Bharatvarsh ki Unnati Kaise ho Sakta hai Class 11 Important Questions | Class 11 Hindi Chapter Bharatvarsh ki Unnati Kaise ho Sakta hai Important Question Answer | भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है Important Questions

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Bharatvarsh ki Unnati Kaise ho Sakta hai Class 11 Important Questions |  Class 11 Hindi Chapter Bharatvarsh ki Unnati Kaise ho Sakta hai Important Question Answer | भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है Important Questions 


 प्रश्न 1. क्या भारतेंदु जी का भाषण तत्कालीन परिस्थितियों में ही नहीं अपितु आज की परिस्थितियों में भी उच्चित जान पड़ता है ? कारण लिखिए।

उत्तर - तत्कालीन समाज में भारतेंदु जी के भाषण का अपना महत्व था। उस समय भारत पर ब्रिटिश शासन था। राजे-मह्हाराजे अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए त्रिटिश लोगों की जी-हुजूरी करते थे। आम लोग भी हाथ पर हाथ रखे बैठे थे। उन लोगों में भी उन्नति करने का साहस नहीं था। वे लोग राजाओं तथा ब्राह्मणों का मुँह देखते थे। छोटा काम करने में शर्म अनुभव करते थे। नौकरी उन लोगों को मिलती नहीं थी। लोग विदेशी माल को श्रेष्ठ समझते थे जिससे अपने देश का धन बाहर जाने लगा था। भारतेंदु जी ने अपने भाषण के माध्यम से लोगों को सचेत करने का प्रयत्न किया था। उस समय यह कहा जाता था कि हिंदुस्तान गुलाम है इसलिए कुछ नहीं किया जा सकता था। लेकिन आज हिंदुस्तान आजाद है फिर भी देश के नवयुवक कुछ करना नहीं चाहते है। उनमें पहले के नबयुवकों की तरह ही आलस्य भरा हुआ है। छोटा काम या अपना रोज़गार करने में शर्म अनुभव करते हैं। नौकरी की प्रतीक्षा में खाली बैठकर गण्पें लगाते हैं। देश को चलानेवाली सरकार भी अपना स्वार्थ पूरा करने में लगी हुई है। बड़े-बड़े सरकारी अधिकारी, नेता लोगों की जी-हुजूरी करने में लगे रहते हैं। आज भी विदेशी माल को देशी माल के सामने ऊँची गुणवत्ता का समझा जाता है, हिंदू-मुसलमानों में पहले की तरह मतभेद आज भी विद्यमान हैं। दोनों जातियाँ एक-दूसरे की निंदा करने में परहेज नहीं करती हैं। धर्म का स्वरूप ब्राह्मणों ने अपने स्वार्थ के लिए और भी बिगाड़ दिया है। आज भी दूसरों से माँगकर अपने को सजाना ऊँचा समझा जाता है। अब की और उस समय की परिस्थितियों में कोई अधिक अंतर नहीं आया है। इसलिए भारतेंदु जी का भाषण आज भी उतना ही उचित जान पड़ता है जितना उस समय था। आज के नवयुवक को अपने देश की उन्नति के लिए आलस्य और जी हुजूरी की आदत का त्याग करके, हिम्मत और उत्साह से काम में लग जाना चाहिए। छोटे-से-छोटे काम से परहेज नहीं करना चाहिए। धर्म के स्वाथीं रूप को त्याग कर धर्म के वास्तविक रूप का पूजन करना चाहिए। एक ही देश में रहकर हिंदू-मुसलमानों को आपसी वैर भुलाकर देश की उन्नति के कार्य करने चाहिए। सरकार और सरकारी अधिकारियों को स्वयंहित के स्थान पर जनहित के लिए काम करना चाहिए। यदि सब लोग मिल-जुलकर काम करें तथा नवयुवक शक्ति को उत्साह और हिम्मत को साथ लेकर चलें तो भारतवर्ष की उन्नति संभव है।


प्रश्न 2. अकबर बादशाह और रॉबर्ट साहब बहादुर में क्या समानता थी ?

उत्तर : रॉबर्ट साहब बहादुर एक कलेक्टर थे। वे अकबर बादशाह की तरह सारे समाज को एक ही स्थान पर एकत्र होने का अवसर देते थे, जिससे समाज के लोगों में एकता का संचार हो। अकबर बादशाह के साथियों की तरह ही रॉबर्ट साहब बहादुर के साथी थे जो उन्हें आम लोगों को आपस में मिलाने में सहायक थे। अंकबर के दरबार में अबुल फ़ज़ल, बीरबल, टोडरमल आदि थे तो रॉबर्ट साहब के साथ मुंशी चतुर्भुज सहाय, मुंशी बिहारी लाल साहब आदि थे।


प्रश्न 3. उस समय के हाकिम कैसे थे ?

