Class 12 Barahmasa | Barahmasa Class 12 | बारहमासा Class 12

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बारहमासा : सप्रसंग व्याख्या (Barahmasa Class 12 Explanation)

नमस्कार विद्यार्थियों! आज के इस ब्लॉग पोस्ट में हम कक्षा 12वीं हिंदी (अंतरा भाग-2) के पाठ 8 'बारहमासा' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य 'पद्मावत' का एक अंश है। इसमें नागमती के विरह (जुदाई) का वर्णन हिंदी महीनों के अनुसार किया गया है।



कविता का सार (Summary)

इस पाठ में नागमती के विरह (जुदाई) का वर्णन हिंदी महीनों (अगहन, पूस, माघ, फागुन) के अनुसार किया गया है। राजा रत्नसेन पद्मावती की खोज में चले गए हैं और नागमती अकेली हैं। सर्दी की रातों में नागमती को पति के बिना बहुत कष्ट होता है। प्रकृति का हर बदलाव उसके दुख को और बढ़ा देता है। वह भंवरे और कौए के माध्यम से अपने पति तक संदेश भिजवाती है कि तुम्हारी पत्नी विरह की आग में जलकर राख हो गई है।


1. अगहन का महीना (अगहन दिवस घटा निसि बाढ़ी)

अगहन दिवस घटा निसि बाढ़ी। दूभर रैनि जाइ किमि गाढ़ी।।
अब धनि देवस बिरह भा राती। जरै बिरह ज्यों दीपक बाती।।
काँपा हिया जनावै सीऊ। तो पे जाइ होइ सँग पीऊ।।
घर घर चीर रचे सब काहू। मोर रूप रंग लेगा नाहू।।
पलट न बहुरा गा जो बिछोई। अबहूँ फिरै फिरै रंग सोई।।
सियरा अगिनि बिरहिन हिय जारा। सुलगि-सुलगि दगधै भै छारा।।
यह दुख दगध न जानै कंतू। जोबन जनम करे भसमंतू।।
पिय सौं कहेहु सँदेसड़ा, ऐ भँवरा ऐ काग।
सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग।।

शब्दार्थ (Word Meanings):

  • दिवस / निसि : दिन / रात
  • दूभर : कठिन / मुश्किल
  • धनि : पत्नी / स्त्री (नागमती)
  • सीऊ : शीत / ठंड
  • नाहू : नाथ / पति
  • सियरा : ठंडी
  • दगधै : जलना
  • छारा : राख
  • कंतू : पति (स्वामी)
  • भसमंतू : भस्म / राख

प्रसंग (Context):

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित पाठ 'बारहमासा' (महाकाव्य 'पद्मावत' से) से ली गई हैं। इसके रचयिता सूफी प्रेमाख्यानक परंपरा के प्रमुख कवि मलिक मुहम्मद जायसी हैं। इन पंक्तियों में कवि ने विभिन्न ऋतुओं और महीनों (अगहन, पूस, माघ, फागुन) के बदलते प्राकृतिक परिवेश के संदर्भ में राजा रत्नसेन के वियोग में रानी नागमती की गहरी विरह-वेदना का अत्यंत मार्मिक और सजीव वर्णन किया है।

व्याख्या (Explanation):

नागमती कहती है कि अगहन के महीने में दिन छोटे हो गए हैं और रातें लंबी हो गई हैं। विरह के कारण यह लंबी रातें काटना मेरे लिए दूभर हो गया है। अब दिन भी मेरे लिए रात जैसा (अंधेरा और दुखद) हो गया है। मैं विरह में वैसे ही जल रही हूँ जैसे दीपक में बाती जलती है।
ठंड के कारण मेरा हृदय काँप रहा है, यह ठंड तभी जा सकती है जब मेरे प्रियतम (पति) मेरे साथ हों। घर-घर में लोगों ने नए रंगीन कपड़े (चीर) पहने हैं, लेकिन मेरा रूप-रंग तो मेरा पति अपने साथ ले गया है।
यह ठंड (सियरा) मेरे लिए आग बन गई है जो मेरे हृदय को जला रही है। मैं सुलग-सुलग कर जल रही हूँ और राख (छारा) होती जा रही हूँ।
अंत में नागमती भंवरे और कौए से कहती है— "हे भंवरे! हे काग! तुम मेरे प्रियतम से जाकर यह संदेश कहना कि तुम्हारी पत्नी विरह की आग में जलकर मर गई है और हम काले इसलिए हो गए हैं क्योंकि उसका धुआँ हमें लग गया है।"

