देवसेना का गीत / कार्नेलिया का गीत : सप्रसंग व्याख्या
नमस्कार विद्यार्थियों! आज के इस ब्लॉग पोस्ट में हम कक्षा 12वीं हिंदी (अंतरा भाग-2) के पहले पाठ का अध्ययन करेंगे। इसमें छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद की दो प्रसिद्ध कविताएँ शामिल हैं। पहली कविता 'देवसेना का गीत' उनके नाटक 'स्कंदगुप्त' से ली गई है और दूसरी 'कार्नेलिया का गीत' उनके नाटक 'चंद्रगुप्त' से ली गई है।
कविता 1: देवसेना का गीत (Devsena Ka Geet)
कविता का सार (Summary)
यह गीत जयशंकर प्रसाद के नाटक 'स्कंदगुप्त' से लिया गया है। देवसेना, मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन है। हूणों के आक्रमण में उसका पूरा परिवार वीरगति को प्राप्त हो जाता है। वह स्कंदगुप्त से प्रेम करती थी, लेकिन स्कंदगुप्त का मन किसी और (विजया) पर था। जीवन के अंतिम पड़ाव में, जब स्कंदगुप्त उसे स्वीकार करना चाहता है, तो वह इनकार कर देती है। इस गीत में देवसेना अपने जीवन की असफलताओं, वेदना और संघर्षों का मार्मिक वर्णन कर रही है। वह अपनी पुरानी अभिलाषाओं को विदाई दे रही है।
पद्यांश 1: वेदना और भ्रम
आह! वेदना मिली विदाई!
मैंने भ्रम-वश जीवन-संचित,
मधुकरियों की भीख लुटाई।
छल-छल थे संध्या के श्रम-कण,
आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण,
मेरी यात्रा पर लेती थी
नीरवता अनंत अँगड़ाई।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- वेदना : पीड़ा / दर्द
- भ्रम-वश : धोखे में रहकर / नादानी में
- जीवन-संचित : जीवन भर इकट्ठी की हुई (पूँजी/आशाएँ)
- मधुकरियों : पके हुए अन्न की भिक्षा (यहाँ प्रेम और आशाएँ)
- श्रम-कण : पसीने की बूँदें / थकान
- नीरवता : सन्नाटा / खामोशी
प्रसंग (Context):
देवसेना अपने जीवन की ढलती हुई शाम (वृद्धावस्था) में अपने अतीत को याद करते हुए अपने दुखों को व्यक्त कर रही है।
व्याख्या (Explanation):
देवसेना कहती है— "आह! जीवन के अंतिम समय में मुझे विदाई के रूप में सिर्फ वेदना (दर्द) ही मिली है। मैंने जवानी में भ्रम के कारण या नादानी में जो प्रेम और आशाएँ इकट्ठी की थीं (जीवन-संचित पूँजी), उसे मैंने आज भिक्षा (भीख) की तरह लुटा दिया है। (अर्थात मेरा प्रेम सफल नहीं हुआ)।"
वह कहती है कि अब मेरे जीवन की शाम हो गई है। दुख और संघर्ष के कारण मेरी आँखों से पसीने और आँसुओं की धारा बह रही है। मेरी इस जीवन यात्रा में मेरे साथ कोई नहीं था, केवल 'सन्नाटा' (नीरवता) ही मेरे साथ चल रहा था। मेरा जीवन अकेलेपन में ही बीता।
विशेष (Vishesh):
- 'आँसू-से गिरते थे' में उपमा अलंकार है।
- 'नीरवता अनंत अँगड़ाई' में मानवीकरण अलंकार है।
- छायावादी शैली और तत्सम प्रधान खड़ी बोली का प्रयोग है।
पद्यांश 2: जवानी की गलतियाँ और प्रलय
श्रमित स्वप्न की मधुमाया में,
गहन-विपिन की तरु-छाया में,
पथिक उनींदी श्रुति में किसने
यह विहाग की तान उठाई?
लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी,
रही बचाए फिरती कबकी,
मेरी आशा आह! बावली,
तूने खो दी सकल कमाई।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- श्रमित : थका हुआ
- गहन-विपिन : घना जंगल
- उनींदी : नींद से भरी हुई / अर्धनिद्रा
- विहाग : आधी रात को गाया जाने वाला एक राग (दुख भरा गीत)
- सतृष्ण दीठ : प्यासी/लालची नज़रें
- सकल : सारी / पूरी
प्रसंग (Context):
स्कंदगुप्त द्वारा विवाह का प्रस्ताव मिलने पर देवसेना को पुरानी पीड़ा याद आ जाती है। वह इसे असमय आया हुआ प्रस्ताव मानती है।
व्याख्या (Explanation):
देवसेना कहती है कि मैं जीवन भर के संघर्षों से थक चुकी हूँ। जैसे कोई थका हुआ यात्री घने जंगल में पेड़ की छाया में सपने देखते हुए ऊँघ रहा हो, और तभी कोई आधी रात का राग 'विहाग' (विरह गीत) छेड़ दे, तो उसे अच्छा नहीं लगता। वैसे ही, अब जीवन के अंत में स्कंदगुप्त का प्रेम प्रस्ताव मुझे इस 'विहाग' राग जैसा बेसुरा और दुखदायी लग रहा है।
वह कहती है कि जवानी में सबकी प्यासी (लालची) नज़रें मुझ पर टिकी थीं, मैं बड़ी मुश्किल से खुद को बचाती रही। लेकिन 'आह! मेरी पागल आशा' (स्कंदगुप्त को पाने की चाह), तूने आज मेरी जीवन भर की तपस्या (सकल कमाई) खो दी। अर्थात, अब मैं टूट चुकी हूँ।
विशेष (Vishesh):
- 'आशा आह! बावली' में मानवीकरण है।
- करुण रस की प्रधानता है।
पद्यांश 3: प्रलय और समर्पण
चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर,
प्रलय चल रहा अपने पथ पर,
मैंने निज दुर्बल पद-बल पर,
उससे हारी-होड़ लगाई।
लौटा लो यह अपनी 'थाती',
मेरी करुणा हा-हा खाती,
विश्व! न सँभलेगी यह मुझसे,
इससे मन की लाज गँवाई।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- जीवन-रथ : जीवन रूपी रथ
- प्रलय : विनाश / मुसीबतें
- दुर्बल पद-बल : कमजोर पैरों की ताकत
- हारी-होड़ : ऐसी प्रतियोगिता जिसमें हार निश्चित हो
- थाती : धरोहर / अमानत (प्रेम)
- हा-हा खाती : चीख रही है / हार मान रही है
व्याख्या (Explanation):
देवसेना कहती है कि मेरे जीवन रूपी रथ पर सवार होकर 'प्रलय' (विनाश/दुख) मेरे साथ-साथ चल रहा है। मैं जानती हूँ कि मैं कमजोर हूँ, फिर भी मैंने प्रलय से एक ऐसी होड़ (मुकाबला) लगाई जिसमें मेरी हार निश्चित थी। (अर्थात मैंने जीवन भर मुसीबतों का सामना किया)।
अंत में वह दुनिया (या स्कंदगुप्त) से कहती है— "हे विश्व! तुम यह अपनी प्रेम की अमानत (थाती) वापस ले लो। अब यह मुझसे सँभाली नहीं जाती। मेरा दर्द अब चीख रहा है। इस प्रेम को पाने की चाह में मैंने अपने मन की लाज (शर्म/शांति) भी गँवा दी है। अब मैं और दुख नहीं सह सकती।"
विशेष:
- 'जीवन-रथ' में रूपक अलंकार है।
- 'प्रलय चल रहा अपने पथ पर' में मानवीकरण है।
- वेदना की चरम सीमा (Climax) है।
कविता 2: कार्नेलिया का गीत (Cornelia Ka Geet)
कविता का सार (Summary)
यह गीत जयशंकर प्रसाद के नाटक 'चंद्रगुप्त' से लिया गया है। कार्नेलिया सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस की बेटी है। वह सिंधु नदी के किनारे बैठी है और भारत की प्राकृतिक सुंदरता और यहाँ की संस्कृति पर मुग्ध होकर यह गीत गाती है। वह भारत को 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' कहकर अपनाती है। कविता में भारत के सूर्योदय, प्राकृतिक सुषमा और यहाँ के लोगों की दयालुता का वर्णन है।
