एक फूल की चाह : संपूर्ण सप्रसंग व्याख्या
नमस्कार विद्यार्थियों! आज के इस ब्लॉग पोस्ट में हम कक्षा 9वीं हिंदी (स्पर्श भाग-1) की कविता 'एक फूल की चाह' का कोना-कोना समझेंगे। इसके कवि सियारामशरण गुप्त हैं। यहाँ पूरी कविता के हर पद्यांश का विस्तृत विश्लेषण (शब्दार्थ, प्रसंग, व्याख्या, भावार्थ और विशेष) दिया गया है।
कविता का सार (Summary)
यह कविता छुआछूत की समस्या पर आधारित है। एक अछूत पिता अपनी बीमार बेटी 'सुखिया' की अंतिम इच्छा (देवी का फूल) पूरी करने के लिए मंदिर जाता है। वहाँ उसे 'अछूत' कहकर अपमानित किया जाता है और जेल भेज दिया जाता है। जब वह लौटता है, तो उसकी बेटी मर चुकी होती है और वह उसे अंतिम विदाई भी नहीं दे पाता।
पद्यांश 1: महामारी का प्रकोप
उद्वेलित कर अश्रु-राशियाँ, हृदय-चिताएँ धधकाकर,
महामारी प्रचंड हो फैल रही थी इधर-उधर।
क्षीर्ण-कंठ मृतवत्साओं का करुण रुदन दुर्दांत नितांत,
भरे हुए था निज कृश रव में हाहाकार अपार अशांत।
शब्दार्थ:
- उद्वेलित : भावुक करना / हिला देना
- हृदय-चिताएँ : मन का डर
- मृतवत्सा : जिस माँ का बच्चा मर गया हो
- दुर्दांत : भयानक
- कृश रव : कमजोर आवाज
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
गाँव में महामारी फैली हुई थी। चारों तरफ मौत का तांडव था। लोगों के दिलों में डर की आग जल रही थी। जिन माताओं के बच्चे मर गए थे, रोते-रोते उनका गला बैठ गया था, फिर भी उनके रोने की कमजोर आवाज़ में भयानक दर्द और हाहाकार भरा था।
विशेष:
- 'हृदय-चिताएँ' में रूपक अलंकार है।
- भाषा खड़ी बोली हिंदी है।
- करुण रस की प्रधानता है।
पद्यांश 2: पिता की चिंता
बहुत रोकता था सुखिया को, ‘न जा खेलने को बाहर’,
नहीं खेलना रुकता उसका नहीं ठहरती वह पल-भर।
मेरा हृदय काँप उठता था, बाहर गई निहार उसे;
यही मनाता था कि बचा लूँ किसी भाँति इस बार उसे।
शब्दार्थ:
- निहार : देखकर
- किसी भाँति : किसी तरह
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
पिता सुखिया को बाहर जाने से रोकता था, पर वह नहीं मानती थी। जब भी वह बाहर जाती, पिता का दिल डर जाता था। वह ईश्वर से प्रार्थना करता था कि किसी तरह उसकी बेटी बच जाए।
विशेष:
- पिता की वात्सल्य भावना का चित्रण है।
- सरल और सहज भाषा का प्रयोग है।
पद्यांश 3: सुखिया बीमार पड़ी
भीतर जो डर रहा छिपाए, हाय! वही बाहर आया।
एक दिवस सुखिया के तनु को ताप-तप्त मैंने पाया।
ज्वर में विह्वल हो बोली वह, "क्या जानूँ किस डर से डर,
मुझको देवी के प्रसाद का एक फूल ही दो लाकर।"
शब्दार्थ:
- तनु : शरीर
- ताप-तप्त : बुखार से गर्म
- ज्वर : बुखार
- विह्वल : बेचैन
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
पिता का डर सच हो गया। सुखिया को तेज बुखार चढ़ गया। बुखार की बेचैनी में उसने पिता से कहा— "मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस देवी माँ का एक फूल लाकर दो।"
विशेष:
- 'डर से डर' में अनुप्रास अलंकार है।
- बच्ची की कातर पुकार का वर्णन है।
पद्यांश 4: पिता की बेबसी
क्रमशः कंठ क्षीण हो आया, शिथिल हुए अवयव सारे,
बैठा था नव-नव उपाय की चिंता में मैं मनमारे।
जान सका न प्रभात सजग से हुई अलस कब दोपहरी,
स्वर्ण-घनों में कब रवि डूबा, कब आई संध्या गहरी।
शब्दार्थ:
- क्षीण : कमजोर
- शिथिल : ढीले
- अवयव : अंग
- स्वर्ण-घनों : सुनहरे बादल
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
सुखिया की आवाज़ कमजोर हो गई और शरीर ढीला पड़ गया। पिता उदास होकर उसे बचाने के उपाय सोच रहा था। चिंता में उसे दिन-रात का पता ही नहीं चला कि कब दिन बीता और कब शाम हो गई।
विशेष:
- 'स्वर्ण-घनों' में सूर्यास्त का सुंदर बिंब है।
- मानसिक व्यथा के कारण समय के बीतने का पता न चलना दर्शाया गया है।
पद्यांश 5: अंधकार और निराशा
सभी ओर दिखलाई दी बस, अंधकार की ही छाया,
छोटी-सी बच्ची को ग्रसने कितना बड़ा तिमिर आया!
