Surdas ke Pad Class 11 | Class 11 Hindi Khelan me ko Kako Gusaiya | खेलन में को काको गुसैयाँ व्याख्या

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सूरदास के पद : खेलन में को काको गुसैयाँ (सप्रसंग व्याख्या)

नमस्कार विद्यार्थियों! आज के इस ब्लॉग पोस्ट में हम कक्षा 11वीं हिंदी (अंतरा भाग-1) के पाठ 'सूरदास के पद' का अध्ययन करेंगे। इस पद (खेलन में को काको गुसैयाँ) में महाकवि सूरदास ने श्री कृष्ण की बाल-लीलाओं और बाल-सखाओं (मित्रों) के साथ उनके झगड़े का बड़ा ही स्वाभाविक वर्णन किया है। यह पद बाल-मनोविज्ञान (Child Psychology) का उत्कृष्ट उदाहरण है।



पद का सार (Summary)

इस पद में श्री कृष्ण अपने मित्रों के साथ खेलते समय हार जाते हैं, लेकिन वे अपनी हार स्वीकार नहीं करते और गुस्सा दिखाने लगते हैं। इस पर उनके मित्र (श्रीदामा) उनसे कहते हैं कि खेल में कोई किसी का स्वामी (मालिक) नहीं होता। यहाँ सब बराबर हैं। तुम न तो जाति में हमसे बड़े हो और न ही हम तुम्हारे घर में रहते हैं। अगर तुम्हें अपनी गायों (धन) का घमंड है, तो उसे अपने पास रखो। अंत में, कृष्ण को अपनी गलती का अहसास होता है और वे खेलने के लिए मान जाते हैं।


पद्यांश 1: खेल में हार और कृष्ण का रूठना

खेलन में को काको गुसैयाँ।
हरि हारे जीते श्रीदामा, बरबस ही कत करत रिसैयाँ।।

शब्दार्थ (Word Meanings):

  • को : कौन
  • काको : किसका
  • गुसैयाँ : स्वामी / मालिक
  • हरि : श्री कृष्ण
  • श्रीदामा : कृष्ण के मित्र (सुदामा)
  • बरबस : व्यर्थ में / जबरदस्ती
  • कत : क्यों
  • रिसैयाँ : क्रोध करना / गुस्सा करना

प्रसंग (Context):

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-1)' में संकलित 'सूरदास के पदों' (खेलन में को काको गुसैयाँ / मुरली तऊ गुपालहिं भावति) से ली गई हैं। इसके रचयिता सगुण भक्ति धारा के सर्वश्रेष्ठ कृष्ण-भक्त कवि सूरदास जी हैं। इन पंक्तियों में कवि ने बाल-कृष्ण की स्वाभाविक बाल-लीलाओं, सखाओं के साथ उनके खेल-कूद और गोपियों के कृष्ण व उनकी मुरली के प्रति अनन्य प्रेम का अत्यंत मनोहारी चित्रण किया है।

व्याख्या (Explanation):

श्री कृष्ण अपने सखाओं (मित्रों) के साथ खेल रहे हैं। खेल में श्री कृष्ण हार जाते हैं और उनके मित्र श्रीदामा जीत जाते हैं। अपनी हार देखकर कृष्ण को गुस्सा आ जाता है और वे अपनी बारी (दाँव) देने से मना कर देते हैं।
इस पर श्रीदामा और अन्य मित्र कहते हैं— "अरे कान्हा! खेल में कौन किसका स्वामी (मालिक) होता है? यहाँ तो सब बराबर हैं। खेल में हरि (तुम) हार गए हो और श्रीदामा जीत गए हैं। फिर तुम बेकार में ही (बरबस) क्यों गुस्सा (रिसैयाँ) कर रहे हो?"

भावार्थ (Core Meaning): खेल की भावना (Sportsmanship) यही कहती है कि खेल के मैदान में राजा और प्रजा का भेद मिट जाता है, वहाँ सिर्फ खिलाड़ी होते हैं।

विशेष (Vishesh):

  • 'को काको', 'कत करत' में अनुप्रास अलंकार है।
  • ब्रज भाषा का मधुर प्रयोग है।
  • बाल-स्वभाव (हार न मानने की ज़िद) का सजीव चित्रण है।

पद्यांश 2: मित्रों का तर्क और समानता का दावा

जाति-पाँति हमतैं बड़ नाहीं, नाहीं बसत तुम्हारी छैयाँ।
अति अधिकार जनावत यातैं, जाते अधिक तुम्हारैं गैयाँ।।

शब्दार्थ (Word Meanings):

  • हमतैं : हमसे
  • बड़ : बड़े
  • छैयाँ : छत्र-छाया में / आश्रय में
  • जनावत : दिखाते हो / जताते हो
  • यातैं : इसलिए
  • गैयाँ : गायें (धन)

