नए इलाके में / खुशबू रचते हैं हाथ : सप्रसंग व्याख्या
नमस्कार विद्यार्थियों! आज के इस ब्लॉग पोस्ट में हम कक्षा 9वीं हिंदी (स्पर्श भाग-1) के पाठ 14 का अध्ययन करेंगे। इसमें अरुण कमल जी की दो प्रसिद्ध कविताएँ शामिल हैं: 'नए इलाके में' और 'खुशबू रचते हैं हाथ'। दोनों कविताओं का भावार्थ, शब्दार्थ और विशेष यहाँ विस्तार से दिया गया है।
कविता 1: नए इलाके में (Naye Ilake Mein)
कविता का सार (Summary)
इस कविता में अरुण कमल जी ने बताया है कि दुनिया कितनी तेजी से बदल रही है। 'नए इलाके में' रोज नई इमारतें बन रही हैं, जिससे पुरानी निशानियाँ गायब हो जाती हैं। कवि कहते हैं कि इस बदलती दुनिया में यादों के भरोसे नहीं रहा जा सकता। यहाँ एक दिन में ही सब कुछ इतना बदल जाता है कि व्यक्ति अपना रास्ता भूल जाता है और उसे हर दरवाजा खटखटाकर पूछना पड़ता है।
पद्यांश 1: पुरानी निशानियों का खोना
इन नए बसते इलाकों में
जहाँ रोज बन रहे हैं नए-नए मकान
मैं अकसर रास्ता भूल जाता हूँ।
धोखा दे जाते हैं पुराने निशान
खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़
खोजता हूँ ढ़ाहा हुआ घर
और जमीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बाएँ मुड़ना था
मुझे फिर दो मकान बाद बिना रंग वाले लोहे के फाटक का घर था एक-मंजिला।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- बसते : बनते हुए / आबादी बढ़ते हुए
- ताकता : देखता
- ढाहा हुआ : गिरा हुआ / टूटा हुआ
- फाटक : बड़ा दरवाजा (Gate)
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
कवि कहते हैं कि इन नए बसते हुए इलाकों में हर रोज नए-नए मकान बन रहे हैं। यहाँ का नक्शा इतनी जल्दी बदलता है कि मैं अक्सर अपना रास्ता भूल जाता हूँ। रास्ता याद रखने के लिए मैंने जो पुरानी निशानियाँ बनाई थीं (जैसे पीपल का पेड़, टूटा हुआ घर, खाली ज़मीन), वे अब मुझे धोखा दे जाती हैं क्योंकि उनकी जगह अब नई इमारतें खड़ी हो गई हैं। कवि याद करते हैं कि खाली ज़मीन से बाएँ मुड़कर, दो मकान छोड़कर एक बिना रंग वाले लोहे के फाटक वाला एक मंज़िला घर था, लेकिन अब वह निशानियाँ ही गायब हैं।
विशेष (Vishesh):
- 'नए-नए' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
- बदलते शहर का यथार्थ चित्रण है।
- भाषा सरल खड़ी बोली है।
पद्यांश 2: समृति का भरोसा नहीं
और मैं हर बार एक घर पीछे चल देता हूँ
या दो घर आगे ठकमकाता हूँ
यहाँ रोज कुछ बन रहा है
रोज कुछ घट रहा है
यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं
एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया
जैसे वसंत का गया पतझड़ को लौटा हूँ
जैसे बैसाख का गया भादों को लौटा हूँ
अब यही है उपाय कि हर दरवाजा खटखटाओ
और पूछो- क्या यही है वो घर?
शब्दार्थ (Word Meanings):
- ठकमकाता : रुकना / डगमगाना
- स्मृति : याददाश्त
- बैसाख : गर्मी का एक महीना
- भादों : बारिश का महीना
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
कवि कहते हैं कि रास्ता भूलने के कारण या तो मैं अपने गंतव्य से एक घर पीछे रह जाता हूँ या दो घर आगे निकल जाता हूँ। यहाँ निर्माण कार्य इतनी तेजी से हो रहा है कि यादों का कोई भरोसा नहीं है। ऐसा लगता है मानो एक ही दिन में दुनिया पुरानी हो गई है। कवि को लगता है कि वे बहुत लंबे समय बाद लौटे हैं—जैसे वसंत ऋतु में गए थे और पतझड़ में लौटे हों, या बैसाख (गर्मी) में गए थे और भादों (बरसात) में लौटे हों। जबकि वे कम समय में ही लौटे हैं, पर बदलाव इतना ज्यादा है। अब सही घर ढूँढने का एक ही उपाय बचा है—हर दरवाजा खटखटाकर पूछो कि क्या यही वह घर है?