ऊपर विस्तृत महाकाश में जलते-से अंगारों से,
झुलसी-सी जाती थी आँखें जगमग जगते तारों से।
शब्दार्थ:
- ग्रसने : निगलने
- तिमिर : अँधेरा (मौत का प्रतीक)
- विस्तृत : विशाल
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
पिता को लगा कि उसकी छोटी सी बच्ची को निगलने के लिए मौत रूपी बड़ा अँधेरा आ गया है। आकाश के तारे भी उसे जलते हुए अंगारों जैसे लग रहे थे, जो उसकी आँखों को चुभ रहे थे।
विशेष:
- 'तिमिर' मृत्यु का प्रतीक है।
- 'जलते-से अंगारों से' में उपमा अलंकार है।
पद्यांश 6: मंदिर जाने का निर्णय
देख रहा था-जो सुस्थिर हो नहीं बैठती थी क्षण-भर,
हाय! वही चुपचाप पड़ी थी अटल शांति-सी धारण कर।
सुनना वही चाहता था मैं उसे स्वयं ही उकसाकर-
‘मुझको देवी के प्रसाद का एक फूल ही दो लाकर!’
शब्दार्थ:
- सुस्थिर : टिक कर / एक जगह
- अटल शांति : गहरी खामोशी
- उकसाकर : प्रेरित करके
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
चंचल सुखिया अब बिल्कुल शांत पड़ी थी। पिता उसे हिला-डुला कर बुलवाना चाहता था कि एक बार फिर कहो— "मुझे देवी का फूल चाहिए।" अंत में, उसने मंदिर जाने का फैसला किया।
विशेष:
- 'अटल शांति-सी' में उपमा अलंकार है।
- पिता की बेचैनी का स्वाभाविक वर्णन है।
पद्यांश 7: मंदिर की भव्यता
ऊँचे शैल-शिखर के ऊपर मंदिर था विस्तीर्ण विशाल;
स्वर्ण-कलश सरसिज विहसित थे पाकर समुदित रवि-कर-जाल।
दीप-धूप से आमोदित था मंदिर का आँगन सारा;
गूँज रही थी भीतर-बाहर मुखरित उत्सव की धारा।
शब्दार्थ:
- विस्तीर्ण : बहुत बड़ा
- सरसिज : कमल
- आमोदित : महका हुआ
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
पहाड़ की चोटी पर एक विशाल मंदिर था। उसके सोने के कलश सूर्य की किरणों में चमक रहे थे। मंदिर का आँगन धूप-दीप की खुशबू से महक रहा था और वहां उत्सव जैसा माहौल था।
विशेष:
- 'स्वर्ण-कलश सरसिज' में रूपक अलंकार है।
- चित्रात्मक शैली है।
पद्यांश 8: भक्ति में लीन पिता
भक्त-वृंद मृदु-मधुर कंठ से गाते थे सद्भक्ति मुद-मय,–
‘पतित-तारिणी पाप-हारिणी, माता, तेरी जय-जय-जय!’
‘पतित-तारिणी, तेरी जय-जय’– मेरे मुख से भी निकला,
बिना बढ़े ही मैं आगे को जाने किस बल से ढिकला!
