क्या लिखूँ? | Question Answer | NCERT Solutions Hindi
यहाँ प्रसिद्ध निबंध “क्या लिखूँ?” (पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी) के अभ्यास सभी प्रश्न और उनके सटीक उत्तर दिए गए हैं। इसमें सही विकल्प के साथ-साथ यह भी स्पष्ट किया गया है कि वह उत्तर क्यों उपयुक्त है (तर्क)।
रचना से संवाद: मेरे उत्तर मेरे तर्क
प्रश्न 1. “हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है... असली वस्तु है हैट, खूँटी नहीं।” निबंध में ‘हैट’ और ‘खूँटी’ का उल्लेख किस भाव को सबसे अधिक उजागर करता है?
सही उत्तर: (क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता को दर्शाना
मेरा तर्क (कारण): लेखक के अनुसार निबंध लिखते समय 'विषय' केवल एक खूँटी के समान होता है जिस पर लेखक अपने मन के भावों और विचारों रूपी 'हैट' को टाँगता है। अर्थात्, निबंध में असली महत्व विषय का नहीं, बल्कि उस विषय पर प्रकट की गई लेखक की सच्ची भावनाओं और विचारों का होता है।
मेरा तर्क (कारण): लेखक के अनुसार निबंध लिखते समय 'विषय' केवल एक खूँटी के समान होता है जिस पर लेखक अपने मन के भावों और विचारों रूपी 'हैट' को टाँगता है। अर्थात्, निबंध में असली महत्व विषय का नहीं, बल्कि उस विषय पर प्रकट की गई लेखक की सच्ची भावनाओं और विचारों का होता है।
प्रश्न 2. “उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है... उसका उल्लास रहता है।” मानटेन की पद्धति लेखक के लिए किस निर्णय का आधार बनती है?
सही उत्तर: (घ) अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना
मेरा तर्क (कारण): अंग्रेजी के प्रसिद्ध निबंधकार मानटेन ने किसी बंधी-बंधाई परिपाटी या भारी-भरकम ज्ञान का प्रदर्शन करने के बजाय, जो कुछ स्वयं देखा, सुना और महसूस किया, उसे स्वतंत्रता (स्वच्छंदता) के साथ लिख दिया। उसमें उनके मन का उल्लास और सच्ची अनुभूति थी। लेखक भी इसी पद्धति से प्रभावित होकर अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाने का निर्णय लेता है।
मेरा तर्क (कारण): अंग्रेजी के प्रसिद्ध निबंधकार मानटेन ने किसी बंधी-बंधाई परिपाटी या भारी-भरकम ज्ञान का प्रदर्शन करने के बजाय, जो कुछ स्वयं देखा, सुना और महसूस किया, उसे स्वतंत्रता (स्वच्छंदता) के साथ लिख दिया। उसमें उनके मन का उल्लास और सच्ची अनुभूति थी। लेखक भी इसी पद्धति से प्रभावित होकर अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाने का निर्णय लेता है।
प्रश्न 3. “तरुणों के लिए भविष्य उज्ज्वल... वृद्धों के लिए अतीत सुखद...” यह तुलना किस पर आधारित है?
सही उत्तर: (घ) अभिलाषा और अनुभव
मेरा तर्क (कारण): तरुण (युवा वर्ग) के जीवन में आगे बढ़ने की चाह, आशाएँ और सपने होते हैं, अर्थात् उनके पास 'अभिलाषा' होती है, इसलिए उन्हें भविष्य उज्ज्वल लगता है। वहीं दूसरी ओर, वृद्ध (बुजुर्ग) अपनी उम्र गुजार चुके होते हैं, उनके पास बीती हुई जिंदगी की यादें होती हैं, अर्थात् उनके पास 'अनुभव' होता है, इसलिए वे अतीत को सुखद मानते हैं। अतः यह तुलना अभिलाषा और अनुभव पर ही आधारित है।
मेरा तर्क (कारण): तरुण (युवा वर्ग) के जीवन में आगे बढ़ने की चाह, आशाएँ और सपने होते हैं, अर्थात् उनके पास 'अभिलाषा' होती है, इसलिए उन्हें भविष्य उज्ज्वल लगता है। वहीं दूसरी ओर, वृद्ध (बुजुर्ग) अपनी उम्र गुजार चुके होते हैं, उनके पास बीती हुई जिंदगी की यादें होती हैं, अर्थात् उनके पास 'अनुभव' होता है, इसलिए वे अतीत को सुखद मानते हैं। अतः यह तुलना अभिलाषा और अनुभव पर ही आधारित है।
प्रश्न 4. निबंध में अमीर खुसरो की कहानी का उल्लेख किस संदर्भ में किया गया है?
सही उत्तर: (ख) एक साथ कई विषयों को संबोधित करने की प्रतिभा दिखाने के लिए
मेरा तर्क (कारण): लेखक को एक ही निबंध में 'दूर के ढोल सुहावने' और 'समाज-सुधार' जैसे दो बिल्कुल अलग विषयों को शामिल करना था। यह कार्य कितना कठिन है, इसे स्पष्ट करने के लिए उन्होंने अमीर खुसरो का उदाहरण दिया, जिन्होंने अपनी अद्भुत प्रतिभा से एक ही पद्य (कविता) में चार अलग-अलग औरतों की माँगें (खीर, चरखा, कुत्ता, ढोल) एक साथ पूरी कर दी थीं।
मेरा तर्क (कारण): लेखक को एक ही निबंध में 'दूर के ढोल सुहावने' और 'समाज-सुधार' जैसे दो बिल्कुल अलग विषयों को शामिल करना था। यह कार्य कितना कठिन है, इसे स्पष्ट करने के लिए उन्होंने अमीर खुसरो का उदाहरण दिया, जिन्होंने अपनी अद्भुत प्रतिभा से एक ही पद्य (कविता) में चार अलग-अलग औरतों की माँगें (खीर, चरखा, कुत्ता, ढोल) एक साथ पूरी कर दी थीं।
प्रश्न 5. निबंध में समाज-सुधार के संदर्भ में क्या कहा गया है?
सही उत्तर: (क) सुधारों की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है।
मेरा तर्क (कारण): लेखक स्पष्ट करते हैं कि मानव इतिहास में कोई ऐसा काल नहीं रहा जब समाज-सुधार की आवश्यकता न पड़ी हो। जैसे-जैसे समय बदलता है, समाज में नए-नए दोष उत्पन्न होते जाते हैं और उन्हें दूर करने के लिए नए सुधारकों की आवश्यकता पड़ती है। इसलिए यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
मेरा तर्क (कारण): लेखक स्पष्ट करते हैं कि मानव इतिहास में कोई ऐसा काल नहीं रहा जब समाज-सुधार की आवश्यकता न पड़ी हो। जैसे-जैसे समय बदलता है, समाज में नए-नए दोष उत्पन्न होते जाते हैं और उन्हें दूर करने के लिए नए सुधारकों की आवश्यकता पड़ती है। इसलिए यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
मेरी समझ मेरे विचार – प्रश्न अभ्यास
प्रश्न 1. निबंध लेखन के विषय में ए.जी. गार्डिनर और लेखक के विचारों में क्या अंतर है?