उत्तर - उस समय के हाकिम राजा-महाराजाओं की झूठी प्रशंसा में लगे रहते थे या उन्हें सरकारी काम घेरे रहते थे। जो समय उनके पास बचता उसे अपने मनोरंजन में इस्तेमाल करते थे। वे आम लोगों की समस्याओं की ओर ध्यान नहीं देते थे। जब राजा लोग अपनी प्रजा की ओर ध्यान नहीं देते थे तो वे लोग भी अपना कीमती समय आम लोगों की परेशानियाँ सुनकर खोना नहीं चाहते थे।


प्रश्न 4. लेखक ने हिंदुस्तानियों को काठियावाड़ी घोड़े क्यों कहा है ?

उत्तर - लेखक के अनुसार उस समय सारे संसार में औद्योगिक क्रांति की लहर आई हुई थी। सभी देशों के लोग, अपने देश की उन्नति में लगे हुए थे परंतु भारतीयों के सामने उन्नति के सभी साधन थे, उन्होंने साधनों का लाभ-नहीं उठाया। वे लोग केवल बातों में लगे रहे। वे जाति-पॉति, ऊँच-नीच और दिखावे की ज़िदी में उलझे रहे। भारतीयों ने दूसरे देशों को उन्नति करते हुए देखकर भी अनदेखा कर दिया। भारतीयों की स्थिति भी औद्योगिक क्रांति की लहर में जैसी थी वैसी ही बनी रही। इसलिए लेखक ने उन्हें काठियावाड़ी घोड़े कहा है जो घोड़ों की दौड़ में भागते नहीं हैं वहीं खड़े-खड़े मिद्टी खोदते रहते हैं।


प्रश्न 5. भारतेंदु जी के अनुसार बलिया में स्नान मेला लगने का क्या कारण था ?

उत्तर - भारतेंदु जी के अनुसार बलिया में स्नान मेला लगने से सारा समाज एक स्थान पर एकत्रित होता था जो लोग सालभर नहीं मिल पाते थे, वे ऐसे स्नान मेलों में आपस में मिल जाते थे और एक-दूसरे का सुख-दुख बाँटते थे। लोगों को अपनी ज़रूरत की जो चीजें अपने गाँव में नहीं मिलती, वे चीजें वहाँ से ले जाते थे। मेला लोगों को धर्म से और आपस में भी जोड़ता था।


प्रश्न 6. लेखक के समय हिंदुस्तान की दशा कैसी थी ?

उत्तर - लेखक के समय में हिंदुस्तान की स्थिति बहुत दयनीय थी। देश पर ब्रिटिश सरकार का शासन था। उस समय राजा-महाराजा, नवाबअमीर लोग अपने स्वाथ्थों में खोकर देश को हानि पँहुच रहे थे। देश के नवयुवकों में जी-हुज़ूरी की आदत पड़ गई थी। सामने उन्नति के अवसर होते हुए भी हम कुछ नहीं कर रहे थे। केवल काठियावाड़ी घोड़ों की तरह वहीं खड़े-खड़े टाप रहे थे।


प्रश्न 7. किन लोगों को निकम्मेपन ने घेर रखा था ?

उत्तर - लेखक बलिया में स्नान-पर्व पर एकत्रित समाज को संबोधित कर रहा था। उसके अनुसार देश में विद्या और नीति को बढ़ावा देने का कार्य राजा और ब्राह्मण का था लेकिन उस समय राजा और ब्राह्मण लोगों को सारे संसार के निकम्मेपन ने घेर रखा था। राजा लोगों को भोजन, झूठी प्रशंसा और गप्पें लगाने से फुरसत नहीं थी। ब्राह्मण लोगों को अपने स्वार्थ के लिए धर्म का स्वरूप बदलने से फुरसत नहीं थी। उन लोगों के निकम्पेपन से देश की स्थिति खराब हो गई थी।


प्रश्न 8. हमारे देश में छाए आलस्य के विषय में भारतेंदु ने क्या कहा है ?

उत्तर - भारतेंदु जी ने देश में छाए आलस्य के विषय में कहा है कि देश के नवयुवक, बच्चों और बूढ़ों सब पर आलस्य छाया हुआ है। कोई स्वयं से कुछ करना नहीं चाहता है। सब लोग राजा-महाराजाओं का मुँह देखते रहते हैं कि वे लोग कुछ कहेंगे तथी कुछ किया जाएगा। पंडित जी अपनी कथा में काम करने का उपाय बताएँगे। ऐसा कुछ नहीं होनेवाला है। देश की उन्नति के लिए आलस्य का त्याग करके, कमर कसकर काम करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए।


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प्रश्न 9. देश का रुपया और बुद्धि बढ़े, इसके लिए क्या करना चाहिए ?

