Bharati Jay Vijaykare Question Answer | निराला जी की कविता (Class Hindi) | भारति, जय, विजयकरे! पाठ के सभी प्रश्न-उत्तर और व्याकरण | NCERT Solutions

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भारति, जय, विजयकरे! | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' Question Answer | NCERT Solutions Hindi

यहाँ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' जी द्वारा रचित प्रसिद्ध कविता "भारति, जय, विजयकरे!" के अभ्यास खंड के सभी प्रश्नों के सटीक उत्तर और उनके पीछे का तर्क (कारण) विस्तार से दिया गया है। यह लेख परीक्षा की तैयारी और नोट्स बनाने के लिए अत्यंत उपयोगी है।


मेरे उत्तर मेरे तर्क - प्रश्न अभ्यास

प्रश्न 1. "भारति, जय, विजयकरे" कविता में विशेष रूप से—
  • (क) भारत की भौगोलिक संरचना की प्रशस्ति की गई है।
  • (ख) भारत की सांस्कृतिक विविधता बताई गई है।
  • (ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।
  • (घ) भारत के खनिज पदार्थों के बारे में बताया गया है।

सही उत्तर: (ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।

तर्क: इस कविता में कवि ने हिमालय, गंगा, सागर और वन-प्रांतर के माध्यम से भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किया है। 'कनक-शस्य-कमलधरे' पंक्ति संपन्नता (कृषि व धन-धान्य) को दर्शाती है, और 'प्राण प्रणव ओंकार' के माध्यम से भारत की ज्ञान और आध्यात्मिक शक्ति की प्रशंसा की गई है। अतः यह विकल्प कविता के संपूर्ण भाव को समेटता है।

प्रश्न 2. "कनक-शस्य-कमल धरे" पंक्ति का भावार्थ है—
  • (क) भारत की धन-धान्य संपन्नता
  • (ख) भारत की नदियों का सौंदर्य
  • (ग) भारत के लोक-जीवन की सुंदरता
  • (घ) भारत की सैन्य शक्ति और औद्योगिक विकास

सही उत्तर: (क) भारत की धन-धान्य संपन्नता

तर्क: यहाँ 'कनक' का अर्थ है स्वर्ण (सोना) और 'शस्य' का अर्थ है फसल (खेतों में लहलहाता अनाज)। कवि भारत भूमि को सोने जैसी मूल्यवान फसलों को धारण करने वाली बताकर उसकी अपार कृषि-परंपरा और धन-धान्य संपन्नता का ही वर्णन कर रहा है।

प्रश्न 3. समस्त विश्व में भारत के महत्व का उद्घोष करने वाली पंक्तियाँ हैं—
  • (क) गंगा ज्योतिर्जल-कण/ धवल धार हार गले
  • (ख) गर्जितोर्मि सागर-जल/ धोता शुचि चरण युगल
  • (ग) भारति, जय, विजयकरे/ कनक-शस्य-कमलधरे!
  • (घ) ध्वनित दिशाएँ उदार/ शतमुख-शतरव-मुखरे!

सही उत्तर: (घ) ध्वनित दिशाएँ उदार/ शतमुख-शतरव-मुखरे!

तर्क: उद्घोष का अर्थ है चारों ओर किसी बात का गूँजना। इन पंक्तियों का अर्थ है कि भारत के ज्ञान (ओंकार) और उसके महान विचारों की गूँज चारों दिशाओं में फैल रही है। 'शतमुख-शतरव' (सैकड़ों मुखों और ध्वनियों से) का प्रयोग यह स्पष्ट करता है कि भारत की महिमा और ज्ञान का संदेश पूरे विश्व में उद्घोषित हो रहा है।

प्रश्न 4. कविता की भाषा और शैली किस विशेषता से संपन्न है?
  • (क) सरल, बोल-चाल की भाषा
  • (ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त
  • (ग) सरस और हास्य-व्यंग्यपूर्ण
  • (घ) संवादात्मक और विश्लेषणात्मक

