बादल को घिरते देखा है : सप्रसंग व्याख्या (Badal Ko Ghirte Dekha Hai Class 11 Explanation)
नमस्कार विद्यार्थियों! आज के इस ब्लॉग पोस्ट में हम कक्षा 11वीं हिंदी (अंतरा भाग-1) की प्रसिद्ध कविता 'बादल को घिरते देखा है' का संपूर्ण भावार्थ समझेंगे। इसके रचयिता जनकवि नागार्जुन हैं। इस कविता में कवि ने हिमालय की प्राकृतिक सुंदरता और वहाँ के जीवन का अत्यंत सजीव चित्रण किया है।
कविता का सार (Summary)
नागार्जुन जी ने अपनी यात्राओं के अनुभव के आधार पर हिमालय का वर्णन किया है। वे बताते हैं कि कैसे सफेद चोटियों पर बादल घिर आते हैं। मानसरोवर झील में तैरते हंस, वसंत की सुबह चकवा-चकवी पक्षियों का मिलन और कस्तूरी मृग की अपनी ही सुगंध को न पाकर होने वाली बेचैनी का उन्होंने वर्णन किया है। अंत में वे किन्नर-किन्नरियों के विलासपूर्ण जीवन का चित्र खींचते हैं। यह कविता कालिदास के मेघदूत से अलग, हिमालय का यथार्थवादी चित्रण है।
पद्यांश 1: मानसरोवर और हंस
अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है।
छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहिन कणों को,
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।
तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की उमस से आकुल
तिक्त-मधुर विषतंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- अमल : स्वच्छ / निर्मल
- धवल : सफेद
- तुहिन कण : ओस की बूँदें / बर्फ के कण
- तुंग : ऊँचे
- सलिल : जल / पानी
- पावस : वर्षा ऋतु
- आकुल : व्याकुल / परेशान
- तिक्त-मधुर विषतंतु : कड़वे-मीठे कमलनाल के रेशे (कीड़े)
- तिरते : तैरते हुए
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
कवि नागार्जुन कहते हैं कि मैंने हिमालय की निर्मल और बर्फ से ढकी सफेद चोटियों (अमल धवल गिरि) पर बादलों को घिरते हुए देखा है। जब बादलों से छोटी-छोटी ठंडी ओस की बूँदें (तुहिन कण) मोतियों की तरह गिरती हैं, तो वे मानसरोवर झील में खिले हुए सुनहरे कमलों पर बहुत सुंदर लगती हैं।
कवि आगे कहते हैं कि ऊँचे हिमालय के कंधों पर (पहाड़ों के बीच) कई छोटी-बड़ी झीलें हैं। उन झीलों के गहरे नीले पानी (श्यामल नील सलिल) में मैंने हंसों को तैरते देखा है। ये हंस मैदानी इलाकों (समतल देशों) की भीषण गर्मी और उमस से परेशान होकर यहाँ ठंडक पाने आते हैं और झीलों में तैरते हुए कमलनाल के कड़वे-मीठे रेशों (विषतंतु) को खोजकर खाते हैं।
विशेष (Vishesh):
- 'मोती जैसे' में उपमा अलंकार है।
- 'तिक्त-मधुर' में विरोधाभास है।
- प्रकृति का मनोरम चित्रण है।
पद्यांश 2: वसंत की सुबह और चकवा-चकवी
ऋतु वसंत का सुप्रभात था
मंद-मंद था अनिल बह रहा
बालारुण की मृदु किरणें थीं
अगल-बगल स्वर्णाभ शिखर थे
एक-दूसरे से विरहित हो
अलग-अलग रहकर ही जिनको
सारी रात बितानी होती,
निशा-काल के चिर-अभिशापित
बेबस उस चकवा-चकई का
बंद हुआ क्रंदन, फिर उनमें
उस महान सरवर के तीरे
शैवालों की हरी दरी पर
प्रणय-कलह छिड़ते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- सुप्रभात : सुंदर सुबह
- अनिल : हवा
- बालारुण : उगता हुआ लाल सूर्य (बाल+अरुण)
