पद्माकर : औरै भाँति कुंजन में गुंजरत (तीनों कवित्त)
नमस्कार विद्यार्थियों! आज के इस ब्लॉग पोस्ट में हम कक्षा 11वीं हिंदी (अंतरा भाग-1) के पाठ 'पद्माकर' के तीनों कवित्तों का भावार्थ समझेंगे। इन कवित्तों में कवि ने क्रमशः वसंत ऋतु, वर्षा ऋतु (सावन) और होली के उत्सव का अद्भुत वर्णन किया है।
कविता का सार (Summary)
पहले कवित्त में वसंत ऋतु के आगमन पर प्रकृति, पक्षियों और मनुष्यों में आए बदलाव और उल्लास का वर्णन है।
दूसरे कवित्त में गोकुल के कुल और गलियों में होली के उत्सव का चित्रण है। गोपियाँ कृष्ण के प्रेम रंग में इतनी डूबी हैं कि उन्हें लोक-लाज की परवाह नहीं है।
तीसरे कवित्त में वर्षा ऋतु (सावन) में भंवरों के गुंजन, मोर के शोर और झूले के आनंद का वर्णन है, जो प्रेम को बढ़ाता है।
कवित्त 1: वसंत का उल्लास
औरै भाँति कुंजन में गुंजरत भौर भीर,
औरै डोर झौरन पै बौरन के ह्वै गए।
कहैं पदमाकर सु औरै भाँति गलियानि,
छलिया छबीले छल औरै छबि छ्वै गए।।
औरै भाँति बिहग समाज में अवाज होती,
रितुराज बसंत के न औरै दिन ह्वै गए।
औरै रस, औरै रीति, औरै राग, औरै रंग,
औरै तन, औरै मन, औरै बन ह्वै गए।।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- औरै भाँति : अनोखे / बिल्कुल अलग
- कुंजन : बगीचों में
- भौर भीर : भंवरों की भीड़
- झौरन : गुच्छे
- बौरन : आम की मंजरियाँ
- छलिया छबीले : सुंदर नवयुवक (कृष्ण)
- बिहग : पक्षी
- रितुराज : ऋतुओं का राजा (वसंत)
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ (कवित्त/सवैया) हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
पद्माकर कहते हैं कि वसंत आते ही बगीचों में भंवरों की भीड़ एक 'अलग ही तरह' से गूंजने लगी है। आम के पेड़ों पर जो बौर (फूल) आए हैं, उनके गुच्छे भी कुछ और ही (निराले) हो गए हैं।
गलियों में घूमने वाले बांके नवयुवक (छलिया) अब एक अलग ही छवि (सुंदरता) धारण करके छा गए हैं। पक्षियों की चहचहाहट में भी अब एक अलग ही मिठास आ गई है।
वसंत के कारण वातावरण में एक अलग ही रस (आनंद), रीति (ढंग), राग (गीत) और रंग (उमंग) दिखाई दे रहा है। लोगों के तन, मन और जंगल सब कुछ पहले से एकदम भिन्न और अद्भुत (औरै) हो गए हैं।
विशेष (Vishesh):
- 'भौर भीर', 'छलिया छबीले छल' में अनुप्रास अलंकार है।
- 'औरै' शब्द की आवृत्ति (Yamak Alankar का आभास) चमत्कार उत्पन्न करती है।
कवित्त 2: होली का उल्लास (गोकुल के कुल के गली के गोप)
गोकुल के कुल के गली के गोप, गाउँ के जो,
लगी कछू को कछू भाखत भने नहीं।
कहैं पदमाकर परोस पिछवारन के,
द्वारन के दौरि गुन औगुन गनै नहीं।
तौ लौं चलित चतुर सहेली, याही कोऊ कहू,
नीके कै निचोरै ताहि करत मनै नहीं।
हो तो स्याम रंग में, चुराय चित चोरा-चोरी,
बोरत तो बोर्यो पै निचोरत बनै नहीं।।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- कुल : परिवार / वंश
- भाखत : बोलते हैं / बकते हैं
- भने नहीं : वर्णन नहीं किया जा सकता
- गनै नहीं : परवाह नहीं करते