सही उत्तर: (ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त

तर्क: पूरी कविता में 'गर्जितोर्मि', 'ज्योतिर्जल-कण', 'कनक-शस्य-कमलधरे', और 'शतमुख-शतरव-मुखरे' जैसे तत्सम (संस्कृत) शब्दों का बहुत सुंदर प्रयोग हुआ है। इसके साथ ही इन पदों में दो या दो से अधिक शब्दों को मिलाकर (समास) एक नया शब्द बनाया गया है। अतः यह भाषा स्पष्ट रूप से संस्कृतनिष्ठ और सामासिक है।

प्रश्न 5. भारत के वस्त्रों में 'तरु-तृण-वन-लता' और गले में 'गंगा-धारा' को चित्रित कर कवि किस प्रकार की चेतना का संदेश देते हैं?
  • (क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक
  • (ख) राष्ट्रीयता और देशप्रेम
  • (ग) ऐतिहासिक और भौगोलिक
  • (घ) सामाजिक और राजनीतिक

सही उत्तर: (ख) राष्ट्रीयता और देशप्रेम

तर्क: कवि ने भारतभूमि को कोई साधारण ज़मीन का टुकड़ा नहीं माना है, बल्कि उसे एक सजीव देवी (चेतन सत्ता) के रूप में प्रस्तुत किया है। पेड़-पौधों को उस देवी के वस्त्र और गंगा नदी को गले का हार बताना, मातृभूमि के प्रति अपार श्रद्धा को दर्शाता है। ऐसा मानवीकरण देशवासियों के मन में भारत के प्रति राष्ट्रीयता और देशप्रेम की चेतना जाग्रत करने के लिए किया गया है।

अर्थ और भाव

नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझते हुए इनका भाव स्पष्ट कीजिए—

(क) "लंका पदतल शतदल,
गर्जितोर्मि सागर-जल
धोता शुचि चरण युगल!"

अर्थ: भारत भूमि के पैरों (दक्षिण दिशा) में स्थित लंका खिले हुए सौ पंखुड़ियों वाले कमल (शतदल) के समान प्रतीत होती है। विशाल समुद्र अपनी गरजती हुई लहरों वाले जल से भारत माता के दोनों पवित्र चरणों को निरंतर धो रहा है।

भाव: इन पंक्तियों में कवि ने भारत की भौगोलिक विशालता और प्राकृतिक सौंदर्य के प्रति अपनी अपार श्रद्धा और गौरव का भाव प्रकट किया है। कवि यह कल्पना करता है कि मानो स्वयं प्रकृति (समुद्र) भी भारत माता की वंदना कर रही है।

(ख) "प्राण प्रणव ओंकार,
ध्वनित दिशाएँ उदार,
शतमुख-शतरव-मुखरे!"

अर्थ: भारतवर्ष की जीवन-शक्ति (प्राण) पवित्र 'ॐ' (ओंकार) मंत्र के समान है। भारत की विशाल और उदार दिशाएँ इसी ओंकार की ध्वनि से गूँज रही हैं। ऐसा लगता है मानो सैकड़ों मुखों से निकलने वाले सैकड़ों प्रकार के स्वरों से यह दिशाएँ गुंजायमान हो रही हैं।

भाव: इन पंक्तियों में भारत की आध्यात्मिक शक्ति, दार्शनिक महानता और ज्ञान के विश्वव्यापी प्रसार का भाव निहित है। भारत का ज्ञान-विज्ञान और पवित्र विचार आज पूरे विश्व का मार्गदर्शन कर रहा है।

मेरी समझ मेरे विचार

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए—

प्रश्न 1. कविता में कवि की किस भावना की अभिव्यक्ति मिलती है?
इस कविता में कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' जी की गहरी देशभक्ति (राष्ट्रप्रेम) की भावना की अभिव्यक्ति मिलती है। इसके साथ ही, भारत के प्राकृतिक सौंदर्य, उसकी सांस्कृतिक महानता, ज्ञान-परंपरा और आध्यात्मिक शक्ति के प्रति कवि का सम्मान और गौरव का भाव प्रकट हुआ है। कवि सच्चे हृदय से भारत माता की विजय की कामना कर रहा है।
प्रश्न 2. कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया गया है? क्या आप मानते हैं कि प्रकृति का संरक्षण करना भी देशप्रेम का काम है? क्यों?

