राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद - प्रश्न उत्तर | Class 10 Hindi NCERT | राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद: सभी प्रश्न-उत्तर एवं व्याकरण | Class 9 Hindi

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राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद - प्रश्न उत्तर | NCERT Solutions Hindi

कक्षा 10 हिंदी क्षितिज भाग-2 के प्रसिद्ध पाठ “राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद” (तुलसीदास) के अभ्यास खण्ड के प्रश्न-उत्तर यहाँ दिए गए हैं। यह लेख विशेष रूप से बोर्ड परीक्षा, असाइनमेंट और नोट्स बनाने के लिए बहुत उपयोगी है।


अभ्यास: मेरे उत्तर मेरे तर्क

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

प्रश्न 1. "पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥" यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मनःस्थिति को दर्शाती है?
  • (क) आदर और सम्मान
  • (ख) भक्ति और श्रद्धा
  • (ग) भय और शिष्टाचार
  • (घ) प्रेम और सहिष्णुता
सही उत्तर: (ग) भय और शिष्टाचार
तर्क: सभा में उपस्थित सभी राजा परशुराम के क्रोध को देखकर अत्यंत भयभीत ("सकल भय बिकल भुआला") थे, इसलिए डर के कारण और राजदरबार के शिष्टाचार को निभाते हुए वे अपना और अपने पिता का नाम लेकर उन्हें प्रणाम कर रहे थे।
प्रश्न 2. "जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा" पंक्ति से राजा जनक के व्यवहार की कौन-सी विशेषता उद्घाटित होती है?
  • (क) संवेदनशीलता
  • (ख) शिष्टता
  • (ग) सहनशीलता
  • (घ) उदासीनता
सही उत्तर: (ख) शिष्टता
तर्क: राजा जनक एक अत्यंत विनम्र और शिष्ट व्यक्ति थे। मुनि परशुराम के क्रोधित होने पर भी वे अपने राजधर्म और शिष्टाचार का पालन करते हुए स्वयं प्रणाम करते हैं और अपनी पुत्री सीता से भी प्रणाम करवाते हैं।
प्रश्न 3. "अति रिस बोले बचन कठोरा।" जनक के प्रति परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था—
  • (क) उचित आदर-सत्कार न मिलना
  • (ख) जनक द्वारा समाचार छिपाना
  • (ग) शिव-धनुष का खंडित होना
  • (घ) अन्य राजाओं की सभा में उपस्थिति
सही उत्तर: (ग) शिव-धनुष का खंडित होना
तर्क: परशुराम भगवान शिव के परम भक्त थे। जब वे जनक की सभा में पहुँचे और उन्होंने अपने आराध्य शिव के धनुष को दो टुकड़ों में टूटा हुआ देखा (देखे चापखंड महि डारे), तो इस दृश्य ने उनके क्रोध को भड़का दिया और वे कठोर वचन बोलने लगे।
प्रश्न 4. राम का कथन "होइहि केउ एक दास तुम्हारा" उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?
  • (क) कूटनीति और चतुराई
  • (ख) विनम्रता और मर्यादा
  • (ग) त्याग और समर्पण
  • (घ) दृढ़ता और आत्मविश्वास
सही उत्तर: (ख) विनम्रता और मर्यादा
तर्क: परशुराम के अत्यंत क्रोधित होने पर भी श्री राम बिल्कुल शांत रहे। उन्होंने स्वयं को शिव-धनुष तोड़ने वाले के स्थान पर 'आपका ही कोई दास होगा' कहकर अपनी अत्यंत विनम्रता, शालीनता और रघुकुल की मर्यादा का परिचय दिया।
प्रश्न 5. "सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥" लक्ष्मण के मुसकराने और उपहास भरे वचनों का क्या कारण था?
  • (क) वे सभा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे।
  • (ख) उन्हें राम के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना था।
  • (ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे।
  • (घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
सही उत्तर: (घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
तर्क: लक्ष्मण स्वभाव से उग्र और निडर थे। परशुराम द्वारा बार-बार अपने फरसे का भय दिखाने और स्वयं को महान योद्धा बताने पर लक्ष्मण मुस्कुराकर उनका उपहास करते हैं। वे परशुराम के अहंकार को तोड़कर उन्हें चुनौती देना चाहते थे कि वीर योद्धा बातों से नहीं, कर्मों से अपनी वीरता दिखाते हैं।