ए.जी. गार्डिनर का मानना था कि निबंध लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है। उस समय मन में एक उमंग या आवेग होता है, जिसमें विषय की चिंता नहीं रहती और लेखक अपने भावों को किसी भी विषय पर व्यक्त कर सकता है (जैसे किसी भी खूँटी पर हैट टाँगना)।
इसके विपरीत, लेखक (पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी) का कहना है कि उन्होंने कभी ऐसी मानसिक स्थिति का अनुभव नहीं किया जिसमें भाव स्वतः उत्पन्न हो जाएँ। उन्हें निबंध लिखने के लिए सोचना पड़ता है, चिंता करनी पड़ती है और कठोर परिश्रम करना पड़ता है।
इसके विपरीत, लेखक (पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी) का कहना है कि उन्होंने कभी ऐसी मानसिक स्थिति का अनुभव नहीं किया जिसमें भाव स्वतः उत्पन्न हो जाएँ। उन्हें निबंध लिखने के लिए सोचना पड़ता है, चिंता करनी पड़ती है और कठोर परिश्रम करना पड़ता है।
प्रश्न 2. लेखक के अनुसार वृद्ध और तरुण दोनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं, पर दोनों की असंतुष्टि के कारण भिन्न हैं। आपके विचार से उनकी असंतुष्टि के क्या-क्या कारण हो सकते हैं?
लेखक के अनुसार वृद्ध और तरुण दोनों की असंतुष्टि के कारण एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं:
तरुण (युवा वर्ग) की असंतुष्टि: तरुणों के लिए भविष्य बहुत उज्ज्वल और आकर्षक होता है। वे वर्तमान की कमियों से असंतुष्ट रहते हैं और भविष्य की क्रांति को वर्तमान में लाना चाहते हैं। वे बदलाव के समर्थक होते हैं।
वृद्ध वर्ग की असंतुष्टि: वृद्ध लोग अपना यौवन पीछे छोड़ आए होते हैं, इसलिए उन्हें अपना अतीत बहुत सुखद लगता है। वे वर्तमान के बदलावों से खुश नहीं होते और बीते हुए अतीत के गौरव को वर्तमान में बनाए रखना चाहते हैं।
संक्षेप में, एक भविष्य के सपने देखता है और दूसरा अतीत की स्मृतियों में खोया रहता है, इसी कारण दोनों वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं।
तरुण (युवा वर्ग) की असंतुष्टि: तरुणों के लिए भविष्य बहुत उज्ज्वल और आकर्षक होता है। वे वर्तमान की कमियों से असंतुष्ट रहते हैं और भविष्य की क्रांति को वर्तमान में लाना चाहते हैं। वे बदलाव के समर्थक होते हैं।
वृद्ध वर्ग की असंतुष्टि: वृद्ध लोग अपना यौवन पीछे छोड़ आए होते हैं, इसलिए उन्हें अपना अतीत बहुत सुखद लगता है। वे वर्तमान के बदलावों से खुश नहीं होते और बीते हुए अतीत के गौरव को वर्तमान में बनाए रखना चाहते हैं।
संक्षेप में, एक भविष्य के सपने देखता है और दूसरा अतीत की स्मृतियों में खोया रहता है, इसी कारण दोनों वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं।
प्रश्न 3. नमिता और अमिता किन विषयों पर निबंध लिखवाना चाहती हैं? उनके द्वारा सुझाए गए विषयों पर निबंध लिखने में लेखक को क्या-क्या कठिनाइयाँ आईं?
नमिता 'दूर के ढोल सुहावने होते हैं' विषय पर और अमिता 'समाज-सुधार' विषय पर आदर्श निबंध लिखवाना चाहती हैं।
लेखक की कठिनाइयाँ:
1. 'दूर के ढोल सुहावने होते हैं' यह एक छोटा-सा और स्पष्ट सत्य है। लेखक को यह समझ नहीं आ रहा था कि इस छोटे से विषय को खींचकर पाँच पेज का लंबा निबंध कैसे लिखा जाए।
2. 'समाज-सुधार' एक बहुत ही पुराना, विस्तृत और विवादास्पद विषय है। इस पर बड़े-बड़े विद्वानों के अलग-अलग विचार हैं। इतने विशाल विषय को मात्र पाँच पेज में समेटना लेखक के लिए दूसरी सबसे बड़ी कठिनाई थी।
लेखक की कठिनाइयाँ:
1. 'दूर के ढोल सुहावने होते हैं' यह एक छोटा-सा और स्पष्ट सत्य है। लेखक को यह समझ नहीं आ रहा था कि इस छोटे से विषय को खींचकर पाँच पेज का लंबा निबंध कैसे लिखा जाए।
2. 'समाज-सुधार' एक बहुत ही पुराना, विस्तृत और विवादास्पद विषय है। इस पर बड़े-बड़े विद्वानों के अलग-अलग विचार हैं। इतने विशाल विषय को मात्र पाँच पेज में समेटना लेखक के लिए दूसरी सबसे बड़ी कठिनाई थी।
प्रश्न 4. निबंधशास्त्र के आचार्यों ने आदर्श निबंध लिखने की कौन-सी युक्तियाँ सुझाई हैं? आप किसी भी विषय पर निबंध लिखने से पहले किस तरह की तैयारी करते हैं?