कविता में भारत को एक सजीव देवी (चेतन सत्ता) के रूप में चित्रित करते हुए उसके प्राकृतिक सौंदर्य का मानवीकरण किया गया है। हिमालय को देवी का श्वेत मुकुट, वनों और लताओं को उनके वस्त्र, गंगा की धारा को गले का सफेद हार और समुद्र को उनके चरण धोने वाला बताया गया है।

हाँ, प्रकृति का संरक्षण करना भी सच्चा देशप्रेम है। क्योंकि किसी भी देश की वास्तविक पहचान और संपदा वहाँ की प्रकृति (नदियाँ, पहाड़, जंगल, हवा) ही होती है। प्रकृति ही हमारे देशवासियों को जीवन देती है। यदि हम अपनी प्रकृति को नष्ट होने से बचाते हैं, तो अप्रत्यक्ष रूप से हम अपनी मातृभूमि की ही रक्षा कर रहे होते हैं।

प्रश्न 3. "कनक-शस्य-कमलधरे!" पंक्ति भारतभूमि की किन-किन विशेषताओं की ओर संकेत कर रही है?
यह पंक्ति भारतभूमि की निम्नलिखित विशेषताओं की ओर संकेत कर रही है:
1. धन-धान्य संपन्नता: 'कनक' का अर्थ है सोना और 'शस्य' का अर्थ है फसल। यह भारत की अपार कृषि संपदा और खेतों में लहलहाती सोने जैसी मूल्यवान फसलों की ओर संकेत करता है।
2. पवित्रता और सौंदर्य: 'कमलधरे' (कमल को धारण करने वाली) का प्रयोग भारत की सुंदरता, कोमलता और उसकी सांस्कृतिक पवित्रता को दर्शाता है।
प्रश्न 4. "मुकुट शुभ्र हिम-तुषार" पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट बताया गया है, क्यों?
मुकुट हमेशा मस्तक (सिर) पर धारण किया जाता है जो सम्मान, गौरव और रक्षा का प्रतीक होता है। हिमालय पर्वत भारत की उत्तरी दिशा में सबसे ऊँचे शिखर के रूप में स्थित है। वह सदैव सफेद बर्फ (हिम-तुषार) से ढका रहता है, जिससे वह अत्यंत उज्ज्वल और चमकीला दिखाई देता है। भारत के मस्तक पर विराजमान होकर वह एक गौरवशाली और रक्षक मुकुट के समान सुशोभित होता है, इसीलिए हिमालय को भारत का मुकुट कहा गया है।

विधा से संवाद : कविता का सौंदर्य

प्रश्न: इन पंक्तियों में कवि ने चित्रात्मक भाषा का प्रयोग करते हुए भारतभूमि का मनोरम चित्र प्रस्तुत किया है। इस कविता की कुछ अन्य विशेषताओं की सूची नीचे दी गई है। कविता में से उन विशेषताओं वाली पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए—

नीचे दी गई तालिका में कविता की विशेषताओं के आधार पर सटीक पंक्तियाँ ढूँढ़कर लिखी गई हैं:

विशेषताएँ कविता की पंक्तियाँ
1. प्रकृति का मानवीकरण
(प्रकृति को मनुष्य की तरह व्यवहार करते दिखाना)
"लंका पदतल शतदल,
गर्जितोर्मि सागर-जल
धोता शुचि चरण युगल"
तथा
"तरु-तृण-वन-लता वसन,
अंचल में खचित सुमन;"
2. आलंकारिक प्रयोग
(अलंकारों का सुंदर उपयोग)
"शतमुख-शतरव-मुखरे!" (अनुप्रास अलंकार - 'श' वर्ण की आवृत्ति)
"मुकुट शुभ्र हिम-तुषार" (रूपक अलंकार - हिमालय को मुकुट माना गया है)
3. समस्त पद/सामासिक पद का प्रयोग
(दो या अधिक शब्दों के मेल से बने शब्द)
"कनक-शस्य-कमलधरे!"
"गर्जितोर्मि सागर-जल"
"ज्योतिर्जल-कण"
"शतमुख-शतरव-मुखरे!"
4. संस्कृतनिष्ठ भाषा प्रयोग
(तत्सम या संस्कृत के शब्दों का उपयोग)
"प्राण प्रणव ओंकार,
ध्वनित दिशाएँ उदार,"
तथा
"धोता शुचि चरण युगल
स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!"

💡 व्याख्या: निराला जी की इस कविता में प्रकृति का सजीव चित्रण (मानवीकरण) हुआ है जहाँ समुद्र भारत माता के चरण धो रहा है और वन-लताएँ उनके वस्त्र हैं। पूरी कविता संस्कृत के तत्सम शब्दों (जैसे- शुचि, युगल, स्तव, प्रणव) और सामासिक पदों से सजी हुई है, जो इसे एक अद्भुत काव्य-सौंदर्य प्रदान करती है।

विषयों से संवाद - प्रश्न अभ्यास

प्रश्न 1. स्वतंत्रता-पूर्व लिखी इस कविता में भारत को ज्ञान, कृषि और संस्कृति के प्रतीक/परिचायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वर्तमान संदर्भ में यदि आपको भारत को एक नए रूप में प्रस्तुत करने का अवसर मिले तो आप भारत की किन विशेषताओं और विविधताओं को सम्मिलित करेंगे?
वर्तमान संदर्भ (21वीं सदी) में यदि मुझे भारत को एक नए रूप में प्रस्तुत करने का अवसर मिले, तो मैं निम्नलिखित आधुनिक विशेषताओं और विविधताओं को सम्मिलित करूँगा/करूँगी:
  • तकनीकी और वैज्ञानिक प्रगति: अंतरिक्ष विज्ञान (ISRO के चंद्रयान/मंगलयान मिशन) और सूचना प्रौद्योगिकी (IT Sector) में भारत का वैश्विक दबदबा।
  • युवा शक्ति (Demographic Dividend): भारत विश्व का सबसे युवा देश है, जिसका टैलेंट और स्टार्ट-अप इकोसिस्टम (Start-ups) पूरी दुनिया में परचम लहरा रहा है।
  • डिजिटल इंडिया: डिजिटल पेमेंट (UPI) और संचार क्रांति के माध्यम से जुड़ता हुआ नया भारत।
  • वैश्विक संस्कृति और स्वास्थ्य: योग (Yoga) और आयुर्वेद की विश्वभर में बढ़ती मान्यता और 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के तहत दुनिया की मदद करने वाला भारत।
प्रश्न 2. "शतमुख-शतरव-मुखरे!" पंक्ति में भारत के विविध पर्व, उत्सव और रीति-रिवाज किस प्रकार 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की संकल्पना को साकार करते हैं?
'शतमुख-शतरव-मुखरे!' का अर्थ है— सैकड़ों मुखों से निकलने वाली सैकड़ों प्रकार की ध्वनियाँ। भारत विविधताओं का देश है। यहाँ हर राज्य की अपनी भाषा, बोली, पहनावा, पर्व (जैसे- दीपावली, ईद, पोंगल, बैसाखी, बिहू आदि) और रीति-रिवाज हैं।