मेरी समझ मेरे विचार – प्रश्न अभ्यास 

प्रश्न 1. "अरध निमेष कलप सम बीता" पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि कविता में यह किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों?
भाव: इस पंक्ति का भाव है कि "आधा पल (क्षण) भी एक कल्प (एक अत्यंत लंबी अवधि/युग) के समान लंबा प्रतीत हो रहा था।"

संदर्भ और कारण: यह पंक्ति कविता में सीता जी (और उनकी माता सुनयना) के संदर्भ में कही गई है। शिव-धनुष टूटने के बाद जब परशुराम अत्यंत क्रोधित अवस्था में सभा में आए, तो उनके भयानक रूप और विनाशकारी वचनों को सुनकर सीता जी बहुत भयभीत और चिंतित हो गईं। उनके मन में यह आशंका थी कि अब राम का क्या होगा। इस अत्यधिक घबराहट और चिंता के कारण उनके लिए समय का एक-एक क्षण काटना भारी हो रहा था और आधा पल भी एक युग के समान लंबा लग रहा था।
प्रश्न 2. "सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।।" पंक्ति के आधार पर बताइए कि परशुराम द्वारा दी गई इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज-समाज पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
परशुराम ने चेतावनी दी थी कि "जिसने भी शिव-धनुष तोड़ा है, वह इस राज-समाज से अलग हो जाए, अन्यथा यहाँ उपस्थित सभी राजा मारे जाएँगे।"

प्रभाव: इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज-समाज पर अत्यंत भयानक प्रभाव पड़ा होगा। सभी राजा बुरी तरह डर गए होंगे ("सकल भय बिकल भुआला")। परशुराम के फरसे और उनके क्षत्रिय-संहारक इतिहास को याद करके वहाँ मौजूद राजाओं में खलबली मच गई होगी। मृत्यु के भय से राजाओं ने स्वयं को निर्दोष साबित करने और राम से दूरी बनाने का प्रयास किया होगा। वे इतने असहाय महसूस कर रहे होंगे कि कोई भी परशुराम के सामने बोलने की हिम्मत नहीं कर पा रहा होगा।
प्रश्न 3. तुलसीदास ने राम और लक्ष्मण के माध्यम से एक ही परिस्थिति के प्रति दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दिखाई हैं। आपकी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का 'विनय' का मार्ग उचित है या लक्ष्मण के 'तर्क' का? अपने उत्तर का उचित कारण और तर्क भी प्रस्तुत कीजिए।
मेरी दृष्टि में परशुराम के भयानक क्रोध को शांत करने के लिए श्री राम का 'विनय' (विनम्रता) का मार्ग ही सर्वथा उचित है।

तर्क: क्रोध एक दहकती हुई आग के समान है। लक्ष्मण के व्यंग्यपूर्ण और तार्किक वचन उस आग में 'घी' का काम कर रहे थे, जिससे परशुराम का क्रोध और अधिक भड़क रहा था। जब कोई व्यक्ति अत्यंत क्रोधित और अपना आपा खो चुका हो, तो उसे तर्कों से नहीं जीता जा सकता। ऐसे समय में राम की विनम्रता, शांत स्वभाव और मधुर वचन 'जल' (पानी) के समान थे, जिन्होंने अंततः परशुराम के क्रोधाग्नि को बुझा दिया। विनयपूर्ण आचरण ही समस्या का समाधान करने और विनाश को टालने का सबसे उत्तम मार्ग है।
प्रश्न 4. 'हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥' श्री राम के हृदय में न हर्ष था, न विषाद। यह उनके व्यक्तित्व के किन गुणों को दर्शाता है? उनका भावनात्मक संतुलन इस पूरे पाठ में उन्हें अन्य पात्रों से अलग कैसे स्थापित करता है?
"श्री राम के हृदय में न अत्यधिक खुशी थी और न ही दुःख।" यह श्री राम के 'स्थितप्रज्ञ' (समान भाव में रहने वाले), अत्यंत गंभीर, धैर्यवान और संयमी व्यक्तित्व को दर्शाता है। वे सुख-दुःख, लाभ-हानि, और मान-अपमान में समभाव रखते हैं।

