Class 9 भारति, जय, विजयकरे! Important Extra Questions | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
यहाँ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' जी द्वारा रचित प्रसिद्ध कविता "भारति, जय, विजयकरे!" के परीक्षा की दृष्टि से 7 सबसे महत्वपूर्ण अतिरिक्त प्रश्न-उत्तर (Extra Questions) दिए गए हैं। ये प्रश्न अभ्यास पुस्तिका से अलग हैं और परीक्षाओं (Board / Non-Board Exams) में अक्सर पूछे जाते हैं।
परीक्षापयोगी महत्वपूर्ण अतिरिक्त प्रश्न-उत्तर
प्रश्न 1. 'भारति, जय, विजयकरे!' कविता का केंद्रीय भाव (मूल संवेदना) अपने शब्दों में लिखिए।
इस कविता का केंद्रीय भाव राष्ट्रप्रेम, भारत की सांस्कृतिक और भौगोलिक महानता का गुणगान तथा देश की विजय की कामना है। कवि निराला जी ने भारत भूमि को एक साधारण ज़मीन का टुकड़ा न मानकर उसे एक देवी (सजीव चेतन सत्ता) के रूप में चित्रित किया है। कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य, आध्यात्मिक शक्ति और धन-धान्य संपन्नता का वंदन किया गया है।
प्रश्न 2. निराला जी ने भारत माता के स्वरूप का वर्णन किन प्राकृतिक उपादानों के माध्यम से किया है?
कवि ने प्रकृति का सुंदर मानवीकरण करते हुए भारत माता के स्वरूप का चित्रण किया है:
- हिमालय को भारत माता का श्वेत मुकुट (हिम-तुषार) बताया गया है।
- वन, वृक्ष और लताओं को उनके वस्त्र (वसन) कहा गया है।
- गंगा नदी की श्वेत धारा को उनके गले का मोतियों जैसा हार बताया गया है।
- दक्षिण में स्थित विशाल समुद्र को उनके पवित्र चरणों को धोने वाले के रूप में चित्रित किया गया है।
प्रश्न 3. कविता में प्रयुक्त 'शतमुख-शतरव-मुखरे' पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
'शतमुख-शतरव-मुखरे' का शाब्दिक अर्थ है— 'सैकड़ों मुखों से निकलने वाली सैकड़ों प्रकार की ध्वनियाँ'। यह पंक्ति भारत की विविधता में एकता और उसके ज्ञान की विश्वव्यापी गूँज को दर्शाती है। भारत में अनेक भाषाएँ, बोलियाँ और संस्कृतियाँ हैं, फिर भी सभी मिलकर एक स्वर में भारत की महानता का गुणगान करती हैं और भारत के उदार विचार आज चारों दिशाओं में गूँज रहे हैं।
प्रश्न 4. 'प्राण प्रणव ओंकार' कहकर कवि ने भारत की किस विशेषता की ओर संकेत किया है?
हिंदू दर्शन में 'ओंकार' (ॐ) को ब्रह्मांड की मूल ध्वनि और सर्वोच्च ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। कवि का आशय है कि भारत की जीवन-शक्ति (प्राण) और उसकी आत्मा इसी पवित्र ओंकार मंत्र के समान आध्यात्मिक और दार्शनिक ज्ञान से परिपूर्ण है। भारत केवल भौतिक रूप से ही नहीं, बल्कि बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से भी विश्व का मार्गदर्शन करता है।
प्रश्न 5. छायावादी काव्य-शैली का इस कविता पर क्या प्रभाव दिखाई देता है? स्पष्ट करें।
छायावादी कविता की सबसे प्रमुख विशेषता 'प्रकृति का मानवीकरण' और 'राष्ट्रीय चेतना' होती है। इस कविता में निराला जी ने प्रकृति (नदी, पर्वत, समुद्र, वन) को निर्जीव न मानकर एक सजीव देवी (भारत माता) के रूप में देखा है। इसके साथ ही कविता में संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दों (जैसे— ज्योतिर्जल, गर्जितोर्मि, शुचि) का संगीतात्मक प्रयोग इसे एक श्रेष्ठ छायावादी रचना बनाता है।
प्रश्न 6. परीक्षा की दृष्टि से आशय स्पष्ट करें- "स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!"
'स्तव' का अर्थ है स्तुति (प्रशंसा) करना। इस पंक्ति का आशय है कि दक्षिण में स्थित विशाल सागर अपनी गरजती हुई लहरों के माध्यम से भारत माता के चरणों को धो रहा है। लहरों की वह गर्जना सामान्य शोर नहीं है, बल्कि ऐसा प्रतीत होता है मानो समुद्र अनेक अर्थों (महिमा और विशेषताओं) से परिपूर्ण भारत माता की स्तुति कर रहा हो। अर्थात् प्रकृति स्वयं भारत की महानता के गीत गा रही है।
प्रश्न 7. वर्तमान समय में 'भारति, जय, विजयकरे!' कविता की प्रासंगिकता क्या है?
वर्तमान समय में जब समाज में भौतिकता बढ़ रही है और लोग अपनी संस्कृति व प्रकृति से दूर हो रहे हैं, तब यह कविता अत्यंत प्रासंगिक हो जाती है। यह युवाओं में देशप्रेम, अपनी सांस्कृतिक धरोहर और प्राकृतिक संपदा (नदियों, वनों, पहाड़ों) के प्रति सम्मान जगाती है। यह हमें सिखाती है कि प्रकृति का संरक्षण करना और अपने देश की विविधता पर गर्व करना ही सच्चा राष्ट्रधर्म है।
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