Bihari ke Dohe Class 10 | Bihari ke Dohe Class 10 Explanation | बिहारी के दोहे Class 10

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बिहारी के दोहे : सप्रसंग व्याख्या (Bihari Ke Dohe Class 10 Explanation)

नमस्कार विद्यार्थियों! आज के इस ब्लॉग पोस्ट में हम कक्षा 10वीं हिंदी (स्पर्श भाग-2) के पाठ 3 'बिहारी के दोहे' का भावार्थ समझेंगे। महाकवि बिहारी अपनी ब्रज भाषा और कम शब्दों में गहरा अर्थ (गागर में सागर) भरने के लिए प्रसिद्ध हैं। इस पाठ में भक्ति, नीति और श्रृंगार के सुंदर दोहे संकलित हैं।



दोहों का सार (Summary)

बिहारी के दोहों में जीवन के विभिन्न रंग देखने को मिलते हैं। उन्होंने श्री कृष्ण के रूप-सौंदर्य का वर्णन किया है, तो कभी भीषण गर्मी से व्याकुल जानवरों की दशा बताई है। गोपियों की कृष्ण से बात करने की उत्सुकता, आँखों ही आँखों में बात करने की कला, और सच्चे मन से ईश्वर भक्ति का संदेश भी इन दोहों में मिलता है। बिहारी जी पाखंड का विरोध करते हैं और सच्चे मन की भक्ति को श्रेष्ठ बताते हैं।


दोहा 1: सोहत ओढ़ै पीतु पटु...

सोहत ओढ़ै पीतु पटु स्याम, सलोने गात।
मनौ नीलमनि-सैल पर, आतपु परयौ प्रभात।।

शब्दार्थ (Word Meanings):

  • सोहत : सुशोभित होना / अच्छा लगना
  • पीतु पटु : पीले वस्त्र
  • गात : शरीर
  • मनौ : मानों (जैसे)
  • नीलमनि-सैल : नीलमणि पर्वत
  • आतपु : धूप

प्रसंग (Context):

प्रस्तुत दोहा हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'स्पर्श (भाग-2)' में संकलित पाठ 'दोहे' से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिकालीन कवि बिहारी हैं। इस दोहे में कवि ने भक्ति, नीति, लोक-व्यवहार और श्रृंगार का अत्यंत सुंदर व चमत्कारिक वर्णन किया है।

व्याख्या (Explanation):

बिहारी जी कहते हैं कि श्री कृष्ण के साँवले और सलोने शरीर पर पीले रंग के रेशमी वस्त्र बहुत ही सुंदर लग रहे हैं। उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है, 'मानों' नीले रंग के पर्वत (नीलमणि पर्वत) पर सुबह-सुबह सूर्य की पीली धूप पड़ रही हो। यहाँ कृष्ण का साँवला शरीर नीले पर्वत जैसा और पीले वस्त्र धूप जैसे लग रहे हैं।

भावार्थ: प्रकृति के माध्यम से कृष्ण के रूप-सौंदर्य की अद्भुत तुलना की गई है।

विशेष (Vishesh):

  • 'मनौ' शब्द के कारण यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है।
  • ब्रज भाषा का सुंदर प्रयोग है।
  • 'पीतु पटु' और 'परयौ प्रभात' में अनुप्रास अलंकार है।

दोहा 2: कहलाने एकत बसत...

कहलाने एकत बसत अहि मयूर, मृग बाघ।
जगतु तपोबन सो कियौ, दीरघ दाघ निदाघ।।

शब्दार्थ:

  • एकत : एक साथ
  • अहि : साँप
  • दाघ : दाग / ताप / गर्मी
  • निदाघ : भीषण गर्मी (ग्रीष्म ऋतु)
  • तपोबन : वह वन जहाँ तपस्वी रहते हैं (शांति का स्थान)

प्रसंग:

प्रस्तुत दोहा हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'स्पर्श (भाग-2)' में संकलित पाठ 'दोहे' से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिकालीन कवि बिहारी हैं। इस दोहे में कवि ने भक्ति, नीति, लोक-व्यवहार और श्रृंगार का अत्यंत सुंदर व चमत्कारिक वर्णन किया है।

व्याख्या:

कवि कहते हैं कि जेठ (ग्रीष्म) की भीषण गर्मी ने जंगल को 'तपोवन' जैसा बना दिया है। जिस प्रकार तपोवन में साधु-संतों के प्रभाव से शेर और बकरी एक साथ रहते हैं, वैसे ही गर्मी के डर से साँप और मोर, हिरण और बाघ—जो कि एक-दूसरे के जानी दुश्मन हैं—अपनी शत्रुता भूलकर एक साथ (एकत) बैठे हैं। गर्मी इतनी तेज है कि किसी में भी लड़ने की ताकत नहीं बची है।

भावार्थ: मुसीबत (गर्मी) के समय शत्रु भी अपनी आपसी दुश्मनी भूलकर शांत हो जाते हैं।

विशेष:

  • गर्मी की प्रचंडता का सजीव चित्रण है।
  • 'दीरघ दाघ' में अनुप्रास अलंकार है।

दोहा 3: बतरस लालच लाल की...

बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाइ।
सौंह करैं भौंहनु हँसै, दैन कहैं नटि जाइ।।

शब्दार्थ:

  • बतरस : बातों का आनंद (रस)
  • लाल : श्री कृष्ण
  • लुकाइ : छिपाकर
  • सौंह करैं : कसम खाना
  • नटि जाइ : मना कर देना

प्रसंग:

प्रस्तुत दोहा हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'स्पर्श (भाग-2)' में संकलित पाठ 'दोहे' से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिकालीन कवि बिहारी हैं। इस दोहे में कवि ने भक्ति, नीति, लोक-व्यवहार और श्रृंगार का अत्यंत सुंदर व चमत्कारिक वर्णन किया है।

व्याख्या:

गोपियों को श्री कृष्ण से बातें करने में बहुत आनंद आता है। इसी 'बातों के रस' (बतरस) के लालच में उन्होंने कृष्ण की बाँसुरी (मुरली) छिपा दी है। जब कृष्ण अपनी मुरली माँगते हैं, तो गोपियाँ झूठी कसम (सौंह) खाती हैं कि उन्होंने नहीं ली, लेकिन साथ ही साथ भौंहों ही भौंहों में हँसती भी हैं (जिससे कृष्ण को शक हो जाता है)। जब कृष्ण देने को कहते हैं, तो वे साफ मना (नट) कर देती हैं।

भावार्थ: गोपियाँ कृष्ण का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए उनसे ठिठोली (मजाक) कर रही हैं।

विशेष:

  • श्रृंगार रस का सुंदर उदाहरण है।
  • कृष्ण और गोपियों की नोक-झोंक का चित्रण है।

दोहा 4: कहत, नटत, रीझत, खिझत...

कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।
भरे भौन में करत हैं, नैननु ही सब बात।।

शब्दार्थ:

  • नटत : इनकार करना
  • रीझत : मोहित होना
  • खिझत : बनावटी गुस्सा करना
  • भौन : भवन / घर (जहाँ लोग भरे हों)
  • लजियात : शर्माना

प्रसंग:

प्रस्तुत दोहा हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'स्पर्श (भाग-2)' में संकलित पाठ 'दोहे' से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिकालीन कवि बिहारी हैं। इस दोहे में कवि ने भक्ति, नीति, लोक-व्यवहार और श्रृंगार का अत्यंत सुंदर व चमत्कारिक वर्णन किया है।

व्याख्या:

कवि कहते हैं कि घर लोगों से भरा हुआ है (भरे भौन में)। ऐसे में नायक और नायिका मुँह से कुछ नहीं बोल पाते, लेकिन उनकी आँखों में ही सारी बातें हो जाती हैं।
नायक आँखों से कुछ 'कहता' (प्रस्ताव रखता) है, नायिका 'इनकार' (नटत) कर देती है। उसके इनकार करने की अदा पर नायक 'मोहित' (रीझत) हो जाता है। यह देखकर नायिका बनावटी 'गुस्सा' (खिझत) दिखाती है। फिर दोनों की आँखें 'मिलती' हैं, चेहरे 'खिल' उठते हैं (प्रसन्न होते हैं) और अंत में नायिका 'शर्मा' (लजियात) जाती है।

भावार्थ: प्रेम में शब्दों की जरूरत नहीं होती, आँखें सब कुछ कह देती हैं। यह 'गागर में सागर' का बेहतरीन उदाहरण है।

विशेष:

  • पूरे दोहे में क्रियाओं (Verbs) की झड़ी लगी है।
  • संयोग श्रृंगार रस का वर्णन है।
  • दीपक अलंकार है।

दोहा 5: बैठि रही अति सघन बन...

बैठि रही अति सघन बन, पैठि सदन तन माँह।
देखि दुपहरी जेठ की, छाँहौं चाहति छाँह।।

शब्दार्थ:

  • सघन बन : घना जंगल
  • पैठि : घुसकर
  • सदन : घर
  • जेठ : जून का महीना (अत्यधिक गर्मी)

प्रसंग:

प्रस्तुत दोहा हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'स्पर्श (भाग-2)' में संकलित पाठ 'दोहे' से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिकालीन कवि बिहारी हैं। इस दोहे में कवि ने भक्ति, नीति, लोक-व्यवहार और श्रृंगार का अत्यंत सुंदर व चमत्कारिक वर्णन किया है।

व्याख्या:

बिहारी जी जेठ महीने की भीषण गर्मी का वर्णन करते हुए कहते हैं कि गर्मी इतनी ज्यादा है कि छाया (Shadow) भी गर्मी से बचने के लिए छाया ढूँढ रही है। वह या तो घने जंगलों (सघन बन) में जाकर छिप गई है या फिर लोगों के घरों के अंदर (सदन तन) घुसकर बैठ गई है। भाव यह है कि दोपहर में खुले में कहीं भी छाया नहीं मिलती, वह भी गर्मी से घबरा गई है।

भावार्थ: छाया का मानवीकरण किया गया है। गर्मी की तीव्रता इतनी है कि छाया भी सहारा ढूँढ रही है।

विशेष:

  • छाया का मानवीकरण (Personification) किया गया है।
  • 'छाँहौं चाहति छाँह' में अनुप्रास अलंकार है।

दोहा 6: कागद पर लिखत न बनत...

कागद पर लिखत न बनत, कहत सँदेसु लजात।
कहिहै सबु तेरौ हियौ, मेरे हिय की बात।।

शब्दार्थ:

  • कागद : कागज
  • लजात : शर्म आना / लज्जा
  • हियौ : हृदय / दिल

प्रसंग:

प्रस्तुत दोहा हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'स्पर्श (भाग-2)' में संकलित पाठ 'दोहे' से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिकालीन कवि बिहारी हैं। इस दोहे में कवि ने भक्ति, नीति, लोक-व्यवहार और श्रृंगार का अत्यंत सुंदर व चमत्कारिक वर्णन किया है।

व्याख्या:

एक नायिका अपने नायक से दूर है और अपनी विरह-वेदना (दुख) बताना चाहती है। वह कहती है कि कागज पर मुझसे अपनी पीड़ा लिखी नहीं जा रही (क्योंकि आँसुओं से कागज भीग जाता है या हाथ काँपते हैं)। और संदेशवाहक (दूत) से बोलकर संदेश भेजने में मुझे शर्म (लज्जा) आ रही है। अंत में वह कहती है कि तुम अपने हृदय से ही पूछ लो, तुम्हारा हृदय ही मेरे हृदय की सारी बात (तड़प) तुम्हें बता देगा, क्योंकि हमारा प्रेम सच्चा है।

भावार्थ: सच्चे प्रेम में दिलों का जुड़ाव होता है, शब्दों की आवश्यकता नहीं होती।

विशेष:

  • वियोग श्रृंगार रस है।
  • प्रेम की गहराई और विवशता का चित्रण है।

दोहा 7: प्रगट भए द्विजराज कुल...

