मैं सिर झुकाकर (विनम्रता के साथ) आपको हर पल याद रखूँ और हर क्षण आपकी छवि को पहचानूँ (अर्थात सुख में आपको भूल न जाऊँ)।
लेकिन, जब मेरे जीवन में दुख की काली रात आए और पूरी दुनिया (निखिल मही) मुझे धोखा दे दे, उस दिन भी हे करुणामय! मुझ पर इतनी कृपा करना कि मेरे मन में आपके प्रति कोई संदेह (शक) पैदा न हो। मैं यह न सोचूँ कि ईश्वर ने मुझे दुख क्यों दिया। मेरा विश्वास आप पर हमेशा अटल रहे।
विशेष (Vishesh):
- सुख और दुख दोनों परिस्थितियों में ईश्वर को याद रखने का संदेश है।
- 'दुख-रात्रि' में रूपक अलंकार है।
- ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास और समर्पण का भाव है।
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