शब्दार्थ:
- भक्त-वृंद : भक्तों का समूह
- पतित-तारिणी : पापियों का उद्धार करने वाली
- ढिकला : धकेला गया
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
भक्त गा रहे थे— "हे पापियों का उद्धार करने वाली माता! तेरी जय हो।" पिता ने भी यही दोहराया। वह भक्ति में इतना खो गया कि उसे पता ही नहीं चला कि वह कब भीड़ के धक्कों से मंदिर के अंदर पहुँच गया।
विशेष:
- पिता की तल्लीनता और भीड़ का प्रभाव दर्शाया गया है।
- 'जय-जय-जय' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
पद्यांश 9: प्रसाद की प्राप्ति
मेरे दीप-फूल लेकर वे अंबे को अर्पित करके
दिया पुजारी ने प्रसाद जब आगे को अंजलि भरके,
भूल गया उसका लेना झट, परम लाभ-सा पाकर मैं,
सोचा– बेटी को माँ के ये पुण्य-पुष्प दूँ जाकर मैं।
शब्दार्थ:
- अंजलि : दोनों हथेलियों का गड्ढा
- पुण्य-पुष्प : पवित्र फूल
- परम लाभ : बहुत बड़ा खजाना
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
पुजारी ने देवी को फूल चढ़ाए और प्रसाद (फूल) वापस पिता को दिया। प्रसाद पाकर उसे लगा जैसे दुनिया का खजाना मिल गया हो। उसने सोचा कि जल्दी जाकर यह फूल बेटी को दूँगा।
विशेष:
- 'परम लाभ-सा' में उपमा अलंकार है।
- पिता की आशा का संचार हुआ है।
पद्यांश 10: अछूत की पहचान
सिंह पौर तक भी आँगन से नहीं पहुँचने मैं पाया,
सहसा यह सुन पड़ा कि– “कैसे यह अछूत भीतर आया!
पकड़ो, देखो भाग न जावे, बना धूर्त यह है कैसा;
साफ़-स्वच्छ परिधान किए है, भले मानुषों के जैसा!
शब्दार्थ:
- सिंह पौर : मुख्य दरवाजा
- धूर्त : चालाक / धोखेबाज
- परिधान : कपड़े
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
अभी वह मुख्य द्वार तक भी नहीं पहुँचा था कि किसी ने चिल्लाया— "अरे! यह अछूत मंदिर में कैसे आ गया? इसे पकड़ो। इसने तो साफ कपड़े पहन रखे हैं ताकि कोई पहचान न सके।"
विशेष:
- जातिगत भेदभाव का यथार्थ चित्रण है।
- 'भले मानुषों' शब्द का व्यंग्यात्मक प्रयोग है।
पद्यांश 11: पिता का तर्क
पापी ने मंदिर में घुसकर किया अनर्थ बड़ा भारी;
कलुषित कर दी है मंदिर की चिरकालिक शुचिता सारी।”
ऐं! क्या मेरा कलुष बड़ा है देवी की गरिमा से भी?
किसी बात में हूँ मैं आगे माता की महिमा के भी?
शब्दार्थ:
- कलुषित : गंदा
- शुचिता : पवित्रता
- कलुष : पाप / गंदगी
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
लोग कहने लगे कि इसने मंदिर को अपवित्र कर दिया। पिता ने पूछा— "क्या मेरा पाप देवी की महानता से भी बड़ा है? क्या मैं माता की शक्ति से भी ज्यादा शक्तिशाली हूँ?"
विशेष:
- प्रश्न शैली का प्रभावी प्रयोग है।
- पिता के तर्क में गहराई और सत्यता है।
पद्यांश 12: मार-पीट और हिंसा
माँ के भक्त हुए तुम कैसे करके यह विचार खोटा?
माँ के सम्मुख ही माँ का तुम गौरव करते हो छोटा!
कुछ न सुना भक्तों ने, झट से मुझे घेरकर पकड़ लिया;
मार-मारकर मुक्के-घूँसे धम-से नीचे गिरा दिया!
शब्दार्थ:
- विचार खोटा : गंदी सोच
- सम्मुख : सामने
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
पिता ने कहा कि तुम ऐसी छोटी सोच रखकर भक्त कैसे हो सकते हो? लेकिन भक्तों ने उसकी नहीं सुनी। उसे घेर लिया और मुक्के-घूँसे मारकर जमीन पर गिरा दिया।
विशेष:
- भीड़ की मानसिकता का चित्रण है।
- भक्तों के पाखंड पर चोट है।
पद्यांश 13: फूल का गिरना और सज़ा
मेरे हाथों से प्रसाद भी बिखर गया हा! सबका सब,
हाय! अभागी बेटी तुझ तक कैसे पहुँच सके यह अब!