अन्य पात्रों से भिन्नता: पूरे पाठ में जहाँ परशुराम अपने अहंकार और क्रोध के वशीभूत होकर अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं और लक्ष्मण अपने उग्र और चंचल स्वभाव के कारण व्यंग्य बाण छोड़ते हैं, वहीं श्री राम अत्यंत शांत और संतुलित रहते हैं। उनका यही भावनात्मक संतुलन उन्हें एक आदर्श महापुरुष और मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में स्थापित करता है। वे विपरीत और तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी अपनी शालीनता और मर्यादा का त्याग नहीं करते।

मेरी कल्पना मेरे अनुमान – प्रश्न अभ्यास

प्रश्न 1. कल्पना कीजिए कि आप जनक की सभा में उपस्थित एक राजा हैं। परशुराम जी के आगमन से लेकर उनके गमन तक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
मैं राजा जनक की सभा में उपस्थित एक राजा था। सीता स्वयंवर का आयोजन चल रहा था। जैसे ही श्रीराम ने शिव-धनुष उठाया और प्रत्यंचा चढ़ानी चाही, वह भयंकर ध्वनि के साथ टूट गया। कुछ ही देर में वहाँ अत्यंत क्रोधित अवस्था में मुनि परशुराम हाथ में अपना भयानक फरसा लिए आ गए। उनके रौद्र रूप को देखकर मेरे साथ-साथ सभा में उपस्थित सभी राजा भयभीत हो गए। हम सभी ने अपनी जान की खैर मनाते हुए डर के मारे उन्हें प्रणाम किया।

उन्होंने क्रोधित होकर पूछा कि शिव-धनुष किसने तोड़ा है? श्रीराम ने अत्यंत विनम्रता से उत्तर दिया कि यह कार्य आपके ही किसी दास ने किया होगा, परंतु लक्ष्मण जी ने अपने व्यंग्यपूर्ण वचनों से परशुराम जी के क्रोध को और भड़का दिया। दोनों के बीच अत्यंत तीखा संवाद होने लगा। हमें लगा कि आज मुनि के फरसे से कोई नहीं बचेगा और पूरी सभा मारी जाएगी। अंततः, श्रीराम ने अपनी शीतल, विनम्र और मर्यादापूर्ण वाणी से तथा विश्वामित्र जी के समझाने पर परशुराम जी का क्रोध शांत किया। सच्चाई और राम की शक्ति का ज्ञान होने पर परशुराम जी वहाँ से चले गए, तब जाकर हम सभी राजाओं की जान में जान आई और हमने चैन की साँस ली।
प्रश्न 2. “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥” जनक द्वारा डर से चुप रहने पर अन्य राजा मन में प्रसन्न क्यों हुए होंगे? (संकेत– सोचिए, यह मनुष्य के व्यवहार की किस सच्चाई को उजागर करता है?)
प्रसन्न होने का कारण: जब परशुराम जी शिव-धनुष टूटने पर अत्यंत क्रोधित हो रहे थे और राजा जनक अत्यधिक भय के कारण उन्हें कोई उत्तर नहीं दे पा रहे थे, तो सभा में बैठे अन्य कुटिल राजा मन ही मन बहुत प्रसन्न हो रहे थे। उनके प्रसन्न होने का मुख्य कारण यह था कि वे सभी सीता स्वयंवर में शिव-धनुष उठाने में बुरी तरह असफल रहे थे, जिससे सभा में उनका बहुत अपमान हुआ था। अब वे राजा जनक और राम-लक्ष्मण को परशुराम जी के क्रोध रूपी संकट में फँसा देखकर बदले की भावना से खुश हो रहे थे।