निबंधशास्त्र के आचार्यों ने आदर्श निबंध के लिए निम्नलिखित युक्तियाँ (नियम) सुझाई हैं:
1. निबंध छोटा होना चाहिए, क्योंकि बड़े निबंध में रचना की सुंदरता नहीं बनी रह पाती।
2. भाषा में प्रवाह होना चाहिए।
3. वाक्य छोटे-छोटे और एक-दूसरे से संबद्ध (जुड़े हुए) होने चाहिए।
4. वाक्यों में अस्पष्टता या दुर्बोधता (कठिनता) नहीं होनी चाहिए।
5. निबंध लिखने से पहले उसकी रूपरेखा (Outline) अवश्य बना लेनी चाहिए।
मेरी तैयारी: मैं किसी भी विषय पर निबंध लिखने से पहले उस विषय से संबंधित जानकारी, तथ्य और सामग्री एकत्र करता हूँ। उसके बाद मुख्य बिंदुओं की एक रूपरेखा तैयार करता हूँ ताकि निबंध में विचारों की क्रमबद्धता बनी रहे और विषय से भटकाव न हो।
1. निबंध छोटा होना चाहिए, क्योंकि बड़े निबंध में रचना की सुंदरता नहीं बनी रह पाती।
2. भाषा में प्रवाह होना चाहिए।
3. वाक्य छोटे-छोटे और एक-दूसरे से संबद्ध (जुड़े हुए) होने चाहिए।
4. वाक्यों में अस्पष्टता या दुर्बोधता (कठिनता) नहीं होनी चाहिए।
5. निबंध लिखने से पहले उसकी रूपरेखा (Outline) अवश्य बना लेनी चाहिए।
मेरी तैयारी: मैं किसी भी विषय पर निबंध लिखने से पहले उस विषय से संबंधित जानकारी, तथ्य और सामग्री एकत्र करता हूँ। उसके बाद मुख्य बिंदुओं की एक रूपरेखा तैयार करता हूँ ताकि निबंध में विचारों की क्रमबद्धता बनी रहे और विषय से भटकाव न हो।
प्रश्न 5. मानटेन ने “जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबंधों में लिपिबद्ध कर दिया।” निबंध लेखन के लिए देखने, सुनने और अनुभव करने की क्या उपयोगिता हो सकती है?
निबंध लेखन में देखने, सुनने और अनुभव करने की अत्यंत महत्वपूर्ण उपयोगिता है।
जब कोई लेखक अपने स्वयं के देखे, सुने और अनुभव किए गए तथ्यों को लिखता है, तो उसमें उसकी सच्ची अनुभूति और भावनाएँ शामिल होती हैं। ऐसे निबंधों में कोरे ज्ञान या बनावटीपन का बोझ नहीं होता, बल्कि जीवन की वास्तविकता होती है। देखने और सुनने से प्राप्त अनुभव निबंध को अधिक जीवंत, आत्मीय और प्रभावशाली बनाते हैं, जिससे पाठक स्वयं को आसानी से निबंध के साथ जोड़ पाते हैं।
जब कोई लेखक अपने स्वयं के देखे, सुने और अनुभव किए गए तथ्यों को लिखता है, तो उसमें उसकी सच्ची अनुभूति और भावनाएँ शामिल होती हैं। ऐसे निबंधों में कोरे ज्ञान या बनावटीपन का बोझ नहीं होता, बल्कि जीवन की वास्तविकता होती है। देखने और सुनने से प्राप्त अनुभव निबंध को अधिक जीवंत, आत्मीय और प्रभावशाली बनाते हैं, जिससे पाठक स्वयं को आसानी से निबंध के साथ जोड़ पाते हैं।
भाव-विस्तार
पाठ में से चुनकर कुछ ऐसे और वाक्य नीचे दिए गए हैं। इन वाक्यों का अपने शब्दों में भाव-विस्तार कीजिए—
1. "जो तरुण संसार के जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र बड़ा ही मनमोहक प्रतीत होता है।"
भाव-विस्तार: युवावस्था (तरुणावस्था) में मनुष्य जीवन की कठोर वास्तविकताओं और संघर्षों से अनजान होता है। उसने अभी तक जीवन की जिम्मेदारियों, दुखों और कठिनाइयों का सामना नहीं किया होता है। इसलिए उसे यह दुनिया बहुत रंगीन, सुंदर और आकर्षक लगती है। जीवन-संग्राम (संघर्षों) से दूर होने के कारण युवाओं के लिए यह संसार सुख और आनंद से भरा हुआ एक मनमोहक चित्र प्रतीत होता है।
2. "मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल ही नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो।"
भाव-विस्तार: समाज और मानव जीवन हमेशा परिवर्तनशील रहा है। किसी भी युग या काल में समाज पूरी तरह से दोषमुक्त (perfect) नहीं रहा है। समय के साथ समाज में नई-नई कुरीतियाँ, समस्याएँ और बुराइयाँ जन्म लेती रहती हैं। इसलिए, हर युग में इन बुराइयों को दूर करने के लिए समाज-सुधारकों और सुधार-कार्यों की निरंतर आवश्यकता बनी रहती है। कोई भी समय ऐसा नहीं रहा जिसे पूरी तरह से 'पूर्ण' या 'आदर्श' कहा जा सके।
3. "आज जो तरुण हैं, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे।"
भाव-विस्तार: मनुष्य का यह स्वाभाविक गुण है कि उसे अपना बीता हुआ समय सबसे अच्छा लगता है। आज के जो युवा (तरुण) वर्तमान से असंतुष्ट होकर भविष्य के सुनहरे सपने देख रहे हैं और समाज में क्रांति या बदलाव चाहते हैं, समय बीतने पर जब वे ही वृद्ध हो जाएँगे, तब वे अपने इसी वर्तमान (जो तब अतीत बन चुका होगा) को याद करेंगे। वे उसी बीते हुए समय के गौरव के गीत गाएँगे और उसे ही सर्वश्रेष्ठ मानकर याद करेंगे।
4. "निबंध छोटा होना चाहिए। छोटा निबंध बड़े की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है।"
भाव-विस्तार: निबंध लेखन कला में उसके आकार का बहुत महत्व होता है। एक लंबा निबंध प्रायः उबाऊ हो सकता है और उसमें विचारों का दोहराव या विषय से भटकाव आ सकता है, जिससे निबंध की सुंदरता नष्ट हो जाती है। इसके विपरीत, एक छोटा निबंध अधिक कसा हुआ, सटीक और प्रभावशाली होता है। उसमें लेखक के विचार स्पष्ट रूप से सामने आते हैं और पाठक की रुचि अंत तक बनी रहती है।
मेरा अनुभव
प्रश्न: इस निबंध में लेखक को दो विषयों ('दूर के ढोल सुहावने होते हैं' और 'समाज-सुधार') पर निबंध लिखने थे। पिछली कक्षाओं में आपने भी बहुत से विषयों पर अनुच्छेद, संवाद और निबंध लिखे हैं। आपको किन विषयों पर लिखना सरल या कठिन लगा और क्यों?