प्रगट भए द्विजराज कुल, सुबस बसे ब्रज आइ।
मेरे हरौ कलेस सब, केसव केसवराइ।।

शब्दार्थ:

  • द्विजराज : चन्द्रमा / ब्राह्मण (दो अर्थ)
  • सुबस : अपनी इच्छा से / सुखपूर्वक
  • कलेस : क्लेश / कष्ट / दुख
  • केसव : श्री कृष्ण
  • केसवराइ : बिहारी के पिता का नाम / श्री कृष्ण का नाम

प्रसंग:

प्रस्तुत दोहा हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'स्पर्श (भाग-2)' में संकलित पाठ 'दोहे' से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिकालीन कवि बिहारी हैं। इस दोहे में कवि ने भक्ति, नीति, लोक-व्यवहार और श्रृंगार का अत्यंत सुंदर व चमत्कारिक वर्णन किया है।

व्याख्या:

कवि बिहारी श्री कृष्ण से प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं— "हे श्री कृष्ण! आपने चंद्रवंश (द्विजराज कुल) में जन्म लिया और अपनी इच्छा से ब्रज में आकर बस गए। आप मेरे पिता के समान हैं (बिहारी के पिता का नाम केशवराय था)। हे केशव (कृष्ण)! हे केशवराय (पिता रूपी प्रभु)! आप मेरे जीवन के सारे क्लेश (कष्ट) दूर कर दीजिए।"

भावार्थ: यहाँ बिहारी जी कृष्ण को अपना पिता मानकर उनसे अपने कष्ट हरने की विनती कर रहे हैं।

विशेष:

  • 'द्विजराज' और 'केसवराइ' में श्लेष अलंकार है (एक शब्द के दो अर्थ)।
  • भक्ति रस है।

दोहा 8: जप माला, छापें, तिलक...

जप माला, छापें, तिलक, सरै न एकौ कामु।
मन काँचै नाचै बृथा, साँचै राँचै रामु।।

शब्दार्थ:

  • छापें : रामनामी वस्त्र पहनना / छाप लगाना
  • सरै : पूरा होना / सिद्ध होना
  • मन काँचै : कच्चा मन (जिसमें भक्ति न हो)
  • बृथा : बेकार / व्यर्थ
  • साँचै : सच्चे मन से
  • राँचै : प्रसन्न होना

प्रसंग:

प्रस्तुत दोहा हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'स्पर्श (भाग-2)' में संकलित पाठ 'दोहे' से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिकालीन कवि बिहारी हैं। इस दोहे में कवि ने भक्ति, नीति, लोक-व्यवहार और श्रृंगार का अत्यंत सुंदर व चमत्कारिक वर्णन किया है।

व्याख्या:

बिहारी जी पाखंड और बाहरी दिखावे का विरोध करते हैं। वे कहते हैं कि हाथ में जप-माला लेने से, माथे पर तिलक लगाने से या रामनामी कपड़े (छापें) पहनने से ईश्वर प्राप्ति का एक भी काम पूरा नहीं होता। जिनका मन 'कच्चा' है (ईश्वर में स्थिर नहीं है), वे व्यर्थ ही यहाँ-वहाँ भटकते (नाचते) रहते हैं। भगवान राम तो केवल 'सच्चे' मन वाली भक्ति से ही प्रसन्न (राँचै) होते हैं।

भावार्थ: बाह्य आडंबर (दिखावा) छोड़कर सच्चे मन से ईश्वर की भक्ति करनी चाहिए।

विशेष:

  • 'काँचै-नाचै' और 'साँचै-राँचै' में तुकांत (Rhyme) का सुंदर प्रयोग है।
  • धार्मिक पाखंडों पर करारी चोट की गई है।

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