मनुष्य के व्यवहार की सच्चाई: यह प्रसंग मनुष्य के व्यवहार की उस कड़वी और नकारात्मक सच्चाई को उजागर करता है कि व्यक्ति अक्सर दूसरों की सफलता और प्रशंसा से ईर्ष्या (जलन) करता है। जब उसके प्रतिद्वंद्वी या सफल लोग किसी विपत्ति या संकट में फँसते हैं, तो वह सहानुभूति दिखाने के बजाय छिपकर आनंद लेता है (जिसे कुटिलता कहते हैं)। यह मानव मन के स्वार्थ, द्वेष और संकीर्ण मानसिकता का जीता-जागता उदाहरण है।

विधा से संवाद – कविता का सौंदर्य

प्रश्न 1. इस कविता में संवाद-प्रस्तुति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। नीचे कविता के संवादों की कुछ विशेषताएँ दी गई हैं। उन विशेषताओं को दर्शाने वाली पंक्तियों के उदाहरण कविता से ढूँढ़कर लिखिए।
यहाँ संवादों की विशेषताओं को दर्शाने वाली सटीक पंक्तियाँ दी गई हैं:

  • राम की विनम्रता:
    "नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥"
    (हे नाथ! शिवजी के धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा।)
  • परशुराम का रौद्र रूप:
    "रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।"
    (अरे राजपुत्र! काल के वश में होने के कारण तुझे बोलने में कुछ होश नहीं है।)
  • लक्ष्मण का प्रत्युत्तर:
    "बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥"
    (बचपन में हमने ऐसी बहुत सी धनुहियाँ तोड़ डालीं, किन्तु हे स्वामी! आपने ऐसा क्रोध कभी नहीं किया।)
  • पौराणिक संदर्भ:
    "सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥"
    (वह सहस्रबाहु के समान मेरा परम शत्रु है। यहाँ 'सहस्रबाहु' के वध की पौराणिक कथा का संदर्भ है।)
  • नाटकीयता:
    "देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥"
    (भृगुनाथ (परशुराम) का भयंकर वेश देखकर सभा के सभी राजा भयभीत होकर उठ खड़े हुए। यह दृश्य एकदम नाटकीय है।)

भाव-पहचान एवं विश्लेषण

प्रश्न 2. राजा जनक की सभा में उपस्थित विभिन्न पात्रों की मनःस्थिति अलग-अलग है। चिंता, क्रोध, व्यग्रता, भय, संयम/विनम्रता, ईर्ष्या/कुटिलता आदि भावों/मनःस्थिति को दर्शाने वाली पंक्तियों को कविता से चिह्नित कीजिए और बताइए कि यह भाव किस पात्र से संबंधित है और उसकी इस मनःस्थिति का कारण क्या है?
भाव/मनःस्थिति संबंधित पंक्ति संबंधित पात्र मनःस्थिति का कारण
चिंता बिधि अब सँवरी बात बिगारी सीता की माता (सुनयना) पुत्री सीता के भविष्य (विवाह) के प्रति आशंकित और चिंतित होना।
क्रोध अति रिस बोले बचन कठोरा मुनि परशुराम अपने आराध्य भगवान शिव के धनुष को सभा में टूटा हुआ देखकर।
व्यग्रता (बेचैनी) अरध निमेष कलप सम बीता सीता जी परशुराम के अत्यंत क्रोध को देखकर राम के प्राणों और अपने विवाह को लेकर मन में उत्पन्न घबराहट।
भय (डर) उठे सकल भय बिकल भुआला सभा में उपस्थित राजा परशुराम का भयानक वेश, हाथ में फरसा और उनका भयंकर क्रोध देखकर।
संयम / विनम्रता हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु श्री राम श्री राम का स्वभाव अत्यंत शांत, मर्यादित और स्थितप्रज्ञ होना, वे बड़ों का आदर करते हैं।
ईर्ष्या / कुटिलता कुटिल भूप हरषे मन माहीं कुटिल राजा (अन्य राजा) स्वयंवर में अपनी हार से ईर्ष्यालु राजा राम-लक्ष्मण को परशुराम के क्रोध में फँसता देखकर मन ही मन खुश हो रहे थे।