उत्तर: एक विद्यार्थी के रूप में मुझे वर्णनात्मक विषयों (जैसे- 'मेरा प्रिय त्योहार', 'प्रकृति का सौंदर्य', 'कोई यात्रा-वृत्तांत' आदि) पर लिखना सरल लगा। इसका कारण यह है कि इन विषयों को मैंने अपने आस-पास देखा और महसूस किया है। इनमें अपने निजी अनुभवों और भावों को अपनी भाषा में व्यक्त करना बहुत आसान होता है।
इसके विपरीत, मुझे दार्शनिक, वैचारिक या अमूर्त विषयों (जैसे- 'सत्य ही ईश्वर है', 'समाज-सुधार', या 'विज्ञान: वरदान या अभिशाप') पर लिखना कठिन लगा। इसका कारण यह है कि ऐसे विषयों पर लिखने के लिए गहन चिंतन, सटीक आँकड़े, विस्तृत ज्ञान और परिपक्व शब्दावली की आवश्यकता होती है। विचारों को क्रमबद्ध तरीके से एक छोटे से लेख में बाँधना इन विषयों में चुनौतीपूर्ण होता है।
इसके विपरीत, मुझे दार्शनिक, वैचारिक या अमूर्त विषयों (जैसे- 'सत्य ही ईश्वर है', 'समाज-सुधार', या 'विज्ञान: वरदान या अभिशाप') पर लिखना कठिन लगा। इसका कारण यह है कि ऐसे विषयों पर लिखने के लिए गहन चिंतन, सटीक आँकड़े, विस्तृत ज्ञान और परिपक्व शब्दावली की आवश्यकता होती है। विचारों को क्रमबद्ध तरीके से एक छोटे से लेख में बाँधना इन विषयों में चुनौतीपूर्ण होता है।
विषयों से संवाद – प्रश्न अभ्यास
प्रश्न 1. निबंध में बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक आदि कई महान व्यक्तियों के नाम आए हैं। इनके विषय में जानकारी एकत्रित करके संक्षेप में बताइए कि इन्होंने अपने समय में समाज के लिए क्या-क्या कार्य किए।
इन महान व्यक्तियों ने समाज में व्याप्त कुरीतियों और आडंबरों को दूर करने के लिए निम्नलिखित कार्य किए:
1. बुद्धदेव (गौतम बुद्ध): इन्होंने समाज में व्याप्त अंधविश्वास, पशु-बलि और जाति-पांति का विरोध किया। उन्होंने सत्य, अहिंसा, करुणा और समानता का उपदेश देकर बौद्ध धर्म की स्थापना की।
2. महावीर स्वामी: इन्होंने जैन धर्म के सिद्धांतों का प्रचार किया। समाज को सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), अपरिग्रह और सबसे बढ़कर 'अहिंसा' का मार्ग दिखाया।
3. नागार्जुन: ये एक महान बौद्ध दार्शनिक थे। इन्होंने 'शून्यवाद' का सिद्धांत दिया और बौद्ध दर्शन को एक नई तार्किक दिशा प्रदान कर समाज को वैचारिक रूप से समृद्ध किया।
4. शंकराचार्य: इन्होंने भारतीय समाज में 'अद्वैत वेदांत' की स्थापना की। देश के चारों कोनों में चार मठों की स्थापना करके भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म को पुनः संगठित किया।
5. कबीर: इन्होंने समाज में फैले धार्मिक आडंबरों, छुआछूत और हिंदू-मुस्लिम भेदभाव का कड़ा विरोध किया। अपनी साखियों और दोहों के माध्यम से समाज को मानवता का संदेश दिया।
6. गुरु नानक: सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक ने जात-पात का खंडन किया। 'लंगर' प्रथा शुरू की, जिसमें सभी धर्म और जाति के लोग एक साथ बैठकर भोजन कर सकें। उन्होंने समाज को प्रेम और भाईचारे का संदेश दिया।
1. बुद्धदेव (गौतम बुद्ध): इन्होंने समाज में व्याप्त अंधविश्वास, पशु-बलि और जाति-पांति का विरोध किया। उन्होंने सत्य, अहिंसा, करुणा और समानता का उपदेश देकर बौद्ध धर्म की स्थापना की।
2. महावीर स्वामी: इन्होंने जैन धर्म के सिद्धांतों का प्रचार किया। समाज को सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), अपरिग्रह और सबसे बढ़कर 'अहिंसा' का मार्ग दिखाया।
3. नागार्जुन: ये एक महान बौद्ध दार्शनिक थे। इन्होंने 'शून्यवाद' का सिद्धांत दिया और बौद्ध दर्शन को एक नई तार्किक दिशा प्रदान कर समाज को वैचारिक रूप से समृद्ध किया।
4. शंकराचार्य: इन्होंने भारतीय समाज में 'अद्वैत वेदांत' की स्थापना की। देश के चारों कोनों में चार मठों की स्थापना करके भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म को पुनः संगठित किया।
5. कबीर: इन्होंने समाज में फैले धार्मिक आडंबरों, छुआछूत और हिंदू-मुस्लिम भेदभाव का कड़ा विरोध किया। अपनी साखियों और दोहों के माध्यम से समाज को मानवता का संदेश दिया।
6. गुरु नानक: सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक ने जात-पात का खंडन किया। 'लंगर' प्रथा शुरू की, जिसमें सभी धर्म और जाति के लोग एक साथ बैठकर भोजन कर सकें। उन्होंने समाज को प्रेम और भाईचारे का संदेश दिया।
प्रश्न 2. निबंध में उल्लिखित महान व्यक्तियों ने अपने द्वारा किए गए कार्यों से समाज को एक नई दिशा दिखाई। हमारे आस-पास और भी ऐसे व्यक्ति और संस्थाएँ हैं जो स्त्री-शिक्षा, पर्यावरण, असमानता, विशेष आवश्यकता समूह (दिव्यांगजन) आदि के लिए कार्य करते हैं। ऐसे व्यक्तियों, संस्थाओं के विषय में पता लगाइए और लिखिए।
हमारे समाज में आज भी कई व्यक्ति और संस्थाएँ विभिन्न क्षेत्रों में निस्वार्थ भाव से कार्य कर रही हैं:
स्त्री-शिक्षा और अधिकार: 'कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेंस फाउंडेशन' और 'गूँज' (Gooj) जैसी संस्थाएँ बच्चियों की शिक्षा, बाल विवाह रोकने और महिला सशक्तिकरण की दिशा में अद्भुत कार्य कर रही हैं।
पर्यावरण संरक्षण: 'सुंदरलाल बहुगुणा' (चिपको आंदोलन) और वर्तमान में 'जादव पायेंग' (फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया) जैसे व्यक्तियों ने पर्यावरण बचाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। संस्थाओं में 'ग्रीनपीस इंडिया' और 'तरुण भारत संघ' पर्यावरण के लिए सक्रिय हैं।
