Bharat Ram ka Prem Class 12 | Class 12 Hindi Bharat Ram ka Prem | भरत राम का प्रेम Class 12

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भरत-राम का प्रेम / तुलसीदास के पद : संपूर्ण सप्रसंग व्याख्या

नमस्कार विद्यार्थियों! आज के इस ब्लॉग पोस्ट में हम कक्षा 12वीं हिंदी (अंतरा भाग-2) के पाठ 7 का विस्तृत अध्ययन करेंगे। इसमें भक्तिकाल के शिरोमणि कवि तुलसीदास जी की दो प्रमुख रचनाएँ हैं। आपकी सुविधा के लिए यहाँ हर पद्यांश के साथ शब्दार्थ, प्रसंग, व्याख्या, भावार्थ और विशेष दिए गए हैं।



काव्यांश का सार (Summary)

'भरत-राम का प्रेम' रामचरितमानस के अयोध्याकांड से लिया गया है। जब भरत चित्रकूट में राम को वापस लाने जाते हैं, तो वे अपनी मनोदशा व्यक्त करते हैं। भरत जी भावुक होकर कहते हैं कि राम ने बचपन से ही उन्हें अपार स्नेह दिया है। वे अपनी माता कैकेयी के कुकृत्य के लिए खुद को दोषी मानते हैं और कहते हैं कि विधाता ने उनसे राम का प्रेम छीन लिया है। उनका शरीर रोमांचित है और आँखों में प्रेम के आँसू हैं।
'पद' (गीतावली) में माता कौशल्या की विरह-वेदना का वर्णन है। पहले पद में वे राम की बचपन की चीजों (धनुष-बाण, जूतियाँ) को देखकर दुखी होती हैं और भ्रम में उन्हें जगाने जाती हैं। दूसरे पद में वे राम के घोड़ों की दुर्दशा देखकर राम को वापस बुलाना चाहती हैं।


रचना 1: भरत-राम का प्रेम (Bharat-Ram Ka Prem)

पद्यांश 1: भरत का भावावेश और राम का स्वभाव

पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े।।
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा।।
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।।
मो पर कृपा सनेह बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।।

शब्दार्थ (Word Meanings):

  • पुलकि : रोमांचित होकर / गदगद होकर
  • ठाढ़े : खड़े होना
  • नीरज नयन : कमल जैसे नेत्र
  • नेह जल : प्रेम के आँसू
  • कोह : क्रोध / गुस्सा
  • खुनिस : खींच / नाराजगी

प्रसंग (Context):

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित पाठ 'भरत-राम का प्रेम' (रामचरितमानस के अयोध्या कांड से) से ली गई हैं। इसके रचयिता सगुण रामभक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं। इन पंक्तियों में कवि ने राम के प्रति भरत के अनन्य प्रेम, उनके आत्मग्लानि के भाव और दोनों भाइयों के बीच के निस्वार्थ एवं आदर्श प्रेम का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया है।

व्याख्या (Explanation):

तुलसीदास जी कहते हैं कि भरत जी का शरीर रोमांचित हो उठा है और वे सभा में खड़े हो गए हैं। उनके कमल रूपी नेत्रों से प्रेम के आँसू बह रहे हैं। वे कहते हैं— "मुनिनाथ (वशिष्ठ जी) ने मेरे मन की बात पहले ही कह दी है, अब इससे अधिक मैं क्या कहूँ?
मैं अपने स्वामी (राम) के स्वभाव को अच्छी तरह जानता हूँ। वे तो अपराधी पर भी कभी क्रोध नहीं करते। मुझ पर तो उनकी विशेष कृपा और स्नेह रहा है। मैंने बचपन में खेलते समय भी कभी उनकी नाराजगी (खुनिस) नहीं देखी।"

भावार्थ (Core Meaning): भरत जी राम की उदारता का वर्णन करते हुए बताते हैं कि राम ने उन्हें हमेशा प्यार दिया, कभी डाँटा तक नहीं।

विशेष (Vishesh):

  • 'नीरज नयन नेह' और 'खेलत खुनिस' में अनुप्रास अलंकार है।
  • 'नीरज नयन' में रूपक अलंकार है।
  • भाषा: अवधी

पद्यांश 2: खेल में हारना और संकोच

सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू।।
मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारहुँ खेल जितावहिं मोही।।
महुँ सनेह-सकोच बस सन्मुख कही न बैन।
दरसन तृपित न आजु लगि प्रेम-पिआसे नैन।।