जब ये अलग-अलग पर्व और उत्सव पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाए जाते हैं, तो पूरे देश से खुशी और प्रार्थना के अनगिनत (सैकड़ों) स्वर गूँजते हैं। ध्वनियाँ (शतरव) भले ही अलग-अलग हों, लेकिन उन सबका उद्देश्य प्रेम, भाईचारा और शांति फैलाना होता है। यह सांस्कृतिक विविधता हमें बाँटने के बजाय आपस में जोड़ती है और विविधता में एकता (Unity in Diversity) का संदेश देती है। इसी समरसता से 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की संकल्पना साकार होती है।
प्रश्न 3. भारत को सुदृढ़ करने में इसकी प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा के महत्व को बताते हुए संक्षिप्त लेख लिखिए।
भारत की सुदृढ़ता और महानता का मूल आधार इसकी प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा का अनूठा संगम है:

1. प्रकृति: भारत की भौगोलिक संरचना अत्यंत समृद्ध है। उत्तर में रक्षक हिमालय, दक्षिण में महासागर, पवित्र नदियाँ (गंगा, यमुना), वन-संपदा और उपजाऊ मैदान भारत को कृषि प्रधान और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाते हैं।
2. संस्कृति: हमारी संस्कृति 'अतिथि देवो भव:' और 'सर्वधर्म समभाव' पर आधारित है। यहाँ की कला, संगीत, साहित्य और सहिष्णुता की भावना ने पूरे विश्व को एक परिवार माना है, जो देश को आंतरिक रूप से मजबूत करती है।
3. ज्ञान-परंपरा: प्राचीन काल से ही भारत 'विश्वगुरु' रहा है। वेदों-उपनिषदों का आध्यात्मिक ज्ञान, शून्य का आविष्कार, आयुर्वेद और आधुनिक युग के तकनीकी विकास तक— भारत की ज्ञान-परंपरा निरंतर देश को बौद्धिक रूप से सशक्त और सुदृढ़ बना रही है।
प्रश्न 4. कविता में गंगा को भारत के स्वच्छ और श्वेत हार एवं हिमालय को मुकुट के रूप में अभिव्यक्त किया गया है। वर्तमान संदर्भ में बताइए कि बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन ने हमारी नदियों और हिमालय को किस प्रकार प्रभावित किया है?
वर्तमान संदर्भ में बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) ने भारत की प्रकृति को अत्यंत गंभीर रूप से प्रभावित किया है:

नदियों (गंगा) पर प्रभाव: कविता में गंगा को भारत माता का 'स्वच्छ और श्वेत हार' बताया गया है। लेकिन आज औद्योगीकरण, कारखानों के रसायनों, प्लास्टिक कचरे और शहरों के सीवेज के कारण नदियाँ अत्यंत प्रदूषित हो गई हैं। उनका जल अब श्वेत और निर्मल नहीं रहा, बल्कि विषैला और मैला हो गया है।

हिमालय पर प्रभाव: हिमालय को 'शुभ्र हिम-तुषार' (बर्फ का सफेद मुकुट) कहा गया है। ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय का तापमान बढ़ रहा है और वहाँ के ग्लेशियर (Glaciers) तेजी से पिघल रहे हैं। इससे बर्फ का मुकुट सिकुड़ रहा है, बेमौसम बाढ़ आ रही है और पहाड़ों पर भूस्खलन (Landslides) जैसी आपदाएं बढ़ गई हैं।

सृजन - रचनात्मक प्रश्न अभ्यास

प्रश्न 1. मान लीजिए आपको भारत को एक मनुष्य के रूप में कल्पित करते हुए सुसज्जित करने का अवसर मिले तो आप अपने राज्य के किन सांस्कृतिक, पारंपरिक वेशभूषा, आभूषण, चिह्नों, पुष्पों आदि का प्रयोग कर उसकी साज-सज्जा करेंगे?
यदि मुझे भारत को एक सजीव मनुष्य (भारत माता या पुरुष) के रूप में कल्पित कर सुसज्जित करने का अवसर मिले, तो मैं अपने राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रयोग निम्नलिखित रूप में करूँगा/करूँगी (यहाँ छात्र अपने राज्य के अनुसार भी लिख सकते हैं, उदाहरण स्वरूप एक मिश्रित रूप दिया गया है):