असमानता और गरीबी उन्मूलन: 'मदर टेरेसा' की संस्था 'मिशनरीज ऑफ चैरिटी' और 'CRY' (Child Rights and You) संस्था गरीब और अनाथ बच्चों के लिए काम करती है।
दिव्यांगजनों के लिए: 'नारायण सेवा संस्थान' (उदयपुर) और 'हेल्पएज इंडिया' जैसी संस्थाएँ दिव्यांगों के मुफ्त इलाज, पुनर्वास और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का कार्य निरंतर कर रही हैं।
स्त्री-शिक्षा और अधिकार: 'कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेंस फाउंडेशन' और 'गूँज' (Gooj) जैसी संस्थाएँ बच्चियों की शिक्षा, बाल विवाह रोकने और महिला सशक्तिकरण की दिशा में अद्भुत कार्य कर रही हैं।
पर्यावरण संरक्षण: 'सुंदरलाल बहुगुणा' (चिपको आंदोलन) और वर्तमान में 'जादव पायेंग' (फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया) जैसे व्यक्तियों ने पर्यावरण बचाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। संस्थाओं में 'ग्रीनपीस इंडिया' और 'तरुण भारत संघ' पर्यावरण के लिए सक्रिय हैं।
असमानता और गरीबी उन्मूलन: 'मदर टेरेसा' की संस्था 'मिशनरीज ऑफ चैरिटी' और 'CRY' (Child Rights and You) संस्था गरीब और अनाथ बच्चों के लिए काम करती है।
दिव्यांगजनों के लिए: 'नारायण सेवा संस्थान' (उदयपुर) और 'हेल्पएज इंडिया' जैसी संस्थाएँ दिव्यांगों के मुफ्त इलाज, पुनर्वास और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का कार्य निरंतर कर रही हैं।
प्रश्न 3. आपको 'समाज-सुधार' करने का अवसर मिले तो आप क्या-क्या सुधार करना चाहेंगे और कैसे करना चाहेंगे? लिखिए।
यदि मुझे समाज-सुधार का अवसर मिले, तो मैं निम्नलिखित सुधार करना चाहूँगा:
1. शिक्षा में समानता: मैं यह सुनिश्चित करने का प्रयास करूँगा कि अमीर हो या गरीब, हर बच्चे को समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले। इसके लिए मैं मुफ्त कोचिंग और पुस्तकालयों की व्यवस्था करूँगा।
2. स्वच्छता और पर्यावरण: समाज को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए मैं लोगों को जागरूक करूँगा। हर मोहल्ले में 'कचरा प्रबंधन' और 'वृक्षारोपण' अभियान चलाऊँगा।
3. डिजिटल साक्षरता: ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के लोगों, विशेषकर महिलाओं और वृद्धों को डिजिटल रूप से साक्षर बनाने के लिए निःशुल्क कैंप लगाऊँगा ताकि वे साइबर धोखाधड़ी से बच सकें।
कैसे करूँगा? मैं इन कार्यों को अकेले नहीं, बल्कि अपने जैसे युवाओं की एक टीम बनाकर, सोशल मीडिया के माध्यम से जागरूकता फैलाकर और स्थानीय प्रशासन का सहयोग लेकर पूरा करने का प्रयास करूँगा।
1. शिक्षा में समानता: मैं यह सुनिश्चित करने का प्रयास करूँगा कि अमीर हो या गरीब, हर बच्चे को समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले। इसके लिए मैं मुफ्त कोचिंग और पुस्तकालयों की व्यवस्था करूँगा।
2. स्वच्छता और पर्यावरण: समाज को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए मैं लोगों को जागरूक करूँगा। हर मोहल्ले में 'कचरा प्रबंधन' और 'वृक्षारोपण' अभियान चलाऊँगा।
3. डिजिटल साक्षरता: ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के लोगों, विशेषकर महिलाओं और वृद्धों को डिजिटल रूप से साक्षर बनाने के लिए निःशुल्क कैंप लगाऊँगा ताकि वे साइबर धोखाधड़ी से बच सकें।
कैसे करूँगा? मैं इन कार्यों को अकेले नहीं, बल्कि अपने जैसे युवाओं की एक टीम बनाकर, सोशल मीडिया के माध्यम से जागरूकता फैलाकर और स्थानीय प्रशासन का सहयोग लेकर पूरा करने का प्रयास करूँगा।
प्रश्न 4. भारतीय ज्ञान साहित्य में अनेक स्थानों पर नैतिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन में संतुलन की बात की गई है। इस विषय पर अपने शिक्षक के साथ मिलकर चर्चा कीजिए।
चर्चा के मुख्य बिंदु:
भारतीय साहित्य, विशेषकर गीता, उपनिषद और पंचतंत्र जैसे ग्रंथों में जीवन के तीनों आयामों (नैतिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक) में संतुलन स्थापित करने पर जोर दिया गया है।
व्यावहारिक जीवन: हमें अपने सांसारिक कर्तव्यों (पढ़ाई, नौकरी, परिवार का भरण-पोषण) को पूरी ईमानदारी और मेहनत से करना चाहिए।
नैतिक जीवन: व्यावहारिक जीवन जीते समय हमें नैतिकता (सत्य, ईमानदारी, परोपकार) का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। धन कमाना बुरा नहीं है, लेकिन अनैतिक तरीकों से कमाना गलत है।
आध्यात्मिक जीवन: व्यावहारिक आपाधापी में मनुष्य तनावग्रस्त हो जाता है। इसलिए, ध्यान, योग और ईश्वर स्मरण (आध्यात्म) मन को शांति और स्थिरता प्रदान करते हैं।
अर्थात, एक सफल और सुखी जीवन के लिए व्यक्ति को भौतिक उन्नति के साथ-साथ नैतिक और आध्यात्मिक रूप से भी मजबूत होना चाहिए। यही भारतीय साहित्य का मूल संदेश है।
भारतीय साहित्य, विशेषकर गीता, उपनिषद और पंचतंत्र जैसे ग्रंथों में जीवन के तीनों आयामों (नैतिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक) में संतुलन स्थापित करने पर जोर दिया गया है।
व्यावहारिक जीवन: हमें अपने सांसारिक कर्तव्यों (पढ़ाई, नौकरी, परिवार का भरण-पोषण) को पूरी ईमानदारी और मेहनत से करना चाहिए।
नैतिक जीवन: व्यावहारिक जीवन जीते समय हमें नैतिकता (सत्य, ईमानदारी, परोपकार) का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। धन कमाना बुरा नहीं है, लेकिन अनैतिक तरीकों से कमाना गलत है।
आध्यात्मिक जीवन: व्यावहारिक आपाधापी में मनुष्य तनावग्रस्त हो जाता है। इसलिए, ध्यान, योग और ईश्वर स्मरण (आध्यात्म) मन को शांति और स्थिरता प्रदान करते हैं।