शब्दार्थ (Word Meanings):

  • सिसुपन : बचपन
  • परिहरेउँ : छोड़ा / त्यागा
  • मन भंगू : मन तोड़ना / दुखी करना
  • जोही : देखी / अनुभव की
  • हारहुँ : हारने पर भी
  • बैन : वचन / बात

प्रसंग:

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित पाठ 'भरत-राम का प्रेम' (रामचरितमानस के अयोध्या कांड से) से ली गई हैं। इसके रचयिता सगुण रामभक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं। इन पंक्तियों में कवि ने राम के प्रति भरत के अनन्य प्रेम, उनके आत्मग्लानि के भाव और दोनों भाइयों के बीच के निस्वार्थ एवं आदर्श प्रेम का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया है।

व्याख्या (Explanation):

भरत जी कहते हैं कि "मैंने बचपन से कभी उनका साथ नहीं छोड़ा और उन्होंने भी कभी मेरा मन नहीं तोड़ा। मैंने अपने हृदय में प्रभु की कृपा की रीति को देखा है—वे खेल में मेरे हारने पर भी मुझे जानबूझकर जिता देते थे (ताकि मैं उदास न हो जाऊँ)।
मैं स्नेह और संकोच (मर्यादा) के कारण उनके सामने कभी मुँह खोलकर बात नहीं कर सका। मेरे ये प्रेम के प्यासे नेत्र आज तक उनके दर्शन से तृप्त नहीं हुए हैं।"

भावार्थ (Core Meaning): राम का बड़प्पन यह था कि वे छोटे भाई को जिताने के लिए खुद हार जाते थे। भरत का प्रेम इतना गहरा है कि आँखों की प्यास बुझती ही नहीं।

विशेष (Vishesh):

  • 'सनेह-सकोच' और 'प्रेम-पिआसे' में अनुप्रास अलंकार है।
  • आदर्श भाईचारे का उदाहरण है।

पद्यांश 3: विधाता का खेल और आत्म-ग्लानि

बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा।।
यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनी समुझि साधु सुचि को भा।।
मातु मंदी मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली।।
फरइ कि कोदव बालिसुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली।।

शब्दार्थ (Word Meanings):

  • बिधि : विधाता / भाग्य
  • मिस : बहाने / माध्यम से
  • मंदी : नीच / बुरी
  • कोदव : मोटा अनाज
  • संबुक : घोंघा (Snail)
  • सुचाली : सदाचारी

प्रसंग:

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित पाठ 'भरत-राम का प्रेम' (रामचरितमानस के अयोध्या कांड से) से ली गई हैं। इसके रचयिता सगुण रामभक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं। इन पंक्तियों में कवि ने राम के प्रति भरत के अनन्य प्रेम, उनके आत्मग्लानि के भाव और दोनों भाइयों के बीच के निस्वार्थ एवं आदर्श प्रेम का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया है।

व्याख्या (Explanation):

भरत जी कहते हैं कि "विधाता से मेरा और राम का प्रेम सहा नहीं गया। इसलिए उसने नीच माता (कैकेयी) के बहाने हमारे बीच दरार डाल दी।
आज मुझे यह कहते हुए भी शोभा नहीं देता कि माता बुरी है और मैं अच्छा (साधु) हूँ। अगर मैं मन में ऐसा विचार भी लाऊँ कि 'माता नीच है और मैं सदाचारी हूँ', तो यह करोड़ों पापों के समान है।
क्या कोदों (मोटे अनाज) की बाली से उत्तम धान पैदा हो सकता है? क्या काली घोंघी (संबुक) से मोती उत्पन्न हो सकता है? (नहीं)। मैं उसी 'मंदी' (बुरी) माता का पुत्र हूँ, तो मैं साधु कैसे हो सकता हूँ?"

भावार्थ (Core Meaning): भरत जी की विनम्रता देखिए कि वे माता के दोष को भी अपने सिर ले लेते हैं।

विशेष (Vishesh):

  • दृष्टांत अलंकार: कोदों और घोंघी का उदाहरण।
  • 'कोटि कुचाली' में अनुप्रास अलंकार।

पद्यांश 4: भरत का पश्चाताप और विश्वास

सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू।।
बिनु समुझें निज अघ परिपाक। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू।।
हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा।।
गुर गोसाईं साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू।।

शब्दार्थ (Word Meanings):