भावार्थ (Core Meaning): अगहन की ठंड में भी विरह की आग नागमती को जला रही है। भंवरे और कौए के माध्यम से संदेश भेजना विरह की अतिशयोक्ति है।

विशेष (Vishesh):

  • 'सियरा अगिनि' में विरोधाभास अलंकार है।
  • 'जरै बिरह ज्यों दीपक बाती' में उपमा अलंकार है।
  • अंतिम दोहे में विरह की अतिशयोक्तिपूर्ण व्यंजना है।

2. पूस का महीना (पूस जाड़ थरथर तन काँपा)

पूस जाड़ थरथर तन काँपा। सूरजड़ जाइ लंक दिसि चाँपा।।
बिरह बाढ़ि भा दारुन सीऊ। कँपि-कँपि मरौं लेहि हरि जीऊ।।
कंत कहाँ हौं लागौं हियरे। पंथ अपार सूझ नहिं नियरें।।
सौर सुपेती आवै जूड़ी। जानहुँ सेज हिवंचल बूड़ी।।
चकई निसि बिछुरै दिन मिला। हौं निसि बासर बिरह कोकिला।।
रैनि अकेलि साथ नहिं सखी। कैसे जियै बिछोही पंखी।।
बिरह सचान भयें तन चाँड़ा। जीयत खाइ मुएँ नहिं छाँड़ा।।
रकत ढरा माँसू गरा, हाड़ भए सब संख।
धनि सारस होइ ररि मुई, आइ समेटहु पंख।।

शब्दार्थ (Word Meanings):

  • लंक दिसि : दक्षिण दिशा (लंका की ओर)
  • चाँपा : छिप जाना / चला जाना
  • दारुन : भयानक / कठोर
  • सौर सुपेती : रजाई और गद्दा
  • हिवंचल : हिमाचल / बर्फ
  • चकई : चकवा पक्षी
  • निसि बासर : रात-दिन
  • सचान : बाज पक्षी
  • ररि : रट-रट कर / चिल्लाकर

प्रसंग:

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित पाठ 'बारहमासा' (महाकाव्य 'पद्मावत' से) से ली गई हैं। इसके रचयिता सूफी प्रेमाख्यानक परंपरा के प्रमुख कवि मलिक मुहम्मद जायसी हैं। इन पंक्तियों में कवि ने विभिन्न ऋतुओं और महीनों (अगहन, पूस, माघ, फागुन) के बदलते प्राकृतिक परिवेश के संदर्भ में राजा रत्नसेन के वियोग में रानी नागमती की गहरी विरह-वेदना का अत्यंत मार्मिक और सजीव वर्णन किया है।

व्याख्या (Explanation):

पूस के महीने में कड़ाके की सर्दी पड़ रही है। नागमती कहती है कि ठंड से मेरा शरीर थर-थर काँप रहा है। सूरज भी ठंड से डरकर दक्षिण दिशा (लंका की ओर) जाकर छिप गया है।
विरह के कारण यह ठंड मेरे लिए और भी भयानक हो गई है। मैं काँप-काँप कर मर रही हूँ। मेरे पास रजाई और गद्दे (सौर-सुपेती) भी मुझे ठंडक (जूड़ी) दे रहे हैं, मानो मेरी सेज (बिस्तर) बर्फ में डूबी हो।
नागमती कहती है कि चकई तो सिर्फ रात में बिछड़ती है और दिन में मिल जाती है, लेकिन मैं तो रात-दिन कोयल की तरह तड़प रही हूँ। विरह रूपी बाज (सचान) मेरे शरीर को नोंच-नोंच कर खा रहा है।
मेरा सारा खून ढल गया है, मांस गल गया है और हड्डियाँ सूखकर शंख जैसी हो गई हैं। नागमती सारस की तरह रटते-रटते मर गई है, अब तुम आकर उसके पंख समेट लो।