अर्थात, एक सफल और सुखी जीवन के लिए व्यक्ति को भौतिक उन्नति के साथ-साथ नैतिक और आध्यात्मिक रूप से भी मजबूत होना चाहिए। यही भारतीय साहित्य का मूल संदेश है।
सृजन – रचनात्मक लेखन
प्रश्न 1. ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ एक लोकोक्ति है। आपने यह लोकोक्ति भी सुनी होगी— ‘आम के आम गुठलियों के दाम’। अब आप इस लोकोक्ति और ‘जैविक खाद की निर्मिति में हमारा प्रयास’ विषय को मिलाकर एक संक्षिप्त लेख तैयार कीजिए।
आम के आम गुठलियों के दाम (जैविक खाद की निर्मिति में हमारा प्रयास)
हमारे आस-पास प्रतिदिन भारी मात्रा में घरेलू कचरा, जैसे सब्जियों के छिलके, फलों के अवशेष, सूखी पत्तियाँ और बचा हुआ भोजन निकलता है। सामान्यतः हम इसे बेकार समझकर कूड़ेदान में फेंक देते हैं, जिससे गंदगी और बीमारियाँ फैलती हैं। लेकिन यदि हम थोड़ी समझदारी दिखाएँ, तो इस कचरे का बेहतरीन उपयोग किया जा सकता है।
हमने अपने घर और सोसायटी के स्तर पर इस गीले कचरे से जैविक खाद (कम्पोस्ट) बनाने का प्रयास शुरू किया। हमने एक बड़ा गड्ढा या मटका लिया और उसमें मिट्टी के साथ यह सारा गीला कचरा डालना शुरू किया। कुछ ही हफ्तों में प्राकृतिक प्रक्रिया (सूक्ष्मजीवों) द्वारा यह कचरा एक अत्यंत उपजाऊ और गंधहीन 'जैविक खाद' में बदल गया।
इस प्रयास से हमें दोहरे लाभ हुए। एक तरफ तो हमारा आस-पास का वातावरण साफ-सुथरा और प्रदूषण मुक्त हो गया, और दूसरी तरफ हमें अपने पेड़-पौधों के लिए मुफ्त में उच्च गुणवत्ता वाली रासायनिक-मुक्त खाद मिल गई। इससे हमारे गमलों में लगे पौधों की हरियाली और फलों-सब्जियों की पैदावार बढ़ गई। सचमुच, बेकार समझे जाने वाले कचरे से मूल्यवान खाद बनाना ‘आम के आम और गुठलियों के दाम’ वाली कहावत को पूरी तरह से चरितार्थ करता है।
हमारे आस-पास प्रतिदिन भारी मात्रा में घरेलू कचरा, जैसे सब्जियों के छिलके, फलों के अवशेष, सूखी पत्तियाँ और बचा हुआ भोजन निकलता है। सामान्यतः हम इसे बेकार समझकर कूड़ेदान में फेंक देते हैं, जिससे गंदगी और बीमारियाँ फैलती हैं। लेकिन यदि हम थोड़ी समझदारी दिखाएँ, तो इस कचरे का बेहतरीन उपयोग किया जा सकता है।
हमने अपने घर और सोसायटी के स्तर पर इस गीले कचरे से जैविक खाद (कम्पोस्ट) बनाने का प्रयास शुरू किया। हमने एक बड़ा गड्ढा या मटका लिया और उसमें मिट्टी के साथ यह सारा गीला कचरा डालना शुरू किया। कुछ ही हफ्तों में प्राकृतिक प्रक्रिया (सूक्ष्मजीवों) द्वारा यह कचरा एक अत्यंत उपजाऊ और गंधहीन 'जैविक खाद' में बदल गया।
इस प्रयास से हमें दोहरे लाभ हुए। एक तरफ तो हमारा आस-पास का वातावरण साफ-सुथरा और प्रदूषण मुक्त हो गया, और दूसरी तरफ हमें अपने पेड़-पौधों के लिए मुफ्त में उच्च गुणवत्ता वाली रासायनिक-मुक्त खाद मिल गई। इससे हमारे गमलों में लगे पौधों की हरियाली और फलों-सब्जियों की पैदावार बढ़ गई। सचमुच, बेकार समझे जाने वाले कचरे से मूल्यवान खाद बनाना ‘आम के आम और गुठलियों के दाम’ वाली कहावत को पूरी तरह से चरितार्थ करता है।
प्रश्न 2. "जब ढोल के पास बैठे हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, तब दूर किसी नदी के तट पर संध्या समय, किसी दूसरे के कान में वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं।"
आपने पढ़ा कि ढोल के पास बैठे व्यक्ति की अपेक्षा दूर बैठे व्यक्ति के लिए ढोल की आवाज़ का अनुभव भिन्न है। अपने अनुभव के आधार पर किसी ऐसी घटना का उल्लेख अपनी डायरी में कीजिए, जब किसी वस्तु, व्यक्ति या संस्था के विषय में दूर से आपका अनुमान कुछ और रहा हो, पर निकट से आपका अनुभव बिल्कुल अलग रहा हो।
आपने पढ़ा कि ढोल के पास बैठे व्यक्ति की अपेक्षा दूर बैठे व्यक्ति के लिए ढोल की आवाज़ का अनुभव भिन्न है। अपने अनुभव के आधार पर किसी ऐसी घटना का उल्लेख अपनी डायरी में कीजिए, जब किसी वस्तु, व्यक्ति या संस्था के विषय में दूर से आपका अनुमान कुछ और रहा हो, पर निकट से आपका अनुभव बिल्कुल अलग रहा हो।
डायरी लेखन
दिनांक: 25 अक्टूबर 2023
दिन: बुधवार
समय: रात 9:00 बजे
प्रिय डायरी,
आज मुझे यह अहसास हुआ कि हम दूर से चीजों को देखकर जैसी धारणा बना लेते हैं, वास्तविकता अक्सर उससे बिल्कुल भिन्न होती है। कुछ दिनों पहले तक मैं अपने विद्यालय के नए गणित शिक्षक, श्रीमान शर्मा जी के बारे में बहुत गलत सोचता था। दूर से देखने पर वे बहुत ही सख्त, गंभीर और क्रोधी स्वभाव के लगते थे। वे हमेशा अनुशासन की बात करते थे और स्कूल के बरामदे में उन्हें देखकर ही हम बच्चे डर के मारे रास्ता बदल लिया करते थे। मुझे लगा कि उनकी क्लास बहुत नीरस और डरावनी होगी।
परंतु कल जब उन्होंने हमारी कक्षा में पढ़ाना शुरू किया, तो मेरा सारा भ्रम टूट गया। पास से उन्हें जानने पर पता चला कि उनका स्वभाव अंदर से बहुत ही विनम्र और स्नेहपूर्ण है। उन्होंने गणित के कठिन सवालों को इतने मज़ेदार और आसान तरीके (चुटकुले सुनाकर) से समझाया कि पूरी क्लास हँसते-हँसते गणित सीख गई। वे किसी भी बच्चे के गलत उत्तर देने पर डाँटते नहीं, बल्कि प्यार से समझाते हैं। उनका वह बाहर का सख्त आवरण केवल बच्चों को अनुशासित रखने के लिए था।
सचमुच, यह बिल्कुल 'दूर के ढोल सुहावने' (या इस मामले में डरावने) होने जैसा था। दूर से जो व्यक्ति मुझे अत्यंत कठोर प्रतीत हो रहा था, पास जाने पर वही व्यक्ति मेरे सबसे पसंदीदा और दयालु शिक्षक बन गए। इस घटना ने मुझे सिखाया कि किसी भी व्यक्ति या वस्तु को बिना करीब से जाने उसके बारे में कोई भी राय (अनुमान) नहीं बनानी चाहिए।
शुभ रात्रि!