पद्यांश 1: भारत की प्राकृतिक सुषमा
अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।
सरस तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर, मंगल कुंकुम सारा।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- अरुण : लालिमा युक्त / सूर्य की रोशनी
- मधुमय : मिठास से भरा / प्रेमपूर्ण
- क्षितिज : वह स्थान जहाँ धरती-आकाश मिलते हुए दिखें
- तामरस : कमल (Lotus)
- विभा : चमक / रोशनी
- तरुशिखा : पेड़ों की चोटियाँ
- कुंकुम : रोली / सिन्दूर (यहाँ प्रातःकालीन लालिमा)
प्रसंग (Context):
कार्नेलिया भारत के सूर्योदय के दृश्य को देखकर मोहित हो गई है और भारत की प्रशंसा कर रही है।
व्याख्या (Explanation):
कार्नेलिया कहती है— "यह भारत देश लालिमा और मिठास से भरा हुआ है। यह वह देश है जहाँ अनजान क्षितिज (Horizon) को भी सहारा मिलता है (अर्थात यहाँ दूर-दराज से आए अजनबियों को भी अपनापन और आश्रय मिलता है)।"
सूर्योदय का वर्णन करते हुए वह कहती है कि तालाबों में खिले हुए कमलों (तामरस) पर जब सूर्य की लाल किरणें पड़ती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे पेड़ों की चोटियाँ खुशी से नाच रही हों। चारों ओर फैली हरियाली पर जब सुबह की लालिमा पड़ती है, तो ऐसा लगता है मानो किसी ने पूरी धरती पर पवित्र 'मंगल कुंकुम' (सिन्दूर) बिखेर दिया हो।
विशेष (Vishesh):
- 'मधुमय देश' में भारत की सांस्कृतिक मिठास का संकेत है।
- प्राकृतिक सौंदर्य का सजीव चित्रण (Visual Imagery) है।
- 'अनजान क्षितिज' के माध्यम से भारत की अतिथि देवो भवः परंपरा दिखाई गई है।
पद्यांश 2: पक्षियों का घर और भारतीयों की करुणा
लघु सुरधनु से पंख पसारें, शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए, समझ नीड़ निज प्यारा।
बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनंत की, पाकर जहाँ किनारा।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- लघु सुरधनु : छोटे इंद्रधनुष (Rainbow)
- मलय समीर : चंदन की सुगंधित हवा
- खग : पक्षी
- नीड़ : घोंसला / घर
- अनंत : जिसका अंत न हो (समुद्र)
व्याख्या (Explanation):
कार्नेलिया कहती है कि छोटे-छोटे इंद्रधनुष जैसे रंगीन पंख फैलाकर पक्षी भी शीतल और सुगंधित हवा (मलय समीर) के सहारे जिस दिशा की ओर उड़ते हैं, वह भारत ही है। पक्षी भी इसे अपना प्यारा घोंसला (नीड़) मानकर यहाँ लौटते हैं। (भाव यह है कि यह देश शांति और सुरक्षा का प्रतीक है)।
वह आगे कहती है कि यहाँ के लोगों की आँखों में करुणा (दया) का भाव हमेशा भरा रहता है। जैसे बादल बरसकर प्यास बुझाते हैं, वैसे ही यहाँ के लोगों की आँखें दूसरों के दुख में आँसू बहाती हैं (बरसाती आँखों के बादल)।
विशाल समुद्र की लहरें भी, जो अनंत से आती हैं, उन्हें भी भारत के तट पर आकर ही किनारा और शांति मिलती है।
विशेष (Vishesh):
- 'लघु सुरधनु से पंख' में उपमा अलंकार है।
- 'आँखों के बादल' में रूपक अलंकार है।
- राष्ट्रीय चेतना और देशप्रेम का भाव प्रबल है।
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