Raidas Ke Pad in Hindi Class 9 Explanation | Ab Kaise Chhute Ram Naam Rat Lagi | रैदास के पद Ncert Class 9

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रैदास के पद : सप्रसंग व्याख्या (Raidas Ke Pad Class 9 Explanation)

नमस्कार दोस्तों! आज के इस ब्लॉग पोस्ट में हम कक्षा 9वीं हिंदी (स्पर्श भाग-1) के पाठ 'रैदास के पद' (Raidas ke Pad) का सरल और सटीक अर्थ समझेंगे। अगर आप परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो यह व्याख्या (Vyakhya), शब्दार्थ (Word Meanings) और विशेष (Vishesh) आपके लिए बहुत उपयोगी साबित होंगे।



कविता का सार (Summary of Raidas Ke Pad)

संत रैदास (Raidas) भक्तिकालीन कवियों में प्रमुख स्थान रखते हैं। पहले पद में रैदास जी ने बताया है कि वे अपने आराध्य (ईश्वर) से किस प्रकार जुड़े हुए हैं। वे ईश्वर को चंदन और खुद को पानी, ईश्वर को दीपक और खुद को बाती बताते हैं। दूसरे पद में उन्होंने ईश्वर की कृपालुता और समानता के भाव का वर्णन किया है कि कैसे भगवान ने नीची जाति के लोगों को भी ऊँचा स्थान प्रदान किया है।


पद 1: अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी

अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी।
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै रैदासा।।

शब्दार्थ (Word Meanings):

  • रट : आदत / लत
  • बास : सुगंध / महक
  • समानी : समा जाना / बस जाना
  • घन : बादल
  • चितवत : देखना / निहारना
  • बरै : जलना
  • सुहागा : सोने को शुद्ध करने वाला पदार्थ
  • दासा : सेवक / नौकर

प्रसंग (Context):

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'स्पर्श भाग-1' से ली गई हैं। इसके रचयिता प्रसिद्ध संत कवि रैदास हैं। इन पंक्तियों में कवि ने अपने और ईश्वर के बीच के अटूट प्रेम और भक्ति को विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से दर्शाया है।

व्याख्या (Explanation):

संत रैदास कहते हैं कि हे प्रभु! मुझे तुम्हारे नाम की रट (आदत) लग गई है, जो अब किसी भी तरह छूट नहीं सकती। वे अपनी भक्ति का वर्णन करते हुए कहते हैं:

  • चंदन और पानी: हे प्रभु! आप चंदन हैं और मैं पानी हूँ। जिस प्रकार पानी में चंदन मिलने से उसकी सुगंध पानी की बूँद-बूँद में समा जाती है, वैसे ही आपकी भक्ति मेरे अंग-अंग में समा गई है।
  • बादल और मोर: आप आकाश में छाए काले बादलों के समान हैं और मैं जंगल में नाचने वाला मोर हूँ। जिस प्रकार बरसात के बादलों को देखकर मोर खुशी से नाचने लगता है, वैसे ही मैं आपको देखकर प्रसन्न होता हूँ।
  • चाँद और चकोर: मेरा आपकी ओर देखना वैसा ही है, जैसे चकोर पक्षी बिना पलक झपकाए चाँद को निहारता रहता है।
  • दीपक और बाती: हे प्रभु! आप दीपक हैं और मैं उस दीपक की बाती हूँ, जिसकी लौ (ज्योति) दिन-रात जलती रहती है और प्रकाश फैलाती है।
  • मोती और धागा: आप मोती के समान उज्ज्वल और पवित्र हैं और मैं उस धागे के समान हूँ जिसमें मोती पिरोए जाते हैं। हमारा मिलन सोने और सुहागे के मिलन जैसा पवित्र है (जिससे सोना और निखर जाता है)।
भावार्थ (Core Meaning): अंत में रैदास जी कहते हैं कि हे प्रभु! आप मेरे स्वामी (मालिक) हैं और मैं आपका दास (सेवक) हूँ। मैं आपके चरणों में इसी प्रकार की 'दास्य भक्ति' करता हूँ।