तुम्हारा/तुम्हारी,
(अपना नाम लिखें)
दिनांक: 25 अक्टूबर 2023
दिन: बुधवार
समय: रात 9:00 बजे
प्रिय डायरी,
आज मुझे यह अहसास हुआ कि हम दूर से चीजों को देखकर जैसी धारणा बना लेते हैं, वास्तविकता अक्सर उससे बिल्कुल भिन्न होती है। कुछ दिनों पहले तक मैं अपने विद्यालय के नए गणित शिक्षक, श्रीमान शर्मा जी के बारे में बहुत गलत सोचता था। दूर से देखने पर वे बहुत ही सख्त, गंभीर और क्रोधी स्वभाव के लगते थे। वे हमेशा अनुशासन की बात करते थे और स्कूल के बरामदे में उन्हें देखकर ही हम बच्चे डर के मारे रास्ता बदल लिया करते थे। मुझे लगा कि उनकी क्लास बहुत नीरस और डरावनी होगी।
परंतु कल जब उन्होंने हमारी कक्षा में पढ़ाना शुरू किया, तो मेरा सारा भ्रम टूट गया। पास से उन्हें जानने पर पता चला कि उनका स्वभाव अंदर से बहुत ही विनम्र और स्नेहपूर्ण है। उन्होंने गणित के कठिन सवालों को इतने मज़ेदार और आसान तरीके (चुटकुले सुनाकर) से समझाया कि पूरी क्लास हँसते-हँसते गणित सीख गई। वे किसी भी बच्चे के गलत उत्तर देने पर डाँटते नहीं, बल्कि प्यार से समझाते हैं। उनका वह बाहर का सख्त आवरण केवल बच्चों को अनुशासित रखने के लिए था।
सचमुच, यह बिल्कुल 'दूर के ढोल सुहावने' (या इस मामले में डरावने) होने जैसा था। दूर से जो व्यक्ति मुझे अत्यंत कठोर प्रतीत हो रहा था, पास जाने पर वही व्यक्ति मेरे सबसे पसंदीदा और दयालु शिक्षक बन गए। इस घटना ने मुझे सिखाया कि किसी भी व्यक्ति या वस्तु को बिना करीब से जाने उसके बारे में कोई भी राय (अनुमान) नहीं बनानी चाहिए।
शुभ रात्रि!
तुम्हारा/तुम्हारी,
(अपना नाम लिखें)
व्याकरण की बात – समास
प्रश्न: निबंध में ऐसे अनेक सामासिक शब्द आए हैं। उन शब्दों को ढूँढ़कर उनका समास विग्रह कीजिए और समास का नाम लिखिए। आपकी समझ के लिए एक उदाहरण पाठ्यपुस्तक की तालिका में दिया गया है। पाठ से अन्य उदाहरण चुनकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए।
पाठ 'क्या लिखूँ?' से चुने गए प्रमुख सामासिक शब्द, उनका समास विग्रह और समास के नाम नीचे दी गई तालिका में प्रस्तुत किए गए हैं:
| सामासिक पद | समास विग्रह | समास का नाम |
|---|---|---|
| निबंधशास्त्र | निबंध का शास्त्र | तत्पुरुष समास |
| लोकजीवन | लोक का जीवन | तत्पुरुष समास |
| समाज-सुधार | समाज का सुधार | तत्पुरुष समास |
| विचार-समूह | विचारों का समूह | तत्पुरुष समास |
| नव-वधू | नव (नई) है जो वधू | कर्मधारय समास |
| अतीतकाल | अतीत (बीता हुआ) है जो काल | कर्मधारय समास |
| त्रिदेव | तीन देवों का समूह | द्विगु समास |
| पंच-पात्र | पाँच पात्रों का समूह | द्विगु समास |
| छोटा-बड़ा | छोटा और बड़ा | द्वंद्व समास |
| नगर-नगर | प्रत्येक नगर | अव्ययीभाव समास |
| गाँव-गाँव | प्रत्येक गाँव | अव्ययीभाव समास |
| यथार्थता | अर्थ के अनुसार (यथार्थ) | अव्ययीभाव समास |
व्याकरण की बात – उपसर्ग एवं प्रत्यय
प्रश्न 1. निबंध से उपसर्ग और प्रत्यय वाले शब्द ढूँढ़कर अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए।
उपसर्ग वाले शब्द:
• प्रसिद्ध (प्र + सिद्ध)
• अनादि (अन् + आदि)
• विशेष (वि + शेष)
• सुधार (सु + धार)
• उपयुक्त (उप + युक्त)
प्रत्यय वाले शब्द:
• यथार्थता (यथार्थ + ता)
• कठिनता (कठिन + ता)
• सुंदरता (सुंदर + ता)
• मानसिक (मानस + इक)
• साहित्यिक (साहित्य + इक)
• प्रसिद्ध (प्र + सिद्ध)
• अनादि (अन् + आदि)
• विशेष (वि + शेष)
• सुधार (सु + धार)
• उपयुक्त (उप + युक्त)
प्रत्यय वाले शब्द:
• यथार्थता (यथार्थ + ता)
• कठिनता (कठिन + ता)
• सुंदरता (सुंदर + ता)
• मानसिक (मानस + इक)
• साहित्यिक (साहित्य + इक)
प्रश्न 2. नीचे दिए गए वाक्यों को उचित उपसर्ग या प्रत्यय लगाकर पूरा कीजिए—
• निबंध लिखना बड़ी _____________ (कठिन...) की बात है।
• वर्तमान से दोनों को _____________ (...संतोष) होता है।
• वाक्यों में कुछ _____________ (...स्पष्ट...) भी चाहिए, क्योंकि यह ____________ (...स्पष्ट...) या _____________ (...बोध...) गांभीर्य ला देती है।
• निबंध लिखना बड़ी _____________ (कठिन...) की बात है।
• वर्तमान से दोनों को _____________ (...संतोष) होता है।
• वाक्यों में कुछ _____________ (...स्पष्ट...) भी चाहिए, क्योंकि यह ____________ (...स्पष्ट...) या _____________ (...बोध...) गांभीर्य ला देती है।
उत्तर:
• निबंध लिखना बड़ी कठिनाई की बात है। (कठिन + आई प्रत्यय)
• वर्तमान से दोनों को असन्तोष होता है। (अ उपसर्ग + संतोष)
• वाक्यों में कुछ अस्पष्टता भी चाहिए, क्योंकि यह अस्पष्टता या दुर्बोधता गांभीर्य ला देती है।
(अस्पष्टता = अ उपसर्ग + स्पष्ट + ता प्रत्यय)
(दुर्बोधता = दुर् उपसर्ग + बोध + ता प्रत्यय)