  • लेसु : लेश मात्र / थोड़ा सा
  • उदधि : सागर
  • अवगाहू : अथाह / गहरा
  • अघ परिपाक : पापों का परिणाम
  • काकू : कटु वचन / व्यंग्य
  • नीक : अच्छा
  • परिनामू : परिणाम

प्रसंग (Context):

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित पाठ 'भरत-राम का प्रेम' (रामचरितमानस के अयोध्या कांड से) से ली गई हैं। इसके रचयिता सगुण रामभक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं। इन पंक्तियों में कवि ने राम के प्रति भरत के अनन्य प्रेम, उनके आत्मग्लानि के भाव और दोनों भाइयों के बीच के निस्वार्थ एवं आदर्श प्रेम का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया है।

व्याख्या (Explanation):

भरत कहते हैं कि मैं सपने में भी किसी को लेश मात्र भी दोष नहीं देता। मेरा दुर्भाग्य (अभाग) ही समुद्र की तरह अथाह है। मैंने बिना समझे अपने पापों का परिणाम माता पर डाल दिया और उन्हें कटु वचन (काकू) कहकर जलाया (दुखी किया)।
मैंने अपने हृदय में सब ओर देख लिया, मुझे कोई रास्ता नहीं सूझता। मेरा भला अब एक ही तरह से हो सकता है—जब गुरु वशिष्ठ और मेरे स्वामी सीता-राम मेरे साथ हों। तभी परिणाम अच्छा होगा।

भावार्थ (Core Meaning): भरत को विश्वास है कि राम की शरण में ही उनका उद्धार संभव है।

विशेष (Vishesh):

  • 'मोर अभाग उदधि' में रूपक अलंकार है।
  • शरणागत वत्सलता का भाव है।

पद्यांश 5: दोहा - माताओं का दुख

साधु सभाँ गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ।
प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ।।
भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी।।
देखि न जाहिं बिकल महतारीं। जरहिं दुसह जर पुर नर नारीं।।
महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला।।
सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा।।
बिन पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ ऐहि घाएँ।।
बहुरि निहारि निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू।।
अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई।।
जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तापस तीछी।।
तेइ रघुनंदन लखनु सिय अनहित लागे जाहि।
तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि।।

शब्दार्थ (Word Meanings):

  • सुथल : पवित्र स्थान
  • फुर : सच
  • पनु : प्रण / प्रतिज्ञा
  • महतारीं : माताएँ
  • जरहिं : जल रहे हैं
  • सूला : शूल / कष्ट
  • कुलिस : वज्र
  • बेहू : छेद / फट जाना
  • दैउ : दैव / विधाता

प्रसंग (Context):

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित पाठ 'भरत-राम का प्रेम' (रामचरितमानस के अयोध्या कांड से) से ली गई हैं। इसके रचयिता सगुण रामभक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं। इन पंक्तियों में कवि ने राम के प्रति भरत के अनन्य प्रेम, उनके आत्मग्लानि के भाव और दोनों भाइयों के बीच के निस्वार्थ एवं आदर्श प्रेम का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया है।

व्याख्या (Explanation):

भरत कहते हैं कि मैं साधुओं की सभा में, गुरु और प्रभु के निकट इस पवित्र स्थान (चित्रकूट) पर सत्य भाव से कह रहा हूँ। यह मेरा प्रेम है या प्रपंच, झूठ है या सच, यह सब मुनि वशिष्ठ और श्री राम जानते हैं।
पिताजी (दशरथ) ने प्रेम का प्रण निभाते हुए प्राण त्याग दिए। और माता (कैकेयी) की कुबुद्धि का तो सारा संसार गवाह है।
माताओं की व्याकुलता देखी नहीं जाती। अयोध्या के नर-नारी असहनीय दुख की आग में जल रहे हैं। मैं ही इस सारे अनर्थ (मुसीबत) की जड़ हूँ, यह सुन और समझकर मैंने सब कष्ट (शूल) सहन कर लिए हैं।
जब मैंने सुना कि रघुनाथ (राम) मुनि का वेश धारण कर लक्ष्मण और सीता के साथ नंगे पैर वन चले गए, तो यह घाव (दुख) भी मैं शंकर जी को साक्षी मानकर सह गया। फिर निषादराज का प्रेम देखकर भी मेरा वज्र जैसा कठोर हृदय फटा नहीं।
अब मैंने यहाँ आकर सब अपनी आँखों से देख लिया। जिन राम-लक्ष्मण-सीता को देखकर रास्ते के साँप और बिच्छू भी अपना भयानक विष और क्रोध त्याग देते हैं, वे जिसके (कैकेयी के) शत्रु हो गए, उस कैकेयी के पुत्र (मुझे) को छोड़कर विधाता यह असहनीय दुख और किसे सहवाएगा?