विशेष (Vishesh / Kavya Saundarya):

  • कवि ने ईश्वर के प्रति 'दास्य भाव' की भक्ति प्रकट की है।
  • भाषा सरल और ब्रज भाषा का प्रभाव है, जिसमें राजस्थानी और अवधी के शब्द भी हैं।
  • उपमा और रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग किया गया है (जैसे: तुम चंदन हम पानी)।
  • 'अँग-अँग' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

पद 2: ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै

ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै।
गरीब निवाजु गुसईया मेरा माथै छत्रु धरै।।
जाकी छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढरै।
नीचहु ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै।।
नामदेव कबीरू तिलोचनु सधना सैनु तरै।
कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरिजीउ ते सभै सरै।।

शब्दार्थ (Word Meanings):

  • लाल : स्वामी / ईश्वर
  • गरीब निवाजु : गरीबों पर दया करने वाला
  • गुसईया : स्वामी / मालिक
  • माथै छत्रु धरै : मस्तक पर राजाओं जैसा मुकुट रखना (सम्मान देना)
  • छोति : छुआछूत / अस्पृश्यता
  • ढरै : दया करना / द्रवित होना
  • तरै : तर जाना / मोक्ष प्राप्त करना
  • सरै : सब कुछ संभव होना

प्रसंग (Context):

इन पंक्तियों में संत रैदास जी ने ईश्वर की अपार उदारता और समदर्शी स्वभाव का वर्णन किया है। वे बताते हैं कि भगवान ऊँच-नीच का भेद नहीं करते और समाज में तिरस्कृत लोगों को भी सम्मान दिलाते हैं।

व्याख्या (Explanation):

रैदास जी अपने प्रभु की महिमा का गुणगान करते हुए कहते हैं:

"हे मेरे स्वामी (लाल)! तुम्हारे सिवा ऐसा कृपालु कार्य कौन कर सकता है? तुम 'गरीब निवाजु' हो, अर्थात गरीबों और दीन-दुखियों पर दया करने वाले हो। तुमने मुझ जैसे तुच्छ व्यक्ति के माथे पर राजाओं जैसा छत्र रख दिया है, यानी मुझे समाज में बहुत ऊँचा सम्मान दिया है।"

कवि आगे कहते हैं कि जिस नीच जाति के व्यक्ति को छूने मात्र से संसार के लोग खुद को अपवित्र मानते हैं (छुआछूत करते हैं), उस पर केवल तुम ही द्रवित होते हो (दया करते हो)। हे गोविंद! तुम नीच से नीच प्राणी को भी ऊँचा पद प्रदान करते हो और ऐसा करने में तुम किसी से नहीं डरते हो।

भावार्थ (Core Meaning): अपनी बात को सिद्ध करने के लिए रैदास जी उदाहरण देते हैं कि नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, सधना और सैन जैसे निम्न कुल के संत भी तुम्हारी कृपा से इस भवसागर को पार कर गए और महान बन गए। अंत में रैदास कहते हैं— "हे संतो! सुनो, मेरे हरि जी (प्रभु) सब कुछ करने में समर्थ हैं, उनसे सब कुछ संभव है।"

विशेष (Vishesh):

  • ईश्वर को समदर्शी और 'गरीब निवाज' बताया गया है।
  • तत्कालीन समाज में व्याप्त छुआछूत और ऊँच-नीच का विरोध किया गया है।
  • भाषा में ब्रज, अवधी और राजस्थानी शब्दों का सुंदर मिश्रण है।
  • अनुप्रास अलंकार की छटा देखने को मिलती है।
  • भक्ति रस की प्रधानता है।

आशा है कि आपको Class 9 Hindi Raidas Ke Pad Explanation समझ आ गई होगी। यदि आपके कोई प्रश्न हैं, तो कमेंट बॉक्स में जरूर पूछें।

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