भावार्थ (Core Meaning): पूस की ठंड में पति का साथ न होना मृत्युतुल्य है। नागमती का शरीर सूखकर हड्डियों का ढाँचा बन गया है।

विशेष (Vishesh):

  • 'विरह सचान' में रूपक अलंकार है।
  • चकवा-चकवी और सारस के उदाहरण से वियोग की तीव्रता दिखाई गई है।

3. माघ का महीना (लागेउ माघ परै अब पाला)

लागेउ माघ परै अब पाला। बिरहा काल भइउ जड़काला।।
पहल-पहल तन रूई जो झाँपै। हहरि-हहरि अधिकौ हिय काँपै।।
आई सूर होइ तपु रे नाहाँ। तेहि बिनु जाड़ न छूटै माहाँ।।
एहि मास उपजै रस मूलू। तू सो भँवर मोर जोबन फूलू।।
नैन चुवहिं जस माहवट नीरू। तेहि जल अंग लाग सर चीरू।।
टूटहिं बूँद परहिं जस ओला। बिरह पवन होइ मारै झोला।।
केहिक सिंगार को पहिर पटोरा। गियँ नहिं हार रही होइ डोरा।।
तुम्ह बिनु कंता धनि हरुई, तन तिनुवर भा डोल।
तेहि पर बिरह जराइ कै, चहै उड़ावा झोल।।

शब्दार्थ (Word Meanings):

  • पाला : बहुत अधिक ठंड / बर्फ (Frost)
  • जड़काला : जाड़े का समय / मृत्यु समान
  • हहरि-हहरि : काँप-काँप कर
  • माहवट : माघ की वर्षा (Winter Rain)
  • चीरू : वस्त्र / कपड़े
  • सर : बाण / तीर
  • झोला : झोंका
  • तिनुवर : तिनका

प्रसंग:

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित पाठ 'बारहमासा' (महाकाव्य 'पद्मावत' से) से ली गई हैं। इसके रचयिता सूफी प्रेमाख्यानक परंपरा के प्रमुख कवि मलिक मुहम्मद जायसी हैं। इन पंक्तियों में कवि ने विभिन्न ऋतुओं और महीनों (अगहन, पूस, माघ, फागुन) के बदलते प्राकृतिक परिवेश के संदर्भ में राजा रत्नसेन के वियोग में रानी नागमती की गहरी विरह-वेदना का अत्यंत मार्मिक और सजीव वर्णन किया है।

व्याख्या (Explanation):

माघ का महीना लग गया है और अब पाला पड़ने लगा है। नागमती कहती है कि यह सर्दी मेरे लिए साक्षात काल (मौत) बन गई है।
मैं ठंड से बचने के लिए अपने शरीर को रूई के कपड़ों से ढकती हूँ, लेकिन ठंड इतनी ज्यादा है कि मेरा हृदय 'हहर-हहर' (बुरी तरह) काँपता है। वह सूर्य (पति) को बुलाती है कि आकर तपें ताकि ठंड जाए।
मेरी आँखों से लगातार आँसू ऐसे टपक रहे हैं जैसे माघ महीने की बारिश (माहवट) हो रही हो। आँसुओं से भीगे हुए कपड़े (चीर) मेरे शरीर को बाण (सर) की तरह चुभ रहे हैं। आँसुओं की बूँदें ओले की तरह ठंडी होकर गिर रही हैं। विरह रूपी हवा मुझे झकझोर रही है।
तुम बिन पत्नी (धनि) इतनी हल्की (कमजोर) हो गई है जैसे तिनका (तिनुवर), और उस पर विरह उसे जलाकर उड़ा देना चाहता है।

भावार्थ (Core Meaning): माघ की वर्षा और पाला नागमती के लिए कष्टकारी हैं। उसके आँसू भी ओले बनकर उसे चोट पहुँचा रहे हैं।

विशेष (Vishesh):