  • वेशभूषा: मैं उन्हें खादी या बनारसी रेशम के वस्त्र (धोती-कुर्ता या साड़ी) पहनाऊँगा, जो भारत के पारंपरिक हथकरघा और सादगी का प्रतीक हैं।
  • आभूषण: गले में रुद्राक्ष या मोतियों की माला और हाथों में पारंपरिक कंगन पहनाऊँगा।
  • चिह्न: मस्तक पर चंदन और रोली का तिलक लगाऊँगा, जो शांति, ज्ञान और पवित्रता का प्रतीक है।
  • पुष्प: साज-सज्जा के लिए मैं कमल (राष्ट्रीय पुष्प) और गेंदे के फूलों की माला का उपयोग करूँगा, जो भारतीय लोक-उत्सवों की पहचान हैं। हाथों में अन्न की बालियाँ (शस्य) दूँगा, जो हमारी कृषि-संपन्नता को दर्शाएंगी।
प्रश्न 2. भारत पर आधारित एक डाक टिकट, पोस्टर या पुस्तक के लिए आवरण पृष्ठ बनाइए और बताइए कि आप उसमें किन-किन प्रतीकों को सम्मिलित करेंगे और क्यों?
मैं भारत पर आधारित एक पोस्टर बनाऊँगा/बनाऊँगी, जिसका शीर्षक होगा "अतुल्य और उदयमान भारत"। इसमें मैं निम्नलिखित प्रतीकों को सम्मिलित करूँगा:

  • तिरंगा पृष्ठभूमि: पोस्टर के बैकग्राउंड में केसरिया, सफेद और हरा रंग होगा, जो साहस, शांति और हरियाली का प्रतीक है।
  • अशोक चक्र और रॉकेट (चंद्रयान): यह भारत की निरंतर प्रगति और विज्ञान के क्षेत्र में अंतरिक्ष की उड़ानों का प्रतीक होगा।
  • किसान और सैनिक: नीचे की तरफ खेत जोतते किसान और सीमा पर खड़े सैनिक का चित्र होगा, जो "जय जवान, जय किसान" की शक्ति को दर्शाएगा।
  • विविधता में एकता: भारत के विभिन्न धर्मों और लोक-नृत्यों की छोटी-छोटी आकृतियाँ होंगी, जो हमारी सांस्कृतिक समरसता का कारण हैं।
प्रश्न 3. नदी की यात्रा— गंगा नदी की अपने उद्गम से लेकर बंगाल की खाड़ी में विलीन होने तक की पूरी यात्रा के बीच में आने वाली प्राकृतिक, सांस्कृतिक, भाषिक आदि विशेषताओं का वर्णन करते हुए एक रोचक यात्रा-वृत्तांत लिखिए। (संकेत– पर्वतीय सौंदर्य से लेकर गंगासागर तक की संस्कृति इत्यादि)
मेरी जीवन-यात्रा: गंगा की जुबानी (यात्रा-वृत्तांत)

मेरा जन्म हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों के बीच 'गोमुख' (गंगोत्री) से हुआ। अपने उद्गम स्थल पर मैं एक चंचल और पवित्र जलधारा हूँ। हिमालय के ऊँचे-नीचे रास्तों, देवदार और चीड़ के वनों को पार करते हुए मैं ऋषिकेश और हरिद्वार पहुँचती हूँ। यहाँ पहाड़ों का शांत सौंदर्य पीछे छूट जाता है और मैदानों की शुरुआत होती है। हर शाम यहाँ के घाटों पर होने वाली मेरी आरती और शंख-घंटियों की ध्वनि से मेरा हृदय प्रफुल्लित हो उठता है। यहाँ के लोग गढ़वाली और हिंदी मिश्रित भाषा बोलते हैं।

