घनानंद (कवित्त / सवैये) : सप्रसंग व्याख्या
नमस्कार विद्यार्थियों! आज के इस ब्लॉग पोस्ट में हम कक्षा 12वीं हिंदी (अंतरा भाग-2) के पाठ 11 का अध्ययन करेंगे। इसमें 'प्रेम की पीर' (Pain of Love) के कवि घनानंद के कवित्त और सवैये संकलित हैं। घनानंद का प्रेम अपनी प्रेमिका 'सुजान' के प्रति अनन्य और एकतरफा है। इन पदों में वे अपनी विरह-वेदना और सुजान की निष्ठुरता का उलाहना दे रहे हैं।
कविता का सार (Summary)
पहले कवित्त में: घनानंद कहते हैं कि सुजान के दर्शन की आस में ही मेरे प्राण अब तक अटके हुए हैं। मेरे प्राण कंठ तक आ गए हैं, वे बस एक बार सुजान को देखना चाहते हैं ताकि वे सुखपूर्वक शरीर छोड़ सकें।
दूसरे सवैये में: कवि सुजान की निष्ठुरता का वर्णन करते हैं। सुजान जानबूझकर कवि की ओर नहीं देखतीं और अनजान बनी रहती हैं। कवि कहते हैं कि देखता हूँ, तुम कब तक मेरी पुकार को अनसुना करोगी। मेरा मौन भी एक दिन तुम्हें पुकारने पर मजबूर कर देगा।
कवित्त 1: बहुत दिनान को अवधि आसपास...
बहुत दिनान को अवधि आसपास परे,
खरे अरबरनि भरे हैं उठि जान को。
कहि कहि आवन छबीले मनभावन को,
गहि गहि राखति ही दै दै सनमान को。
झूठी बतियानि की पत्यानि तें उदास ह्वै कै,
अब ना घिरत घन आनंद निदान को。
अधर लगे हैं आनि करि कै पयान प्रान,
चाहत चलन ये सँदेसो लै सुजान को।।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- अवधि : समय / मिलने की तारीख
- खरे : बहुत अधिक / सचमुच
- अरबरनि : घबराहट / व्याकुलता
- गहि गहि : पकड़-पकड़ कर / रोक कर
- पत्यानि : विश्वास / भरोसा
- अधर : होंठ
- पयान : प्रस्थान / जाना
- सुजान : घनानंद की प्रेमिका (और श्री कृष्ण)
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
घनानंद कहते हैं कि सुजान के आने की जो अवधि (समय) तय थी, वह बीत चुकी है। बहुत दिन हो गए हैं, लेकिन वह नहीं आई। अब मेरे प्राण शरीर से निकलने के लिए (उठि जान को) पूरी तरह व्याकुल (अरबरनि) और तैयार खड़े हैं।
अब तक तो मैंने अपने प्राणों को सुजान के आने की झूठी तसल्ली और सम्मान देकर (दै दै सनमान को) बड़ी मुश्किल से रोक रखा था। लेकिन अब तुम्हारी झूठी बातों पर विश्वास करके मेरा मन उदास हो गया है। अब आनंद के बादल (घनआनंद) नहीं घिरते, यानी कोई खुशी नहीं बची।
अंत में कवि कहते हैं कि अब मेरे प्राण शरीर छोड़कर जाने ही वाले हैं, वे मेरे होठों (अधर) पर आकर अटक गए हैं। ये प्राण सिर्फ इसलिए रुके हैं क्योंकि ये मरते समय एक आखिरी बार 'सुजान' का संदेशा (या दर्शन) लेकर ही जाना चाहते हैं।
विशेष (Vishesh):
- 'अधर लगे हैं आनि...' मुहावरे का सुंदर प्रयोग है (प्राण कंठगत होना)।
- 'कहि-कहि', 'दै-दै' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
- भाषा: साहित्यिक ब्रज भाषा।
- विरह की अतिशयोक्तिपूर्ण (Hyperbolic) व्यंजना है।
सवैया 2: आनाकानी आरसी निहारिबो...
आनाकानी आरसी निहारिबो करौगो कोल,
काहा मो चकित दसा त्यों दीठि डोलिहै।
मौन हूँ सो देखिहौं किधौं कै पन पालिहौ जू,
कूक भरी मूकता बुलाय आप बोलिहै।।
जान घनआनंद यों मोहि तुम्हें पैज परी,
जानिएगो टेक टरे कौन धौं मलोलिहै।
रुई दिए रहोगे कहाँ लौं बहरायबे की,
कबहूँ तौ मेरिए पुकार कान खोलिहै।।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- आनाकानी : टालमटोल / अनदेखा करना
- आरसी : आईना / दर्पण
- कोल : कब तक
- दीठि : नज़र / दृष्टि
- मूकता : मौन / चुप्पी
- पैज परी : होड़ लगना / शर्त लगना
- बहरायबे : बहरा बनना
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
घनानंद सुजान से कहते हैं कि तुम कब तक मेरी तरफ देखने से 'आनाकानी' (इनकार) करती रहोगी और आईने (आरसी) में खुद को ही निहारती रहोगी? तुम मेरी हैरान-परेशान (चकित) दशा को देखकर कब तक अपनी नज़रें फेरती रहोगी?
मैं भी देखता हूँ कि तुम अपने 'मौन रहने' के प्रण (प्रतिज्ञा) को कब तक पालती हो। मेरे अंदर की 'कूक भरी मूकता' (पीड़ा भरी चुप्पी) इतनी प्रभावशाली है कि वह तुम्हें खुद बुलाकर बोलने पर मजबूर कर देगी।
कवि कहते हैं कि हे सुजान! मुझमें और तुममें यह जिद्द (पैज) पड़ गई है। अब देखते हैं कि किसका प्रण टूटता है और कौन हार मानता है। तुम कब तक अपने कानों में रूई डालकर बहरे होने का नाटक करती रहोगी? कभी न कभी तो मेरी दर्द भरी पुकार तुम्हारे कानों को खोल ही देगी (तुम्हें पिघला ही देगी)।
विशेष (Vishesh):
- 'कूक भरी मूकता' में विरोधाभास अलंकार है (चुप्पी में भी आवाज़)।
- 'कानों में रूई देना' मुहावरे का प्रयोग है।
- प्रेमी के आत्मविश्वास और एकनिष्ठता का चित्रण है।
उम्मीद है कि आपको Class 12 Hindi Ghananand Ke Kavitt Explanation का यह लेख पसंद आया होगा। इसे अपने सहपाठियों के साथ शेयर जरूर करें।

If you have any doubts, Please let me know