- स्वर्णाभ : सोने जैसी आभा वाले
- विरहित : अलग होकर
- निशा-काल : रात का समय
- चिर-अभिशापित : लंबे समय से शाप मिला हुआ
- क्रंदन : रोना / विलाप
- शैवाल : काई (Moss)
- प्रणय-कलह : प्रेम भरी नोक-झोंक / झगड़ा
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
कवि कहते हैं कि वसंत ऋतु की सुंदर सुबह थी। धीमी-धीमी (मंद-मंद) हवा बह रही थी। उगते हुए सूरज (बालारुण) की कोमल किरणें पर्वतों पर पड़ रही थीं, जिससे आस-पास की चोटियाँ सोने जैसी चमक (स्वर्णाभ) रही थीं।
चकवा और चकवी पक्षी, जिन्हें शाप मिला हुआ है कि वे रात भर एक साथ नहीं रह सकते और उन्हें अलग-अलग रहकर ही रात बितानी पड़ती है, उनका रात भर का रोना-धोना (क्रंदन) अब सुबह होते ही बंद हो गया है।
वे उस महान सरोवर (झील) के किनारे उगी हुई हरी काई (शैवालों की हरी दरी) पर फिर से मिल गए हैं और आपस में प्रेम भरी नोक-झोंक (प्रणय-कलह) कर रहे हैं। कवि कहते हैं कि मैंने इस सुंदर मिलन के दृश्य के बीच बादलों को घिरते देखा है।
विशेष (Vishesh):
- 'शैवालों की हरी दरी' में रूपक अलंकार है।
- 'मंद-मंद', 'अलग-अलग' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
- संयोग श्रृंगार का सुंदर उदाहरण है।
पद्यांश 3: कस्तूरी मृग की बेचैनी
दुर्गम बरफानी घाटी में
शत-सहस्र फुट ऊँचाई पर
अलख नाभि से उठने वाले
निज के ही उन्मादक परिमल-
के पीछे धावित हो-होकर
तरल तरुण कस्तूरी मृग को
अपने पर चिढ़ते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- दुर्गम : जहाँ जाना कठिन हो
- शत-सहस्र : लाखों (सैकड़ों-हजारों)
- अलख : अदृश्य / जिसे देखा न जा सके
- उन्मादक परिमल : पागल कर देने वाली सुगंध
- धावित : दौड़ते हुए
- तरल तरुण : चंचल और युवा
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
कवि कहते हैं कि हिमालय की दुर्गम और बर्फीली घाटियों में, लाखों फुट की ऊँचाई पर मैंने युवा और चंचल कस्तूरी मृग को देखा है। उसकी अपनी ही नाभि (Navel) से एक अदृश्य और मस्ती भरी सुगंध (कस्तूरी) निकलती है।
लेकिन वह अज्ञानी हिरण यह नहीं जानता कि खुशबू उसके अंदर से ही आ रही है। वह उस खुशबू के पीछे पागलों की तरह यहाँ-वहाँ दौड़ता (धावित) रहता है। जब उसे वह खुशबू बाहर नहीं मिलती, तो वह झुंझलाकर अपने आप पर ही चिढ़ने लगता है। कवि कहते हैं कि मैंने उसे खुद पर गुस्सा होते देखा है।
विशेष (Vishesh):
- मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक चित्रण है।
- 'अलख नाभि' में रहस्यवाद की झलक है।
पद्यांश 4: यक्ष-मेघदूत और कालिदास
कहाँ गया धनपति कुबेर वह
कहाँ गई उसकी वह अलका
नहीं ठिकाना कालिदास के
व्योम-प्रवाही गंगाजल का,
ढूँढ़ा बहुत किन्तु लगा क्या
मेघदूत का पता कहीं पर,
कौन बताए वह छायामय
बरस पड़ा होगा न यहीं पर,
जाने दो वह कवि-कल्पित था,
मैंने तो भीषण जाड़ों में
नभ-चुंबी कैलाश शीर्ष पर,
महामेघ को झंझानिल से
गरज-गरज भिड़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- धनपति : कुबेर (धन का देवता)
- अलका : कुबेर की नगरी
- व्योम-प्रवाही : आकाश में बहने वाली