हरिद्वार से आगे बढ़ते हुए मैं उत्तर प्रदेश के विशाल मैदानों में प्रवेश करती हूँ। कानपुर और संगम-नगरी प्रयागराज में यमुना और सरस्वती से मेरा ऐतिहासिक मिलन होता है। यहाँ कुंभ के मेलों में भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा रूप देखने को मिलता है। फिर मैं प्राचीन नगरी काशी (वाराणसी) पहुँचती हूँ, जहाँ के घाटों पर जीवन और मृत्यु का अद्भुत दार्शनिक रहस्य बसा है। यहाँ अवधी और भोजपुरी का मिठास भरा स्वर सुनाई देता है।

बिहार में प्रवेश करते ही मगही और मैथिली लोक-गीतों के साथ खेतों को हरा-भरा करती हुई, मैं अंततः पश्चिम बंगाल पहुँचती हूँ। यहाँ मेरी धारा कई शाखाओं (हुगली आदि) में बँट जाती है। यहाँ के लोगों का बंगाली संगीत और संस्कृति मुझे भाव-विभोर कर देती है। अपनी लंबी, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक यात्रा के बाद मैं गंगासागर में अपने गंतव्य— बंगाल की खाड़ी (महासागर)— में विलीन हो जाती हूँ। मेरी यह यात्रा मात्र एक नदी की यात्रा नहीं, बल्कि पूरी भारतीय सभ्यता की जीवन-रेखा है।

व्याकरण की बात : बहुभाषी देश हमारा

प्रश्न 1. भारत की एक विशेषता उसकी बहुभाषिकता है। यदि आपको एक सचेत नागरिक के रूप में भारत से अपनी मातृभाषा में संवाद का अवसर मिले तो आप किन विषयों पर और क्या-क्या संवाद करना चाहेंगे? इन संवादों को अपनी मातृभाषा और हिंदी में लिखिए। (संकेत– समाज, पर्यावरण, संस्कृति आदि।)

(नोट: छात्र अपनी क्षेत्रीय मातृभाषा—जैसे पंजाबी, मराठी, गुजराती, बंगाली आदि—का प्रयोग कर सकते हैं। यहाँ उदाहरण के लिए भोजपुरी/अवधी और हिंदी का प्रयोग किया गया है।)

मैं एक सचेत नागरिक के रूप में 'पर्यावरण संरक्षण' और 'स्वच्छता' के विषय पर संवाद करना चाहूँगा:

मातृभाषा (भोजपुरी) में संवाद:
  • नागरिक 1: रउवा कइसन बानी? आजकाल नदिया अउर गाछ-बृच्छ के बहुत नोकसान हो रहल बा।
  • नागरिक 2: हँ भइया, इ त बहुत चिंता के बात बा। हमनी के मिल के पर्यावरण बचावे खातिर कुछ करे के चाहीं, ना त आगे चल के बहुत दिक्कत होई।
हिंदी में संवाद:
  • नागरिक 1: आप कैसे हैं? आजकल नदियों और पेड़-पौधों का बहुत नुकसान हो रहा है।
  • नागरिक 2: हाँ भैया, यह तो बहुत चिंता की बात है। हमें मिलकर पर्यावरण बचाने के लिए कुछ करना चाहिए, नहीं तो भविष्य में बहुत परेशानी होगी।

मातृभाषा और भाव

प्रश्न 2. “स्तव कर बहु-अर्थ-भरे” - उपर्युक्त पंक्ति में भारत की प्रशंसा विविध अर्थों में की गई है। आप भी अपनी मातृभाषा में भारत की स्तुति के लिए एक कविता की रचना कीजिए और उसका भावार्थ हिंदी में भी लिखिए।