  • 'नैन चुवहिं जस माहवट नीरू' में उपमा अलंकार और अतिशयोक्ति है।
  • 'तन तिनुवर भा डोल' में उपमा अलंकार है।

4. फागुन का महीना (फागुन पवन झकोरा बहा)

फागुन पवन झकोरा बहा। चौगुन सीउ जाइ नहिं सहा।।
तन जस पियर पात भा मोरा। बिरह न रहै पवन होइ झोरा।।
तरिवर झरै झरै बन ढाँखा। भइ अनपत्त फूल फर साखा।।
करिन्ह बनाफति कीन्ह हुलासू। मो कहँ भा जग दून उदासू।।
फाग करहि सब चाँचरि जोरी। मोहिं जिय लाइ दीन्हि जस होरी।।
जौं पै पियहि जरत अस भावा। जरत मरत मोहि रोस न आवा।।
रातिहु दिवस इहै मन मोरें। लागौं कंत छार जेऊँ तोरें।।
यह तन जारौं छार कै, कहौं कि पवन उड़ाउ।
मकु तेहि मारग उड़ि परै, कंत धरै जहँ पाउ।।

शब्दार्थ (Word Meanings):

  • झकोरा : हवा का तेज झोंका
  • चौगुन : चार गुना
  • पियर पात : पीले पत्ते
  • अनपत्त : बिना पत्तों के
  • हुलासू : उल्लास / खुशी
  • चाँचरि : होली का लोकगीत
  • मकु : शायद

प्रसंग:

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित पाठ 'बारहमासा' (महाकाव्य 'पद्मावत' से) से ली गई हैं। इसके रचयिता सूफी प्रेमाख्यानक परंपरा के प्रमुख कवि मलिक मुहम्मद जायसी हैं। इन पंक्तियों में कवि ने विभिन्न ऋतुओं और महीनों (अगहन, पूस, माघ, फागुन) के बदलते प्राकृतिक परिवेश के संदर्भ में राजा रत्नसेन के वियोग में रानी नागमती की गहरी विरह-वेदना का अत्यंत मार्मिक और सजीव वर्णन किया है।

व्याख्या (Explanation):

फागुन का महीना आ गया है। हवा के तेज झोंके चल रहे हैं जिससे ठंड चौगुनी बढ़ गई है। नागमती कहती है कि पतझड़ के कारण मेरा शरीर भी पेड़ के 'पीले पत्ते' (पियर पात) जैसा कमजोर और पीला हो गया है। विरह मुझे हवा के झोंके की तरह झकझोर रहा है, जिससे डर है कि कहीं मैं पत्ते की तरह टूट न जाऊँ।
प्रकृति में वनस्पतियाँ (पेड़-पौधे) उल्लास मना रही हैं, नए पत्ते आ रहे हैं, लेकिन मेरे लिए तो दुनिया दोगुनी उदास हो गई है। सब लोग मिलकर 'फाग' (होली) खेल रहे हैं और खुशियाँ मना रहे हैं, लेकिन मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरे जीवन में होली की आग लगा दी गई हो।
अंतिम दोहा: नागमती कहती है कि अगर मेरे प्रियतम को मेरा जलना ही पसंद है, तो मुझे जलने-मरने में कोई क्रोध नहीं है। मैं तो बस यही चाहती हूँ कि मरने के बाद भी उनके काम आ सकूँ। मैं इस शरीर को जलाकर राख (छार) कर दूँगी और हवा से कहूँगी कि इस राख को उड़ा ले जाए। शायद उड़ते हुए वह राख उस रास्ते पर गिर जाए जहाँ मेरे पति (कंत) अपने पैर रखें। मरने के बाद ही सही, मुझे उनका स्पर्श मिल जाएगा।

भावार्थ (Core Meaning): नागमती का प्रेम इतना गहरा है कि वह मरने के बाद भी अपने पति के चरणों की धूल बनना चाहती है।

विशेष (Vishesh):

  • अंतिम दोहे में आत्म-समर्पण और प्रेम की पराकाष्ठा है।
  • 'तन जस पियर पात' में उपमा अलंकार है।
  • वियोग श्रृंगार रस का उत्कृष्ट उदाहरण है।

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