- मेघदूत : कालिदास का महाकाव्य (बादल को दूत बनाना)
- छायामय : काल्पनिक
- नभ-चुंबी : आकाश को चूमने वाले
- झंझानिल : तूफानी हवा
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
कवि प्रश्न करते हैं कि कालिदास ने अपने 'मेघदूत' में जिस धनपति कुबेर और उसकी सुंदर नगरी 'अलका' का वर्णन किया था, वह अब कहाँ है? आकाश से बहने वाली गंगा का भी कहीं पता नहीं है। मैंने बहुत ढूँढा, पर मुझे कालिदास के उस 'मेघदूत' (बादल) का कहीं पता नहीं चला। शायद वह काल्पनिक बादल यहीं कहीं बरसकर खत्म हो गया होगा।
कवि कहते हैं कि जाने दो, वह सब तो कवि की कल्पना (कवि-कल्पित) थी। मैंने तो असलियत देखी है। मैंने भीषण सर्दी में आकाश को चूमने वाली कैलाश पर्वत की चोटियों पर विशाल बादलों (महामेघ) को तूफानी हवाओं (झंझानिल) से गरज-गरज कर भिड़ते (टकराते) हुए देखा है। यह हिमालय का असली और रौद्र रूप है।
पद्यांश 5: किन्नर-किन्नरियों का विलास
शत-शत निर्झर-निर्झरणी कल
मुखरित देवदारु कानन में,
शोणित धवल भोज पत्रों से
छायी हुई कुटी के भीतर,
रंग-बिरंगे और सुगंधित
फूलों से कुंतल को साजे,
इन्द्रनील की माला डाले
शंख-सरीखे सुघड़ गलों में,
कानों में कुवलय लटकाए,
शतदल लाल कमल वेणी में,
रजत-रचित मणि-खचित कलामय
पान-पात्र द्राक्षासव पूरित,
रखे सामने अपने-अपने
लोहित चंदन की त्रिपदी पर,
नरम निदाग बाल-कस्तूरी
मृगछालों पर पलथी मारे
मदिरारुण आँखों वाले उन
उन्मद किन्नर-किन्नरियों की
मृदुल मनोरम अँगुलियों को
वंशी पर फिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- निर्झर-निर्झरणी : झरने और नदियाँ
- मुखरित : गूँजता हुआ
- कानन : जंगल
- शोणित : लाल
- कुंतल : बाल (Hair)
- इन्द्रनील : नीलमणि (Blue Sapphire)
- कुवलय : कमल
- वेणी : चोटी
- द्राक्षासव : अंगूर की शराब
- त्रिपदी : तिपाई (छोटा स्टूल/मेज)
- उन्मद : नशे में मस्त
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
कवि कहते हैं कि जहाँ सैकड़ों झरने बहते हैं और देवदार के घने जंगलों में उनकी आवाज़ गूंजती है, वहाँ मैंने लाल और सफेद भोजपत्रों से बनी झोपड़ियों (कुटी) के अंदर किन्नर और किन्नरियों को देखा है।
वे बहुत सुंदर सजे हुए हैं। उन्होंने अपने बालों (कुंतल) को रंग-बिरंगे सुगंधित फूलों से सजाया है। शंख जैसी सुंदर गर्दनों में नीलम की मालाएँ पहनी हैं। कानों में कमल लटकाए हैं और चोटी में लाल कमल लगाए हैं।
उनके सामने लाल चंदन की तिपाई (त्रिपदी) पर चाँदी और मणियों से जड़े हुए प्याले (पान-पात्र) रखे हैं, जिनमें अंगूर की शराब (द्राक्षासव) भरी है। वे नरम मृगछालों पर पालथी मारकर बैठे हैं। उनकी आँखें नशे से लाल (मदिरारुण) हैं और वे मस्ती में चूर हैं। मैंने उनकी कोमल उंगलियों को बांसुरी (वंशी) पर फिरते हुए और मधुर संगीत बजाते हुए देखा है।
विशेष (Vishesh):
- चित्रात्मक शैली (Visual Imagery) का बेहतरीन उदाहरण है; पूरा दृश्य आँखों के सामने आ जाता है।
- तत्सम प्रधान और अलंकृत भाषा का प्रयोग है।
- श्रृंगार रस और माधुर्य गुण है।
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