(नोट: यहाँ उदाहरण के लिए लोक-भाषा/भोजपुरी के पुट के साथ एक स्वरचित कविता दी गई है। छात्र अपनी मातृभाषा में भी कविता लिख सकते हैं।)

मातृभाषा में कविता (स्तुति):

मोर देसवा महान बा, इहवाँ सबकर सान बा।
गंगा मइया धोवेली चरनवा, माटी में बसल प्रान बा।
चारो दिसा गूँजे जयकारा, ईहे हमार अभिमान बा।

हिंदी में भावार्थ:

मेरा देश (भारत) अत्यंत महान है, यहाँ रहने वाले हर व्यक्ति और धर्म का पूरा सम्मान है। पवित्र गंगा माता इस देश के चरणों को धोती हैं, और यहाँ की पावन मिट्टी में हमारे प्राण बसते हैं। चारों दिशाओं में भारत माता की जय-जयकार गूँज रही है, और यही हमारा सबसे बड़ा अभिमान (गर्व) है।

समास — समस्त पद एवं विग्रह

प्रश्न 1. कविता में से चुनकर कुछ सामासिक पद (शब्द) नीचे दिए गए हैं। उनके समास-विग्रह अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए:
शतदल, ज्योतिर्जल, शतमुख, सागरजल

नीचे दिए गए सामासिक पदों का समास-विग्रह और समास का नाम स्पष्ट किया गया है:

समस्त पद (सामासिक शब्द) समास विग्रह समास का नाम
शतदल शत (सौ) दलों (पंखुड़ियों) का समूह द्विगु समास
ज्योतिर्जल ज्योति रूपी जल कर्मधारय समास
शतमुख शत (सौ) मुखों का समूह द्विगु समास
सागरजल सागर का जल तत्पुरुष समास (संबंध)

अलंकार — समझ और प्रयोग

(रैदास के पद पाठ के आधार पर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए)

प्रश्न 2 (क). कविता में जहाँ-जहाँ अनुप्रास अलंकार आया है, उन पंक्तियों को खोजकर लिखिए।
अनुप्रास अलंकार: (जहाँ एक ही वर्ण या अक्षर की आवृत्ति बार-बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।)

कविता में अनुप्रास अलंकार के उदाहरण वाली पंक्तियाँ निम्नलिखित हैं:
  • "कनक-स्य-कमलरे!" (श और ध वर्ण की आवृत्ति)
  • "तमुख-तरव-मुखरे!" ('श' वर्ण की आवृत्ति)
  • "प्राप्रणव ओंकार" ('प्र' वर्ण की आवृत्ति)
  • "वल धार हार गले" ('ध' वर्ण की आवृत्ति)
प्रश्न 2 (ख). कविता की उन पंक्तियों को खोजिए जहाँ रूपक अलंकार है। साथ ही यह भी बताइए कि कवि ने किस प्राकृतिक दृश्य या वस्तु को भारत का रूप मानकर चित्रित किया है?
रूपक अलंकार: (जहाँ उपमेय और उपमान में अत्यधिक समानता के कारण अभेद आरोप किया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है।)

कविता में रूपक अलंकार की पंक्तियाँ और उनका चित्रण:

1. "मुकुट शुभ्र हिम-तुषार"
चित्रण: यहाँ 'हिमालय' (बर्फ से ढके पहाड़) को भारत माता के सिर का 'श्वेत मुकुट' मान लिया गया है।

2. "तरु-तृण-वन-लता वसन"
चित्रण: यहाँ भारत के 'पेड़-पौधे, घास, वन और लताओं' को भारत माता के 'वस्त्र (वसन)' का रूप मान लिया गया है।

3. "गंगा ज्योतिर्जल-कण / धवल धार हार गले"
चित्रण: यहाँ 'गंगा नदी की श्वेत और चमकती जलधारा' को भारत माता के गले का 'सफेद मोतियों का हार' मान लिया गया है।
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