विधा से संवाद – काव्य-पंक्ति और भाव

काव्य-पंक्तियाँ:
“रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥”
प्रश्न (क) यदि आप इन पंक्तियों को मंच पर बोलते, तो आपके चेहरे पर कौन-सा भाव होता?
उत्तर: यह पंक्तियाँ मुनि परशुराम द्वारा अत्यंत क्रोध में लक्ष्मण जी को कही गई हैं। यदि मैं इन पंक्तियों को मंच (Stage) पर बोलता, तो मेरे चेहरे पर अत्यंत क्रोध (रौद्र रस) और अहंकार का भाव होता। मेरी आँखें बड़ी और लाल होतीं, भृकुटी (भौंहें) तनी हुई होतीं, और आवाज़ में बहुत तेज़ी, उग्रता और डराने वाला (धमकाने का) भाव होता।
प्रश्न (ख) आपने अनुभव किया होगा कि इस कविता में परिस्थितिवश प्रत्येक पात्र एक अलग भाव का प्रतिनिधि बन जाता है। निम्नलिखित पात्रों को आप कौन-कौन से भावों द्वारा प्रदर्शित करेंगे—
उत्तर: इस कविता में अलग-अलग पात्रों की मनःस्थिति और उनके स्वभाव के अनुसार उनके भाव निम्नलिखित होंगे:

  • परशुराम: रौद्र (अत्यधिक क्रोध), अहंकार, उग्रता और आत्मप्रशंसा (अपनी बड़ाई स्वयं करना) का भाव।
  • राजा जनक: भय (डर), चिंता, असहायता और शिष्टता (मर्यादा पालन) का भाव।
  • लक्ष्मण: वीरता, व्यंग्य (मज़ाक उड़ाना), निडरता, चंचलता और उग्रता का भाव।
  • राम: शांत, विनय (विनम्रता), संयम, धैर्य और मर्यादा (स्थितप्रज्ञ) का भाव।
  • सभा में उपस्थित अन्य राजा: भय, कायरता, घबराहट और कुछ कुटिल राजाओं में ईर्ष्या (जलन) का भाव।

विषयों से संवाद – प्रश्न अभ्यास 

प्रश्न 1. सभा में परशुराम के प्रति राम के व्यवहार से उनकी विनम्रता, मर्यादा, धीर और उदात्त चरित्र के संबंध में पता चलता है जो किसी भी कुशल शासक के लिए आवश्यक है। आपको किन-किन परिस्थितियों में इन विशेषताओं का परिचय देना पड़ता है? चर्चा कीजिए और लिखिए।
दैनिक जीवन में हमें कई बार ऐसी विपरीत और क्रोधित करने वाली परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, जहाँ हमें श्रीराम जैसे गुणों (विनम्रता, धैर्य, और मर्यादा) का परिचय देना आवश्यक हो जाता है। उदाहरण के लिए:

  • विवाद की स्थिति में: जब कोई बिना बात के या किसी गलतफहमी के कारण हम पर क्रोधित हो रहा हो, तब शांत और विनम्र रहकर स्थिति को संभालना।
  • नेतृत्व करते समय: विद्यालय में मॉनिटर के रूप में या किसी खेल/प्रोजेक्ट की टीम के कप्तान के रूप में, जब टीम का कोई सदस्य गलती करे तो उस पर क्रोधित होने के बजाय धैर्य से उसे समझाना।
  • बड़ों के सामने: जब माता-पिता या गुरुजनों द्वारा हमारी किसी भूल पर डांट पड़े, तब उलटकर जवाब देने के बजाय मर्यादा में रहकर अपनी गलती स्वीकार करना।
  • असहमति होने पर: किसी बहस या चर्चा के दौरान जब दूसरों के विचार हमसे अलग हों, तो उग्र हुए बिना शालीनता से अपना पक्ष रखना।
प्रश्न 2. कविता में वर्णित प्रसंग सीता-स्वयंवर की सभा का है। प्राचीन भारतीय समाज में वर-चयन के लिए स्वयंवर की प्रथा प्रचलित थी। इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। ऐसी किसी एक पौराणिक-ऐतिहासिक आदि घटना/प्रसंग का वर्णन कीजिए जिससे स्वयंवर विधि द्वारा विवाह की जानकारी मिलती है।
प्राचीन भारतीय समाज में 'स्वयंवर' विवाह की एक अत्यंत प्रचलित और सम्मानजनक विधि थी, जिसमें कन्या अपनी इच्छानुसार या किसी विशेष प्रतियोगिता के माध्यम से अपना वर चुनती थी।

इसका एक अत्यंत प्रसिद्ध पौराणिक उदाहरण महाभारत में 'द्रौपदी स्वयंवर' का है:

पांचाल नरेश राजा द्रुपद ने अपनी पुत्री द्रौपदी के विवाह के लिए एक विशाल स्वयंवर का आयोजन किया था। इसमें एक बहुत ही कठिन शर्त (प्रतियोगिता) रखी गई थी। शर्त यह थी कि नीचे रखे हुए तैल कुंड (तेल के बर्तन) में परछाई देखकर, ऊपर घूमती हुई चक्र के बीच से मछली की आँख पर जो वीर बाण से निशाना साधेगा, उसी के साथ द्रौपदी का विवाह होगा।

इस स्वयंवर में अनेक महान राजा, योद्धा और राजकुमार (जैसे दुर्योधन, कर्ण आदि) आए, परंतु सभी असफल रहे। अंत में, ब्राह्मण के वेश में आए पांडव पुत्र अर्जुन ने अपने अद्भुत कौशल और एकाग्रता से मछली की आँख भेद दी। इसके पश्चात् द्रौपदी ने आगे बढ़कर अर्जुन को वरमाला पहनाई और उन्हें अपना पति चुन लिया। यह घटना भारतीय इतिहास और पुराणों में स्वयंवर प्रथा का एक उत्कृष्ट और प्रसिद्ध उदाहरण है।

सृजन – प्रश्न अभ्यास

प्रश्न 1. परशुराम के क्रोध को देखकर सीता और उनकी माता सुनयना दोनों चिंतित हैं और सीता के लिए एक-एक पल युग के समान भारी और लंबा प्रतीत हो रहा है। उनकी मनःस्थिति का अनुमान लगाते हुए उस क्षण दोनों के बीच चल रहा मौन संवाद लिखिए।
माता सुनयना और सीता के बीच मौन संवाद (आँखों ही आँखों में):

सीता (भयभीत आँखों से): हे माते! शिव-धनुष टूटने की प्रसन्नता तो जैसे पल भर में ही छिन गई। मुनिराज परशुराम का यह भयंकर क्रोध और उनका यह कुल्हाड़ा (फरसा) देखकर मेरे प्राण सूखे जा रहे हैं। क्या अब मेरा विवाह श्रीराम से नहीं हो पाएगा? यदि इन्होंने श्रीराम को कोई हानि पहुँचाई तो मेरा क्या होगा?