• निबंध लिखना बड़ी कठिनाई की बात है। (कठिन + आई प्रत्यय)
• वर्तमान से दोनों को असन्तोष होता है। (अ उपसर्ग + संतोष)
• वाक्यों में कुछ अस्पष्टता भी चाहिए, क्योंकि यह अस्पष्टता या दुर्बोधता गांभीर्य ला देती है।
(अस्पष्टता = अ उपसर्ग + स्पष्ट + ता प्रत्यय)
(दुर्बोधता = दुर् उपसर्ग + बोध + ता प्रत्यय)
प्रश्न 3. नीचे दिए गए शब्दों में उपसर्ग या प्रत्यय लगाकर नए शब्द बनाकर लिखिए।
शब्द: मधुर, सुधार, सुंदर, गति, समाज
शब्द: मधुर, सुधार, सुंदर, गति, समाज
उत्तर:
1. मधुर:
• मधुरता (मधुर + ता प्रत्यय)
• माधुर्य (मधुर + य प्रत्यय)
• सुमधुर (सु उपसर्ग + मधुर)
2. सुधार:
• सुधारक (सुधार + अक प्रत्यय)
• सुधारात्मक (सुधार + आत्मक प्रत्यय)
• असुधार (अ उपसर्ग + सुधार)
3. सुंदर:
• सुंदरता (सुंदर + ता प्रत्यय)
• सौंदर्य (सुंदर + य प्रत्यय)
• अतिसुंदर (अति उपसर्ग + सुंदर)
4. गति:
• प्रगति (प्र उपसर्ग + गति)
• दुर्गति (दुर् उपसर्ग + गति)
• गतिशीलता (गति + शील + ता प्रत्यय)
5. समाज:
• सामाजिक (समाज + इक प्रत्यय)
• असामाजिक (अ उपसर्ग + समाज + इक प्रत्यय)
• समाजवाद (समाज + वाद प्रत्यय)
1. मधुर:
• मधुरता (मधुर + ता प्रत्यय)
• माधुर्य (मधुर + य प्रत्यय)
• सुमधुर (सु उपसर्ग + मधुर)
2. सुधार:
• सुधारक (सुधार + अक प्रत्यय)
• सुधारात्मक (सुधार + आत्मक प्रत्यय)
• असुधार (अ उपसर्ग + सुधार)
3. सुंदर:
• सुंदरता (सुंदर + ता प्रत्यय)
• सौंदर्य (सुंदर + य प्रत्यय)
• अतिसुंदर (अति उपसर्ग + सुंदर)
4. गति:
• प्रगति (प्र उपसर्ग + गति)
• दुर्गति (दुर् उपसर्ग + गति)
• गतिशीलता (गति + शील + ता प्रत्यय)
5. समाज:
• सामाजिक (समाज + इक प्रत्यय)
• असामाजिक (अ उपसर्ग + समाज + इक प्रत्यय)
• समाजवाद (समाज + वाद प्रत्यय)
व्याकरण की बात – भाव एक शब्द अनेक
प्रश्न: इस पाठ में अनेक ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया है जिनके अर्थ परस्पर मिलते-जुलते हैं। उदाहरण के लिए, विचार-मनन-चिंतन या सुहावने-मधुर-मनमोहक। पाठ में से ऐसे शब्द ढूँढ़िए तथा वाक्य प्रयोग के द्वारा उनके अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: पाठ से ढूँढ़े गए समान अर्थ वाले (मिलते-जुलते) शब्द और उनके वाक्य प्रयोग निम्नलिखित हैं:
1. भ्रम – संदेह – शंका
• भ्रम (Misconception): उसे यह भ्रम है कि वह बिना पढ़े ही परीक्षा में पास हो जाएगा।
• संदेह (Doubt): मुझे तुम्हारी इस बात पर संदेह है।
• शंका (Apprehension): रात के अंधेरे में मुझे चोरी होने की शंका होने लगी।
2. उल्लास – उमंग – आनंद
• उल्लास (Joy/Delight): परीक्षा में प्रथम आने पर उसके चेहरे पर उल्लास छा गया।
• उमंग (Enthusiasm): युवावस्था में मन में कुछ कर गुजरने की एक नई उमंग होती है।
• आनंद (Bliss): प्रकृति की गोद में बैठकर जो आनंद मिलता है, वह कहीं और नहीं।
3. कठिनता – कठिनाई – समस्या
• कठिनता (Difficulty level): इस प्रश्न की कठिनता को देखकर सभी विद्यार्थी हैरान रह गए।
• कठिनाई (Hardship): जीवन में सफल होने के लिए कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
• समस्या (Problem): प्रदूषण आज के समय की सबसे बड़ी समस्या बन गई है।
4. गौरव – महिमा – गरिमा
• गौरव (Pride/Glory): वृद्ध लोग हमेशा अतीत के गौरव का गान करते हैं।
• महिमा (Greatness): ईश्वर की महिमा अपरंपार है।
• गरिमा (Dignity): हमें अपने पद की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए।
1. भ्रम – संदेह – शंका
• भ्रम (Misconception): उसे यह भ्रम है कि वह बिना पढ़े ही परीक्षा में पास हो जाएगा।
• संदेह (Doubt): मुझे तुम्हारी इस बात पर संदेह है।
• शंका (Apprehension): रात के अंधेरे में मुझे चोरी होने की शंका होने लगी।
2. उल्लास – उमंग – आनंद
• उल्लास (Joy/Delight): परीक्षा में प्रथम आने पर उसके चेहरे पर उल्लास छा गया।
• उमंग (Enthusiasm): युवावस्था में मन में कुछ कर गुजरने की एक नई उमंग होती है।
• आनंद (Bliss): प्रकृति की गोद में बैठकर जो आनंद मिलता है, वह कहीं और नहीं।
3. कठिनता – कठिनाई – समस्या
• कठिनता (Difficulty level): इस प्रश्न की कठिनता को देखकर सभी विद्यार्थी हैरान रह गए।
• कठिनाई (Hardship): जीवन में सफल होने के लिए कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
• समस्या (Problem): प्रदूषण आज के समय की सबसे बड़ी समस्या बन गई है।
4. गौरव – महिमा – गरिमा
• गौरव (Pride/Glory): वृद्ध लोग हमेशा अतीत के गौरव का गान करते हैं।
• महिमा (Greatness): ईश्वर की महिमा अपरंपार है।
• गरिमा (Dignity): हमें अपने पद की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए।
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