रहीम के दोहे : सप्रसंग व्याख्या (Rahim Ke Dohe Class 9 Explanation)
नमस्कार विद्यार्थियों! आज के इस ब्लॉग पोस्ट में हम कक्षा 9वीं हिंदी (स्पर्श भाग-1) के पाठ 9 'रहीम के दोहे' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। रहीम दास जी अपने नीतिपरक दोहों के लिए प्रसिद्ध हैं। यहाँ परीक्षा की तैयारी के लिए हर दोहे का शब्दार्थ, प्रसंग, व्याख्या, भावार्थ और विशेष दिया गया है।
दोहों का सार (Summary of Rahim Ke Dohe)
रहीम जी ने अपने दोहों में जीवन के व्यावहारिक ज्ञान और नैतिकता की शिक्षा दी है। वे बताते हैं कि प्रेम के रिश्तों को संभालकर रखना चाहिए, अपने मन के दुख को छिपाकर रखना चाहिए और छोटे से छोटे व्यक्ति या वस्तु का भी सम्मान करना चाहिए। उन्होंने परोपकार, विनम्रता, गिरगिट जैसे लोगों से दूरी और आत्म-सम्मान के महत्व को बहुत ही सरल उदाहरणों (जैसे सुई, धागा, पानी, दूध) के माध्यम से समझाया है।
दोहा 1: रहिमन धागा प्रेम का...
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय।।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- चटकाय : झटके से / जानबूझकर
- परि जाय : पड़ जाती है
- गाँठ : दरार / अविश्वास
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत दोहा हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
रहीम दास जी कहते हैं कि प्रेम का रिश्ता एक नाजुक धागे के समान होता है। इसे कभी भी गुस्से में या झटके से नहीं तोड़ना चाहिए। जिस प्रकार धागा एक बार टूट जाए तो उसे दोबारा जोड़ा नहीं जा सकता, और यदि कोशिश करके जोड़ भी दिया जाए, तो उसमें गाँठ पड़ ही जाती है। ठीक उसी प्रकार, रिश्तों में एक बार अविश्वास आ जाए या रिश्ता टूट जाए, तो फिर पहले जैसा प्रेम और विश्वास नहीं रह पाता; मन में एक 'गाँठ' (खटास) हमेशा रह जाती है।
विशेष (Vishesh):
- 'प्रेम का धागा' में रूपक अलंकार है।
- सरल ब्रज भाषा का प्रयोग है।
दोहा 2: रहिमन निज मन की बिथा...
रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय।।
शब्दार्थ:
- निज : अपना
- बिथा : व्यथा / दुख / दर्द
- गोय : छिपाकर
- अठिलैहैं : इठलाना / मजाक उड़ाना
- कोय : कोई
प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
रहीम जी कहते हैं कि अपने मन के दुख-दर्द को अपने मन के भीतर ही छिपाकर रखना चाहिए। उसे दूसरों के सामने प्रकट नहीं करना चाहिए। क्योंकि जब लोग आपका दुख सुनते हैं, तो वे उसे कम नहीं करते और न ही उसे बाँटते हैं। बल्कि पीठ पीछे वे उस दुख का मजाक उड़ाते हैं और इठलाते हैं। संसार में सच्चे हमदर्द बहुत कम हैं।
विशेष:
- मानव स्वभाव (Human Psychology) का यथार्थ चित्रण है।
- नीतिपरक दोहा है।
दोहा 3: एकै साधे सब सधै...
एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय।।
शब्दार्थ:
- साधे : साधना करना / संभालना / पूरा करना
- मूलहिं : जड़ को
- सींचिबो : सिंचाई करना / पानी देना
- अघाय : तृप्त होना / भरपूर
प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
कवि कहते हैं कि हमें एक बार में एक ही काम को साधना (पूरा करना) चाहिए। यदि हम एक साथ कई काम करने की कोशिश करेंगे, तो कोई भी काम सही से नहीं होगा और सब बिगड़ जाएगा (सब साधे सब जाय)।
रहीम उदाहरण देते हैं कि जैसे किसी पेड़ की सिर्फ़ जड़ को सींचने से (पानी देने से) उसका तना, पत्तियाँ, फूल और फल सब अपने आप हरे-भरे हो जाते हैं और पेड़ फलों से लद जाता है। पत्तों को अलग-अलग पानी देने की जरूरत नहीं होती। उसी प्रकार मुख्य लक्ष्य पर ध्यान देने से छोटे-मोटे काम खुद बन जाते हैं।
विशेष:
- पेड़ और जड़ के उदाहरण से गहरी बात समझाई गई है (दृष्टांत अलंकार)।
- एकाग्रता (Focus) का महत्व बताया गया है।
दोहा 4: चित्रकूट में रमि रहे...
चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध नरेस।
जा पर बिपदा पड़त है, सो आवत यह देस।।
शब्दार्थ:
- रमि रहे : बस गए / मन लग गया
- अवध नरेस : अयोध्या के राजा (श्री राम)
- बिपदा : विपत्ति / मुसीबत / संकट
- देस : प्रदेश / स्थान
प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
रहीम जी कहते हैं कि जब अयोध्या के राजा राम को वनवास मिला था, तो वे चित्रकूट में आकर रहे थे। चित्रकूट घना जंगल और बिहड़ स्थान है। रहीम का मानना है कि ऐसे कठिन स्थान पर वही व्यक्ति आता है जिस पर कोई भारी विपत्ति (मुसीबत) पड़ी हो। अर्थात, मुसीबत के समय ही मनुष्य को शांति की तलाश में ईश्वर और प्रकृति की शरण में जाना पड़ता है।
विशेष:
- श्री राम के वनवास का पौराणिक संदर्भ लिया गया है।
- भाषा में अवधी का पुट है (अवध नरेस)।
दोहा 5: दीरघ दोहा अरथ के...
दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोरे आहिं।
ज्यों रहीम नट कुंडली, सिमिटि कूदि चढ़ि जाहिं।।
शब्दार्थ:
- दीरघ : दीर्घ / गहरा / बड़ा
- आखर : अक्षर / शब्द
- नट : बाजीगर / कलाकार
- कुंडली : घेरा / लोहे का रिंग
प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
रहीम जी कहते हैं कि दोहे (Doha) में अक्षर भले ही कम (थोरे) होते हैं, लेकिन उनका अर्थ बहुत गहरा और दीर्घ होता है। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे कोई कुशल नट (बाजीगर) अपने शरीर को सिकोड़ कर (सिमिटि) छोटी सी कुंडली (रिंग) के बीच से बड़ी कुशलता से निकल जाता है। वैसे ही, कुशल कवि कम शब्दों में बड़ी से बड़ी बात कह जाते हैं।
विशेष:
- 'नट' और 'कुंडली' का सुंदर उदाहरण (दृष्टांत अलंकार) दिया गया है।
- 'गागर में सागर' भरने की कला का वर्णन है।
दोहा 6: धनि रहीम जल पंक को...
धनि रहीम जल पंक को, लघु जिय पिअत अघाय।
उदधि बड़ाई कौन है, जगत पिआसो जाय।।
शब्दार्थ:
- धनि : धन्य / महान
- पंक : कीचड़
- लघु जिय : छोटे जीव-जंतु
- अघाय : तृप्त होना / प्यास बुझाना
- उदधि : समुद्र / सागर
प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
रहीम जी कहते हैं कि कीचड़ का वह थोड़ा सा पानी धन्य (महान) है, जिसे पीकर छोटे-छोटे जीव-जंतु अपनी प्यास बुझा लेते हैं और तृप्त हो जाते हैं। इसके विपरीत, वह सागर (समुद्र) इतना विशाल होकर भी किसी काम का नहीं है, जिसकी बड़ाई करना व्यर्थ है, क्योंकि संसार के लोग उसके किनारे आकर भी प्यासे ही लौट जाते हैं (क्योंकि उसका पानी खारा होता है)।
विशेष:
- कीचड़ के जल और समुद्र की तुलना (व्यतिरेक अलंकार) के माध्यम से परोपकार की महिमा बताई है।
दोहा 7: नाद रीझि तन देत मृग...
नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत।
ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछू न देत।।
शब्दार्थ:
- नाद : संगीत की ध्वनि
- रीझि : मोहित होकर / प्रसन्न होकर
- मृग : हिरण
- हेत : कल्याण / प्रेम
प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
रहीम जी कहते हैं कि संगीत की मधुर ध्वनि (नाद) से प्रसन्न होकर हिरण अपना शरीर तक न्योछावर कर देता है (शिकारी के जाल में फँस जाता है)। इसी तरह, सज्जन मनुष्य कला और गुणों पर मुग्ध होकर अपना धन आदि प्रेम सहित न्योछावर कर देते हैं। लेकिन वे लोग पशुओं से भी गए-गुजरे (बदतर) हैं जो किसी की कला या गुण पर खुश तो होते हैं, पर उसे इनाम स्वरूप कुछ भी नहीं देते।
विशेष:
- कंजूस व्यक्ति पर व्यंग्य किया गया है।
- पशु और मनुष्य की तुलना प्रभावी ढंग से की गई है।
दोहा 8: बिगरी बात बनै नहीं...
बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय।।
शब्दार्थ:
- बिगरी : बिगड़ी हुई
- किन कोय : कोई कितना भी उपाय क्यों न करे
- मथे : मथना / बिलोना
प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
रहीम जी कहते हैं कि मनुष्य को अपनी वाणी और व्यवहार पर नियंत्रण रखना चाहिए। क्योंकि यदि एक बार बात बिगड़ जाए (रिश्ता या सम्मान खराब हो जाए), तो लाख कोशिश करने पर भी वह पहले जैसी नहीं हो सकती। रहीम उदाहरण देते हैं कि जिस प्रकार दूध एक बार फट जाए, तो उसे कितना भी मथा जाए, उससे मक्खन नहीं निकल सकता। उसी प्रकार, प्रतिष्ठा या रिश्ते एक बार बिगड़ जाने पर दोबारा वैसे नहीं जुड़ते।
विशेष:
- 'फाटे दूध' का उदाहरण देकर बात को सिद्ध किया गया है (दृष्टांत अलंकार)।
- 'बिगरी बात बनै' में अनुप्रास अलंकार है।
दोहा 9: रहिमन देखि बड़ेन को...
रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि।।
शब्दार्थ:
- बड़ेन : बड़े लोग / अमीर
- लघु : छोटा / गरीब
- डारि : छोड़ना / त्यागना / अनादर करना
- तरवारि : तलवार
प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
रहीम जी कहते हैं कि किसी बड़े या अमीर व्यक्ति को देखकर हमें छोटे या गरीब व्यक्ति का अनादर (तिरस्कार) नहीं करना चाहिए। हर वस्तु और व्यक्ति का अपना-अपना महत्व होता है। जैसे, जहाँ सुई काम आती है (कपड़े सिलने के लिए), वहाँ तलवार काम नहीं कर सकती। तलवार बड़ी जरूर है, लेकिन वह सुई की जगह नहीं ले सकती। अतः हमें छोटों को भी सम्मान देना चाहिए।
विशेष:
- सुई और तलवार के उदाहरण से गंभीर बात आसानी से समझाई गई है।
- ऊँच-नीच के भेद को मिटाने का संदेश है।
दोहा 10: रहिमन निज संपति बिना...
रहिमन निज संपति बिना, कोउ न बिपति सहाय।
बिनु पानी ज्यों जलज को, नहिं रवि सकै बचाय।।
शब्दार्थ:
- निज संपति : अपनी दौलत / अपना बल
- बिपति : संकट / मुसीबत
- जलज : कमल
- रवि : सूर्य
प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
रहीम जी कहते हैं कि मुसीबत के समय अपनी ही संपत्ति (धन, ज्ञान, हिम्मत) काम आती है, दूसरा कोई मदद नहीं कर पाता। उदाहरण के लिए, कमल (जलज) पानी में उगता है। यदि पानी सूख जाए (कमल की अपनी संपत्ति खत्म हो जाए), तो सूर्य जो कमल को खिलने में मदद करता है, वही सूर्य उसे सुखाकर नष्ट कर देता है। अर्थात, बाहरी मदद तभी काम आती है जब आपके पास अपनी आंतरिक शक्ति हो।
विशेष:
- कमल और सूर्य का सटीक उदाहरण है।
- आत्मनिर्भरता का संदेश दिया गया है।
दोहा 11: रहिमन पानी राखिये...
रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरै, मोती, मानुष, चून।।
शब्दार्थ:
- पानी : (यहाँ तीन अर्थ हैं) चमक, इज्जत, जल
- सून : सूना / व्यर्थ
- ऊबरै : उबरना / महत्व बचना
- चून : चूना / आटा
प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
रहीम कहते हैं कि हमें पानी को हमेशा बनाए रखना चाहिए, क्योंकि इसके बिना सब कुछ सूना (व्यर्थ) है। यहाँ 'पानी' शब्द का प्रयोग तीन अलग-अलग संदर्भों में किया गया है:
1. मोती के लिए: पानी का अर्थ 'चमक' है। बिना चमक के मोती बेकार है।
2. मनुष्य के लिए: पानी का अर्थ 'विनम्रता या इज्जत' है। बिना सम्मान के मनुष्य का जीवन मृत समान है।
3. चून (चूना/आटा) के लिए: पानी का अर्थ 'जल' है। बिना पानी के आटे की रोटी नहीं बन सकती और चूना सूख जाए तो बेकार हो जाता है।
विशेष:
- 'पानी' शब्द में श्लेष अलंकार (Shlesh Alankar) का चमत्कारिक और सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
- नैतिक मूल्यों की स्थापना की गई है।
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