भावार्थ (Core Meaning): भरत स्वीकार करते हैं कि उनके कारण ही पिता की मृत्यु हुई और पूरा राज्य दुखी है। वे मानते हैं कि कैकेयी का पुत्र होने के कारण उन्हें यह दुख भोगना ही पड़ेगा।

विशेष (Vishesh):

  • 'कुलिस कठिन उर' में उपमा अलंकार है।
  • भरत की सहनशीलता और आत्म-ग्लानि का चरम उत्कर्ष है।

रचना 2: तुलसीदास के पद (Geetavali)

पद 1: कौशल्या की विरह-वेदना

जननी निरखति बान-धनुहियाँ।
बार-बार उर नैननि लावति प्रभु-जू की ललित पनहियाँ।।
कबहुँ प्रथम ज्यों जाइ जगावति कहि प्रिय बचन सवारे।
"उठहु तात! बलि मातु बदन पर, अनुज सखा सब द्वारे।"
कबहुँ कहति "यौं बड़ी बार भइ जाहु भूप पहँ भैया।"
बंधु बोलि जेइ जो भावे, गई निछावरि मैया।।

शब्दार्थ (Word Meanings):

  • निरखति : देखती है
  • धनुहियाँ : छोटी धनुष
  • पनहियाँ : जूतियाँ
  • ललित : सुंदर
  • बलि : न्योछावर
  • जेइ : भोजन करना (जीमना)

प्रसंग (Context):

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित 'तुलसीदास के पद' (गीतावली से) से ली गई हैं। इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास हैं। इन पंक्तियों में कवि ने राम के वनगमन के पश्चात माता कौशल्या की विरह-व्यथा, उनके वात्सल्य भाव और राम की वस्तुओं को देखकर उनके हृदय में उठने वाली पीड़ा का करुण चित्रण किया है।

व्याख्या (Explanation):

तुलसीदास जी कहते हैं कि माता कौशल्या राम के वन चले जाने के बाद उनके बचपन के छोटे धनुष-बाणों को निहारती रहती हैं। वे बार-बार प्रभु राम की सुंदर जूतियों (पनहियाँ) को अपनी आँखों और छाती (हृदय) से लगाती हैं।
कभी-कभी भ्रम में वे राम के कक्ष की ओर वैसे ही जाती हैं जैसे पहले सुबह उन्हें जगाने जाती थीं और मीठे वचनों में कहती हैं— "हे बेटा! उठो, माँ तुम्हारे मुख पर बलिहारी जाती है। तुम्हारे छोटे भाई और मित्र दरवाजे पर खड़े इंतज़ार कर रहे हैं।"
कभी कहती हैं— "भैया! बहुत देर हो गई है, अब राजा दशरथ के पास जाओ।" कभी कहती हैं कि अपने भाइयों को बुलाकर जो मनपसंद भोजन हो, वह कर लो।

भावार्थ (Core Meaning): पुत्र वियोग में माँ की मानसिक दशा का चित्रण है। वे अतीत को वर्तमान समझ रही हैं।

विशेष (Vishesh):

  • वात्सल्य रस (वियोग पक्ष) का सुंदर उदाहरण।
  • भाषा: ब्रज

पद 1 (भाग 2): स्मृति और चित्रवत दशा

कबहुँ समुझि बनगमन राम को, रहि चकि चित्रलिखी सी।
तुलसीदास वह समय कहे तें, लागति प्रीति सिखी सी।।

शब्दार्थ (Word Meanings):

  • बनगमन : वन चले जाना
  • चकि : चकित / हैरान
  • चित्रलिखी सी : चित्र (तस्वीर) जैसी स्थिर
  • सिखी : मोरनी

प्रसंग (Context):

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित 'तुलसीदास के पद' (गीतावली से) से ली गई हैं। इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास हैं। इन पंक्तियों में कवि ने राम के वनगमन के पश्चात माता कौशल्या की विरह-व्यथा, उनके वात्सल्य भाव और राम की वस्तुओं को देखकर उनके हृदय में उठने वाली पीड़ा का करुण चित्रण किया है।

व्याख्या (Explanation):