उत्तर - भारतेंदु जी बलिया में र्नान पर्व पर गए हुए थे। वहॉं पर उनके कुछ मित्रों ने ‘देश की उन्नति कैसे हो’ के विषय में बोलने के लिए कहा। लेखक ने अपने भाषण में कहा कि हमारे देश में लोगों को आलस्य ने घेर रखा है। ब्रिटिश शासन में देश की उन्नति के साधन चारों ओर बिखरे पड़े हैं लेकिन लोग उसका लाभ नहीं उठाते। देश का रुपया, देश से बाहर बिदेशों में जा रहा है जिससे देश में धन की कमी हो रही है। जनगणना की रिपोर्ट देखने से पता चलता है कि देश में जनसंख्या तो बढ़ रही है रुपया कम हो रहा है। इसका कारण है-अपना काम स्वय न करना इस बात की की प्रतीक्षा करना कि कोई हमें आदेश दे और हम काम करें। हमें यदि उन्नति करनी है तो हमें अपनी इस आदत को बदलना पड़ेगा। दूसरे देशों की बनी चीज्रों का उपयोग मत करो। अपनी ज़रूरत की वस्तुएँ अपने देश में बनाओ। इससे रोज़गार भी बढ़ेगा और देश का रुपया देश में ही रहेगा। लोगों को आलस्य और जी-हुजूरी की आदत त्याग कर, कमर कसकर देश की उन्नति के लिए अपने बल और बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए जिससे जनसंख्या के साथ-साथ देश का रुपया बढ़ेगा तथा मानव की बुद्धि का विकास होगा।


प्रश्न 10. ऐसी कौन-सी बातें हैं जो समाज विरुद्ध मानी जाती हैं, किंतु धर्मशास्त्रों में उनका विधान है ?

उत्तर - लेखक देश की उन्नति के लिए कुछ उपाय बता रहा है। देश की उन्नति तभी संभव है यदि धर्म के मूल रूप में उन्नति हो। धर्मनीति और समाजनीति दूध पानी की तरह मिले हुए हैं। धर्मशास्त्रों में कई ऐसी बातों का विधान है जो समाज में मान्य नहीं हैं। कुछ लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए धर्म के मूल कारण को समझे बिना ही नए-नए धर्म बनाकर शास्त्रों में लिख दिए। उनके लिए सभी तिथियाँ व्रत हो गई हैं और सभी स्थान तीर्थ बन गए हैं। उन्होंने समाज के हित में लिखी गई ऋषि-मुनियों की बातों का विरोध अपने स्वार्थ के लिए किया है। धर्मशास्त्रों में विधवा विवाह, जहाज़ में सफ़र करने तथा लड़कों का छोटी आयु में विवाह न करने का विधान था। छोटी आयु में लड़कों का विवाह करने में उनका बल, वीर्य और आयु कम हो जाते हैं। लड़कों का विवाह करने से पहले उन्हें घर-गृहस्थी और दुनियादारी की शिक्षा देनी चाहिए। उन का बौद्धिक विकास करना चाहिए। रोज़गार के उचित अवसर प्रदान करने चाहिए। बहु-विवाह तथा सती प्रथा का विरोध किया गया है। लड़कियों को शिक्षा देने का विधान है जिससे वे अपने कुल धर्म को समझें और आनेवाली पीढ़ी का उचित मार्गदर्शन कर सके। ये बातें उस समय समाज विरोधी मानी जाती थीं। यदि उस समय के लोगों ने धर्मशास्त्रों के सही अर्थ को जाना होता तो देश उन्नति की ओर अग्रसर होता। धर्मशास्त्र में लिखी बातें समाज के विरूद्ध नहीं हैं अपितु समाज के हित में हैं।


प्रश्न 11. ‘भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है ?’ निरंध में लेखक ने क्या स्पष्ट करना चाहा है?

उत्तर - वास्तव में “भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है ?” निबंध न होकर भारतेंदु का एक भाषण है। इसमें उन्होंने एक और त्रिटिश शासन की मनमानी पर एक व्यंग्य किया है, तो दूसरी ओर अंग्रेजों के परिश्रमी स्वभाव के प्रति आदर भी है। भारतेंदु ने आलसीपन, समय के अपव्यय आदि कमियों को दूर करने की बात करते हुए भारतीय समाज की रूड़ियों और गलत जीवन शैली पर भी प्रहार किया है। जनसंख्या नियंत्रण, श्रम की महत्ता, आत्मबल और त्याग भावना को भारतेंदु ने उन्नति के लिए अनिवार्य माना है।


प्रश्न 12. लेखक ने कोचवान का उदाहरण देकर क्या स्पष्ट करना चाहा है?

उत्तर - लेखक ने कोचवान का उदाहरण देकर विलायती लोगों की जागरूकता एवं कर्मठता को उजागर करना चाहा है वहीं दूसरी ओर भारतीयों के निकम्मेपन को भी उजागर किया है जैसे विलायत में गाड़ी का कोचवान भी अखबार पढ़ता है। जब मालिक उतरकर किसी दोस्त के यहाँ गया, तो उसी समय कोचवान गद्दी के नीचे से अखबार निकाल कर पढ़ लेता है। यहाँ भारत में उतनी देर कोचवान हुक्का पिएगा या गप मारेगा। वो गप भी निकम्मी होगी।


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