- नीके कै : अच्छी तरह से
- निचोरै : निचोड़ना
- बोरत : डुबोना (रंग में)
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ (कवित्त/सवैया) हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
पद्माकर कहते हैं कि गोकुल के परिवारों और गलियों के ग्वाले होली की मस्ती में जो कुछ बक रहे हैं (गालियाँ/मजाक), उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। पड़ोस के लोग दरवाजों पर दौड़-दौड़कर होली खेल रहे हैं, वे किसी के गुण-दोष (अच्छाई-बुराई) की परवाह नहीं कर रहे (होली में सब जायज है)।
तभी एक चतुर सहेली दूसरी सहेली से कहती है— "तू इस भीगे हुए कपड़े को अच्छी तरह से निचोड़ ले, मैं मना नहीं कर रही।"
लेकिन वह गोपी उत्तर देती है— "अरे! मेरा मन तो श्याम (कृष्ण) ने चोरी-चोरी चुरा लिया है। मैं तो श्याम के प्रेम रंग में पूरी तरह डूब गई हूँ (बोर गई हूँ)। अब तू ही बता, इस प्रेम के रंग में डूबे हुए मन को मैं कैसे निचोड़ूँ? (कपड़े निचोड़े जा सकते हैं, पर मन में समाया प्रेम नहीं)।"
विशेष (Vishesh):
- 'श्याम रंग' में श्लेष अलंकार है।
- 'गली के गोप', 'भाखत भने' में अनुप्रास अलंकार है।
- होली के बहाने प्रेम की अभिव्यक्ति है।
कवित्त 3: सावन के झूलों का वर्णन
भौंपन को गुंजन बिहार बन कुंजन में,
मंजुल मलारन को गावनो लगत है।
कहैं पदमाकर गुमानहूँ तें मानहूँ तें,
प्रानहूँ तें प्यारो मनभावनो लगत है।
मोरन को सोर घनघोर चहुँ ओरन,
हिंडोरन को बृंद छबि छावनो लगत है।
नेह सरसावन में, मेह बरसावन में,
सावन में झूलिबो सुहावनो लगत है।।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- भौंपन : भंवरों का
- बिहार : घूमना / विचरण
- मंजुल : सुंदर
- मलारन : मल्हार राग (वर्षा ऋतु का गीत)
- गुमान / मान : रूठना / अभिमान
- सोर : शोर
- हिंडोरन : झूले
- सरसावन : बढ़ाना / रसपूर्ण करना
- मेह : मेघ / बारिश
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ (कवित्त/सवैया) हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
पद्माकर कहते हैं कि सावन में वन-उपवनों (कुंजन) में भंवरों का गुंजन करना और मल्हार राग का गाया जाना बहुत सुंदर (मंजुल) लगता है।
इस मौसम में अपना प्रियतम (मनभावन), चाहे वह रूठा (मान) ही क्यों न हो या अभिमान (गुमान) ही क्यों न करे, फिर भी वह प्राणों से भी प्यारा लगता है।
चारों तरफ बादलों की घनघोर घटाओं के बीच मोरों का शोर (कूकना) और झूलों का समूह (हिंडोरन को बृंद) बहुत ही आकर्षक छवि प्रस्तुत करता है।
वर्षा ऋतु में जब मेघ बरसते हैं (मेह बरसावन में), तो वे दिलों में प्रेम (नेह) भी बरसाते हैं। ऐसे में सावन के महीने में झूला झूलना मन को बहुत ही सुहावना लगता है।
विशेष (Vishesh):
- 'मंजुल मलारन', 'सरसावन में... बरसावन में' में अनुप्रास अलंकार और लयात्मकता है।
- प्रकृति का उद्दीपन रूप (प्रेम बढ़ाने वाला) वर्णित है।
- ब्रज भाषा की कोमलता दर्शनीय है।
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