प्रसंग (Context):

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-1)' में संकलित 'सूरदास के पदों' (खेलन में को काको गुसैयाँ / मुरली तऊ गुपालहिं भावति) से ली गई हैं। इसके रचयिता सगुण भक्ति धारा के सर्वश्रेष्ठ कृष्ण-भक्त कवि सूरदास जी हैं। इन पंक्तियों में कवि ने बाल-कृष्ण की स्वाभाविक बाल-लीलाओं, सखाओं के साथ उनके खेल-कूद और गोपियों के कृष्ण व उनकी मुरली के प्रति अनन्य प्रेम का अत्यंत मनोहारी चित्रण किया है।

व्याख्या (Explanation):

श्रीदामा कृष्ण से तर्क करते हुए कहते हैं— "देखो कान्हा! तुम जाति-पाति (वर्ण) में हमसे कोई बड़े नहीं हो (हम भी ग्वाले हैं, तुम भी ग्वाले हो)। और न ही हम तुम्हारी छत्र-छाया में बसते हैं (अर्थात तुम हमारे राजा नहीं हो और हम तुम्हारे आश्रित नहीं हैं, हम अपने घर में रहते हैं)।
तुम हम पर इतना अधिकार (रोब) शायद इसलिए दिखा रहे हो क्योंकि तुम्हारे पास हमसे थोड़ी ज्यादा गायें (धन) हैं। लेकिन याद रखो, खेल में अमीरी-गरीबी नहीं चलती।"

भावार्थ (Core Meaning): बच्चों के बीच सामाजिक ऊँच-नीच और धन का कोई महत्व नहीं होता। यहाँ सच्चे लोकतंत्र (Equality) के दर्शन होते हैं।

विशेष (Vishesh):

  • सखा भाव की भक्ति प्रकट हुई है, जहाँ भक्त भगवान को बराबर मानता है।
  • तत्कालीन समाज में गायों को धन माना जाता था, इसका संकेत मिलता है।

पद्यांश 3: खेल का पुन: आरम्भ

रूठै करै तासों को खेलै, रहे बैठि जहँ-तहँ गवैयाँ।
सूरदास प्रभु खेल्यौ इ चाहत, दाऊँ दियौ करि नंद-दुहैयाँ।।

शब्दार्थ (Word Meanings):

  • तासों : उसके साथ
  • गवैयाँ : ग्वाल-बाल / साथी
  • दाऊँ : दाँव / बारी (Turn)
  • दुहैयाँ : दुहाई देना / कसम खाना

प्रसंग (Context):

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-1)' में संकलित 'सूरदास के पदों' (खेलन में को काको गुसैयाँ / मुरली तऊ गुपालहिं भावति) से ली गई हैं। इसके रचयिता सगुण भक्ति धारा के सर्वश्रेष्ठ कृष्ण-भक्त कवि सूरदास जी हैं। इन पंक्तियों में कवि ने बाल-कृष्ण की स्वाभाविक बाल-लीलाओं, सखाओं के साथ उनके खेल-कूद और गोपियों के कृष्ण व उनकी मुरली के प्रति अनन्य प्रेम का अत्यंत मनोहारी चित्रण किया है।

व्याख्या (Explanation):

ग्वाल-बाल कहते हैं कि जो खेल में बार-बार रूठता है और बेईमानी करता है, उसके साथ कौन खेलेगा? ऐसा कहकर सभी साथी जहाँ-तहाँ (अलग-अलग) जाकर बैठ जाते हैं और खेल बंद हो जाता है।
लेकिन सूरदास जी कहते हैं कि मेरे प्रभु (श्री कृष्ण) तो अंदर से खेलना ही चाहते थे। वे खेल के बिना रह नहीं सकते। इसलिए उन्होंने हार मानी और बाबा नंद की दुहाई (कसम) देकर कहा कि "अच्छा चलो, मैं अपनी बारी (दाँव) देता हूँ, अब बेईमानी नहीं करूँगा।" इस तरह खेल फिर से शुरू हो गया।

भावार्थ (Core Meaning): ईश्वर अपने भक्तों के प्रेम के आगे झुक जाते हैं। कृष्ण का झुकना और मित्रों की शर्तें मानना उनके 'लीला-पुरुषोत्तम' रूप को दर्शाता है।

विशेष (Vishesh):

  • बालकों की मनोविज्ञान का सूक्ष्म चित्रण है (खेलने की ललक और रूठना)।
  • 'नंद-दुहैयाँ' (कसम खाना) बच्चों की आदत का स्वाभाविक वर्णन है।
  • संपूर्ण पद में गेयता (गाने का गुण) है।

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