लेकिन अचानक जब कौशल्या को याद आता है कि राम तो वनवास (बनगमन) चले गए हैं, तो वे ठिठक कर रह जाती हैं। वे एकदम सन्न रह जाती हैं, जैसे कोई 'चित्रलिखी सी' (तस्वीर/मूर्ती) हो गई हों।
तुलसीदास जी कहते हैं कि उस समय कौशल्या की दशा का वर्णन करना कठिन है। उनकी स्थिति मोरनी (सिखी) जैसी हो जाती है, जो बादलों को देखकर नाचती तो है, लेकिन जब अपनी पैरों की ओर देखती है (यथार्थ याद आता है) तो रो पड़ती है।

भावार्थ (Core Meaning): माँ का दुख इतना गहरा है कि वह जड़वत (Stunned) हो जाती हैं।

विशेष (Vishesh):

  • 'चित्रलिखी सी' और 'सिखी सी' में उपमा अलंकार है।
  • स्मृति बिंब का सुंदर प्रयोग है।

पद 2: घोड़ों की दशा और राम से गुहार

राघव! एक बार फिरि आवौ।
ए बर बाजि बिलोकि आपने बहुरो बनहिं सिधावौ।।
जे पय प्याइ पोखि कर-पंकज बार-बार चुचकारे।
क्यों जीवहिं मेरे राम लाड़िले, ते अब निपट बिसारे।।
भरत सौगुनी सार करत हैं अति प्रिय जानि तिहारे।
तदपि दिनहिं दिन होत झाँवरे मनहुँ कमल हिम-मारे।।
सुनहु पथिक! जो राम मिलहिं बन कहियो मातु संदेसो।
तुलसी मोहि और सबहिन तें इन्हको बड़ो अंदेसो।।

शब्दार्थ (Word Meanings):

  • बाजि : घोड़े
  • बिलोकि : देखकर
  • बहुरो : फिर से / वापस
  • कर-पंकज : कमल रूपी हाथ
  • बिसारे : भुला दिए
  • सार : देखभाल (Sambhhal)
  • झाँवरे : कमजोर / मुरझाए हुए
  • हिम-मारे : बर्फ (पाले) के मारे हुए
  • अंदेसो : चिंता / अंदेशा

प्रसंग (Context):

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित 'तुलसीदास के पद' (गीतावली से) से ली गई हैं। इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास हैं। इन पंक्तियों में कवि ने राम के वनगमन के पश्चात माता कौशल्या की विरह-व्यथा, उनके वात्सल्य भाव और राम की वस्तुओं को देखकर उनके हृदय में उठने वाली पीड़ा का करुण चित्रण किया है।

व्याख्या (Explanation):

कौशल्या कहती हैं— "हे राघव (राम)! तुम बस एक बार वापस आ जाओ। आकर अपने इन श्रेष्ठ घोड़ों (बर बाजि) को देख लो, फिर भले ही वापस वन चले जाना।
ये वही घोड़े हैं जिन्हें तुम अपने कमल जैसे हाथों से पानी पिलाते थे, पालते थे और बार-बार चुचकारते (प्यार करते) थे। हे मेरे लाड़ले राम! जिन्हें तुमने अब बिल्कुल भुला दिया है, वे तुम्हारे बिना कैसे जीवित रहेंगे?
यद्यपि भरत इनकी सौ गुना ज्यादा देखभाल करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि ये तुम्हें बहुत प्रिय हैं। फिर भी, ये घोड़े दिन-प्रतिदिन कमजोर (झाँवरे) होते जा रहे हैं। ये ऐसे मुरझा गए हैं जैसे पाला (बर्फ) पड़ने से कमल मुरझा जाते हैं।
हे पथिक! सुनो, अगर तुम्हें वन में राम मिलें, तो उनसे माँ का यह संदेशा कहना कि मुझे और बाकी सबको तो चिंता है ही, पर इन घोड़ों की सबसे ज्यादा चिंता (अंदेसो) है।"

भावार्थ (Core Meaning): माँ अपने दुख को छिपाकर घोड़ों के बहाने राम को बुलाना चाहती हैं। पशु-पक्षियों का प्रेम भी दर्शाया गया है।

विशेष (Vishesh):

  • 'पय प्याइ पोखि' में अनुप्रास अलंकार है।
  • 'कर-पंकज' में रूपक अलंकार है।
  • 'मनहुँ कमल हिम-मारे' में उत्प्रेक्षा अलंकार है।
  • भाषा: ब्रज (गीतावली की भाषा ब्रज है)।

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