माता सुनयना (आश्वासन भरी दृष्टि और स्पर्श से): पुत्री, धैर्य रखो! अपने मन को व्यग्र मत करो। मुनिराज भले ही अत्यंत क्रोधित हैं, परंतु तुम श्रीराम के मुखमंडल को देखो। वे कितने शांत और संयमित हैं। जो वीर शिव जी के इतने विशाल धनुष को पल भर में तोड़ सकता है, वह इस संकट का समाधान भी अवश्य कर लेगा। ईश्वर पर विश्वास रखो, सब मंगल ही होगा।
प्रश्न 2. सभा में हो रहे संवाद को दूर बैठी सीता, राजा जनक और अन्य लोग भी सुन रहे थे। अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर लिखिए कि उस समय सीता के मन में किस तरह के भाव उत्पन्न हो रहे होंगे? सीता के दृष्टिकोण से पूरी घटना का विश्लेषण कीजिए। (संकेत– लक्ष्मण के प्रत्युत्तर पर चिंता, गर्व, हँसी, भय, शंका इत्यादि)
सीता के दृष्टिकोण से सभा में हो रही पूरी घटना का विश्लेषण निम्नलिखित भावों के माध्यम से किया जा सकता है:

  • भय और चिंता: मुनि परशुराम का भयंकर रौद्र रूप देखकर सीता जी के मन में अत्यंत भय उत्पन्न हुआ होगा। उन्हें चिंता सता रही होगी कि परशुराम के क्रोध की अग्नि में कहीं उनका और श्रीराम का भविष्य न जल जाए।
  • गर्व और शांति: दूसरी ओर, परशुराम के कठोर वचनों के बावजूद श्रीराम को शांत, शालीन और मुस्कुराते हुए देखकर सीता जी के मन में उनके प्रति गर्व और अगाध प्रेम का भाव जागा होगा।
  • आश्चर्य और छिपी हुई हँसी: लक्ष्मण जी द्वारा परशुराम को निडरता से तीखे और व्यंग्यपूर्ण उत्तर देते देखकर सीता जी हैरान भी होंगी और मन ही मन लक्ष्मण जी की वाक्पटुता पर उन्हें हल्की सी हँसी भी आ रही होगी।
  • शंका (दुविधा): जब संवाद बहुत तीखा हो गया होगा और परशुराम ने अपना फरसा उठा लिया होगा, तब सीता जी का हृदय शंका से काँप उठा होगा कि अब न जाने क्या अनर्थ हो जाएगा।
प्रश्न 3. कविता में सभा में उपस्थित राजाओं (और परशुराम जी) ने अपनी वीरता, पराक्रम आदि का उल्लेख करते हुए अपना परिचय दिया है। यदि आपको अपना परिचय देना हो तो आप अपना परिचय किस प्रकार देना उचित समझेंगे? अपना परिचय देते हुए कुछ वाक्य लिखिए जिससे आपके व्यक्तित्व की महत्त्वपूर्ण बातों का पता चलता हो।
उत्तर: यदि मुझे अपना परिचय देना हो, तो मैं अहंकार और आत्मप्रशंसा (अपनी बड़ाई स्वयं करना) से बचते हुए विनम्रतापूर्वक अपना परिचय देना उचित समझूँगा। मैं अपना परिचय कुछ इस प्रकार दूँगा:

"नमस्कार! मेरा नाम [अपना नाम लिखें] है। मैं एक अनुशासित, परिश्रमी और सकारात्मक सोच रखने वाला विद्यार्थी हूँ। मैं अपनी सफलताओं का घमंड करने के बजाय अपने निरंतर प्रयासों और कर्मों से अपनी पहचान बनाने में विश्वास रखता हूँ। मुझे नई चीजें सीखना, पुस्तकें पढ़ना और दूसरों की सहायता करना अत्यंत प्रिय है। मैं क्रोध करने के बजाय शांत और धैर्यपूर्ण तरीके से समस्याओं का समाधान खोजने का प्रयास करता हूँ।"

