Shram Vibhajan Aur Jati Pratha Class 12 Question Answer | Class 12th Shram Vibhajan Aur Jati Pratha Question Answer | श्रम विभाजन और जाति प्रथा Class 12 Question Answer

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Shram Vibhajan Aur Jati Pratha Class 12 Question Answer | NCERT Hindi Aroh Chapter


कक्षा 12 हिंदी आरोह के महत्वपूर्ण पाठ “श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा” के महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर यहाँ दिए गए हैं। यह नोट्स विद्यार्थियों को परीक्षा की तैयारी, असाइनमेंट और बोर्ड परीक्षा में बेहतर अंक प्राप्त करने में सहायता करेंगे। यह पोस्ट विशेष रूप से Shram Vibhajan Aur Jati Pratha Class 12 Question Answer और NCERT Hindi Aroh Solutions के लिए तैयार की गई है।

श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा – प्रश्न अभ्यास (NCERT Solutions)

प्रश्न 1. जाति प्रथा को श्रम विभाजन का ही रूप न मानने के पीछे आंबेडकर ने क्या तर्क हैं?
लेखक जाति प्रथा और श्रम विभाजन का ही एक रूप इसलिए नहीं मानता क्योंकि यह विभाजन स्वाभाविक नहीं है। फिर यह मानव की रुचि पर भी आधारित नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें व्यक्ति की क्षमता और योग्यता की उपेक्षा की जाती है। जन्म से पूर्व ही मनुष्य के लिए श्रम-विभाजन करना पूर्णतया अनुचित है। जाति प्रथा आदमी को आजीवन एक व्यवसाय से जोड़ देती है। यहाँ तक कि मनुष्य को भूखा मरना पड़ा तो भी वह अपना पेशा नहीं बदल सकता। यह स्थिति समाज के लिए भयावह है।
प्रश्न 2. जाति प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी और भुखमरी का भी एक कारण कैसे बनती जा रही है? क्या यह स्थिति आज भी है?
जाति प्रथा किसी भी आदमी को अपनी रूचि के अनुसार पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती। मनुष्य को केवल पैतृक पेशा ही अपनाना पड़ता है। भले ही वह दूसरे पेशे में पारंगत ही क्यों न हो। आज उद्योग धंधों की प्रक्रिया और तकनीक में लगातार विकास हो रहा है। जिससे कभी-कभी भयानक परिवर्तन हो जाता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य को पेशा न बदलने दिया जाए तो वह बेरोजगारी और भुखमरी का शिकार हो जाएगा। आज भले ही समाज में जाति प्रथा है, लेकिन इसके बाद भी कोई मजबूरी नहीं है कि वह अपने पैतृक व्यवसाय को छोड़कर नए पेशे को न अपना सके। आज जो लोग पैतृक व्यवसाय से जुड़े हैं, वे अपनी इच्छा से जुड़े हुए हैं।
प्रश्न 3. लेखक के मत से 'दासता' की व्यापक परिभाषा क्या है?
लेखक का कहना है कि दासता केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कह सकते, दासता की अन्य स्थिति यह भी है कि जिसके अनुसार कुछ लोगों को अन्य लोगों द्वारा निर्धारित किए गए व्यवहार और कर्तव्यों का पालन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। जाति प्रथा के सम्मान समाज में ऐसे लोगों का वर्ग भी है जिन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध किसी पेशे को अपनाना पड़ता है उदाहरण के लिए सफाई करने वाले कर्मचारी इसी प्रकार के कहे जा सकते हैं।
प्रश्न 4. शारीरिक वंश परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकारी की दृष्टि से मनुष्य में असमानता संभावित रहने के बावजूद आंबेडकर 'समता' को एक व्यवहार्य सिद्धांत मानने का आग्रह क्यों करते हैं?
डॉ आंबेडकर यह जानते हैं कि शारीरिक वंश परंपरा व सामाजिक उत्तराधिकारी की दृष्टि में से लोगों में आसमानता हो सकती है परंतु फिर भी वे समता के व्यवहार्य सिद्धांत को अपनाने की सलाह देते हैं। इस संदर्भ में लेखक ने यह तर्क दिया है कि यदि हमारा समाज अपने सदस्यों का अधिकतम प्रयोग प्राप्त करना चाहता है तो उसे समाज के सभी लोगों को आरंभ से ही समान अवसर और समान व्यवहार प्रदान करना होगा। समाज में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी समता का विकास करने का उचित अवसर मिलना चाहिए।
प्रश्न 5. सही में आँबेडकर ने भावनात्मक समत्व की मानवीय दृष्टि के तहत जातिवाद का उन्मूलन चाहा है, जिसकी प्रतिष्ठा के लिए भौतिक स्थितियों व जीवन-सुविधाओं का तर्क दिया है। क्या आप इससे सहमत हैं?
इस बात को लेकर हम लेखक से पूरी तरह सहमत हैं। कारण यह है कि कुछ लोग उच्च वंश में उत्पन्न होने के फलस्वरूप उत्तम व्यवहार के अधिकारी बन जाते हैं। लेकिन हम गहराई से विचार करें तो पता चलेगा कि इसमें उनका अपना कोई योगदान नहीं है। मनुष्य के कार्य और उनके परिजनों के फलस्वरुप ही उसकी महानता का निर्णय होना चाहिए और मनुष्य के प्रयत्नों की सही जाँच तब हो सकती है, जब सभी को समान अवसर प्राप्त हो। उदाहरण के रूप में सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों का पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के साथ मुकाबला नहीं किया जा सकता। आठ जातिवाद का उन्मूलन किया जाए और सभी को समान सुविधाएँ प्रदान की जाए।
प्रश्न 6. आदर्श समाज के तीन तत्वों में से एक 'भ्रातृता' को रखकर लेखक ने अपने आदर्श समाज में स्त्रियों को भी सम्मिलित किया है अथवा नहीं?
आदर्श समाज में तीसरे तत्व 'भ्रातृता' पर विचार करते समय लेखक ने अलग से स्त्रियों का उल्लेख नहीं किया परंतु लेखक ने समाज की बात कही है और समाज से स्त्रियाँ अलग नहीं होती। बल्कि स्त्री और पुरुष दोनों से ही समाज बनता है। अतः आदर्श समाज में स्त्रियों को सम्मिलित किया गया है अथवा नहीं, यह सोचना ही व्यर्थ है। 'भ्रातृता' भले ही संस्कृतनिष्ट शब्द है परन्तु यह अधिक प्रचलित नहीं है। यदि इसके स्थान पर 'एकता' शब्द का प्रयोग होता तो वह उचित होता।
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