न्यायालय ले गए मुझे वे, सात दिवस का दंड-विधान
मुझको हुआ; हुआ था मुझसे देवी का महान अपमान!
शब्दार्थ:
- अभागी : बदकिस्मत
- दंड-विधान : सज़ा का हुक्म
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
मार-पीट में फूल गिर गया। पिता रो पड़ा कि अब यह फूल बेटी तक कैसे पहुँचेगा। उसे कोर्ट ले जाया गया और देवी का अपमान करने के जुर्म में 7 दिन की जेल हो गई।
विशेष:
- फूल का गिरना उम्मीदों के टूटने का प्रतीक है।
- न्याय व्यवस्था पर भी व्यंग्य है।
पद्यांश 14: जेल की पीड़ा
मैंने स्वीकृत किया दंड वह शीश झुकाकर चुप ही रह;
उस असीम अभियोग, दोष का क्या उत्तर देता, क्या कह?
सात रोज़ ही रहा जेल में या कि वहाँ सदियाँ बीतीं,
अविश्रांत बरसा करके भी आँखें तनिक नहीं रीतीं।
शब्दार्थ:
- अभियोग : आरोप
- अविश्रांत : लगातार
- रीतीं : खाली होना
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
पिता ने चुपचाप सज़ा मान ली। 7 दिन उसे सदियों जैसे लगे। वह लगातार रोता रहा, फिर भी उसकी आँखों के आँसू सूखे नहीं।
विशेष:
- 'सदियाँ बीतीं' में अतिशयोक्ति अलंकार है।
- पिता की विवशता का मार्मिक वर्णन है।
पद्यांश 15: घर वापसी और सूनापन
दंड भोगकर जब मैं छूटा, पैर न उठते थे घर को;
पीछे ठेल रहा था कोई, भय-जर्जर तनु-पंजर को।
पहले की-सी लेने मुझको नहीं दौड़कर आई वह,
उलझी हुई खेल में ही हा! अबकी दी न दिखाई वह।
शब्दार्थ:
- भय-जर्जर : डर से कमजोर
- तनु-पंजर : शरीर का कंकाल
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
जेल से छूटकर पिता के कदम घर की ओर नहीं बढ़ रहे थे, उसे डर लग रहा था। घर पहुँचने पर बेटी उसे लेने नहीं आई और न ही कहीं दिखाई दी।
विशेष:
- 'तनु-पंजर' में रूपक अलंकार है।
- सन्नाटे का भयावह चित्रण है।
पद्यांश 16: श्मशान का दृश्य
उसे देखने मरघट को ही गया दौड़ता हुआ वहाँ,
मेरे परिचित बंधु प्रथम ही फूँक चुके थे उसे जहाँ।
बुझी पड़ी थी चिता वहाँ पर, छाती धधक उठी मेरी,
हाय! फूल-सी कोमल बच्ची, हुई राख की थी ढेरी!
शब्दार्थ:
- मरघट : श्मशान
- फूँक चुके : जला चुके थे
- धधक उठी : जल उठी (दुख से)
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
पिता दौड़कर श्मशान पहुँचा। लेकिन रिश्तेदारों ने पहले ही दाह-संस्कार कर दिया था। बुझी हुई चिता को देखकर पिता का कलेजा फट गया। उसकी कोमल बच्ची अब राख की ढेरी बन चुकी थी।
विशेष:
- 'फूल-सी कोमल बच्ची' में उपमा अलंकार है।
- हृदयविदारक दृश्य का वर्णन है।
पद्यांश 17: अंतिम विलाप
अंतिम बार गोद में बेटी, तुझको ले न सका मैं हा!
एक फूल माँ का प्रसाद भी, तुझको दे न सका मैं हा!
शब्दार्थ:
- हा! : दुख प्रकट करना
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
पिता रोते हुए कहता है— "हाय बेटी! मैं तुझे आखिरी बार गोद में भी नहीं ले सका। और तेरी आखिरी इच्छा—देवी का एक फूल—भी तुझे नहीं दे सका।"
विशेष:
- अत्यंत कारुणिक अंत है।
- छुआछूत के दुष्परिणामों को प्रभावी ढंग से रखा गया है।
उम्मीद है कि आपको Class 9 Hindi Ek Phool Ki Chah Full Explanation का यह लेख पसंद आया होगा। इसे अपने दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें।

If you have any doubts, Please let me know