भाषा से संवाद – व्याकरण की बात

प्रश्न 1. नीचे इस कविता की कुछ विशेषताएँ (अलंकार) और उनके एक-एक उदाहरण दिए गए हैं। एक-एक उदाहरण आप कविता से ढूँढ़कर लिखिए: (अनुप्रास, अतिशयोक्ति, रूपक)
विशेषता (अलंकार) पुस्तक का उदाहरण छात्र द्वारा अन्य उदाहरण
अनुप्रास अलंकार अरि करनी करि करिअ लराई "सकल भय बिकल भुआला"
(यहाँ 'भ' वर्ण की आवृत्ति हुई है।)
अतिशयोक्ति अलंकार अरध निमेष कलप सम बीता "न त मारे जैहहिं सब राजा"
(यहाँ परशुराम का क्रोध बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया है कि एक अपराधी के लिए सभी राजा मारे जाएँगे।)
रूपक अलंकार पद सरोज मेले दोउ भाई "भृगुकुलकेतू"
(यहाँ परशुराम जी पर भृगु कुल की पताका/ध्वजा का अभेद आरोप है।)

बहुभाषिकता

प्रश्न 2. यह कविता अवधी भाषा में लिखी गई है। कविता में ऐसे बहुत से शब्द आए हैं, जो अवधी भाषा के हैं। ऐसे शब्दों को पहचान कर उनके खड़ी बोली हिंदी रूप लिखिए। साथ ही आपकी भाषा में इनके लिए कौन-से शब्द प्रयुक्त होते हैं, उन्हें भी लिखिए।
अवधी शब्द खड़ी बोली का शब्द मेरी भाषा (सामान्य बोलचाल) में शब्द
कोही क्रोधी गुस्सैल / गुस्सा करने वाला
वेषु वेष / पहनावा कपड़े / पोशाक
ढोटा पुत्र / बालक लड़का / बेटा
रिस रोष / क्रोध गुस्सा / नाराज़गी

लोक में भाषा

प्रश्न 3. नीचे कोष्ठक में कविता से कुछ शब्द चुनकर दिए गए हैं। उन शब्दों से संबंधित लोकोक्ति और उनका अर्थ लिखकर स्वतंत्र वाक्यों में प्रयोग कीजिए— (मन, राम, राजा, बात, सिरु)
  • 1. मन
    लोकोक्ति: मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।
    अर्थ: आत्मविश्वास और मनोबल से ही सफलता निश्चित होती है।
    वाक्य प्रयोग: रमेश ने अपनी गंभीर बीमारी को अपने हौसले से हरा दिया, सच ही कहा गया है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।
  • 2. राम
    लोकोक्ति: राम नाम जपना, पराया माल अपना।
    अर्थ: ऊपर से धार्मिक या सज्जन दिखना, परंतु वास्तव में धोखेबाज़ होना।
    वाक्य प्रयोग: आजकल के कई ढोंगी बाबाओं का तो बस यही काम रह गया है- राम नाम जपना, पराया माल अपना।
  • 3. राजा
    लोकोक्ति: कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली।
    अर्थ: दो व्यक्तियों की हैसियत या स्थिति में बहुत बड़ा अंतर होना।
    वाक्य प्रयोग: तुम उस अरबपति से अपनी बराबरी कर रहे हो? अरे भाई, कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली!
  • 4. बात
    लोकोक्ति: बातों से पेट नहीं भरता।
    अर्थ: केवल बड़ी-बड़ी बातें करने से काम नहीं चलता, उसके लिए कड़ी मेहनत भी करनी पड़ती है।
    वाक्य प्रयोग: तुम दिन भर बस ख्याली पुलाव पकाते रहते हो, कुछ काम भी किया करो क्योंकि केवल बातों से पेट नहीं भरता।
  • 5. सिरु (सिर)
    लोकोक्ति: ओखली में सिर दिया, तो मूसलों से क्या डरना।
    अर्थ: जब कोई कठिन कार्य शुरू कर ही दिया है, तो उसमें आने वाली बाधाओं या कष्टों से क्या घबराना।
    वाक्य प्रयोग: तुमने जब अपना खुद का व्यापार शुरू कर ही लिया है तो दिन-रात की मेहनत से मत घबराओ। जानते नहीं, ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना!
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