विशेष (Vishesh):
- 'वसंत का गया पतझड़ को लौटा' मुहावरेदार प्रयोग है जो भारी बदलाव को दर्शाता है।
- अनिश्चितता का भाव प्रमुख है।
कविता 2: खुशबू रचते हैं हाथ (Khushboo Rachte Hain Haath)
कविता का सार (Summary)
यह कविता सामाजिक विषमता (Social Inequality) पर करारा व्यंग्य है। अरुण कमल जी बताते हैं कि जो मजदूर हमारे लिए सुगंधित अगरबत्तियाँ बनाते हैं, वे खुद दुनिया की सबसे गंदी और बदबूदार बस्तियों में रहते हैं। यह समाज की विडंबना है कि दूसरों के जीवन में खुशबू भरने वाले खुद गंदगी में जीने को मजबूर हैं।
पद्यांश 1: गंदी बस्ती का चित्रण
कई गलियों के बीच
कई नालों के पार
कूड़े-करकट के ढेरों के बाद
बदबू से फटते जाते इस टोले के अंदर
खुशबू रचते हैं हाथ
खुशबू रचते हैं हाथ!
शब्दार्थ (Word Meanings):
- कूड़े-करकट : कचरा / गंदगी
- टोले : छोटी बस्ती / मोहल्ला
- रचते : बनाते / निर्माण करते
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
कवि कहते हैं कि अगरबत्ती बनाने वाले कारीगर शहर की तंग गलियों के बीच और गंदे नालों के पार रहते हैं। वहाँ चारों तरफ कूड़े-कचरे के ढेर लगे हैं। वह बस्ती (टोला) इतनी गंदी है कि बदबू के मारे नाक फटी जाती है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतनी भीषण गंदगी के बीच रहने वाले ये हाथ ही पूरी दुनिया के लिए खुशबूदार अगरबत्तियाँ बनाते हैं।
विशेष (Vishesh):
- 'खुशबू रचते हैं हाथ' की आवृत्ति (Repetition) समस्या की गहराई को बताती है।
- गंदगी का यथार्थवादी (Realistic) चित्रण है।
पद्यांश 2: मजदूरों की दशा और अगरबत्तियों के प्रकार
उभरी नसों वाले हाथ
घिसे नाखूनों वाले हाथ
पीपल के पत्ते से नए-नए हाथ
जूही की डाल से खुशबूदार हाथ
गंदे कटे-पिटे हाथ
जख्म से फटे हुए हाथ
खुशबू रचते हैं हाथ...
...यहीं बनती हैं
केवड़ा, गुलाब, खस और रातरानी अगरबत्तियाँ
दुनिया की सारी गंदगी के बीच
दुनिया की सारी खुशबू
रचते रहते हैं हाथ।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- उभरी नसें : बुजुर्गों के हाथ
- पीपल के पत्ते से : कोमल / बच्चों के हाथ
- जूही की डाल से : नवयुवतियों के सुंदर हाथ
- जख्म : घाव / चोट
- खस, रातरानी : सुगंधित फूलों के नाम
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
कवि उन मजदूरों के हाथों का वर्णन करते हैं जो खुशबू रचते हैं। इनमें कुछ बुजुर्ग हैं जिनके हाथों की नसें उभर आई हैं। कुछ कारीगर ऐसे हैं जिनके नाखून काम करते-करते घिस गए हैं। वहाँ छोटे बच्चे भी काम करते हैं जिनके हाथ पीपल के नए पत्तों जैसे कोमल हैं। कुछ नवयुवतियाँ हैं जिनके हाथ जूही की डाल जैसे सुंदर हैं। कई मजदूरों के हाथ गंदे, कटे-पिटे और जख्मों से भरे हुए हैं।
इन्हीं गंदे और बदबूदार स्थानों पर केवड़ा, गुलाब, खस और रातरानी जैसी प्रसिद्ध खुशबुओं वाली अगरबत्तियाँ बनती हैं। कवि दुख जताते हैं कि दुनिया की सारी गंदगी के बीच रहकर भी ये लोग दुनिया की सारी खुशबू रच रहे हैं।
विशेष (Vishesh):
- 'पीपल के पत्ते से' और 'जूही की डाल से' में उपमा अलंकार है।
- विरोधाभास (Contrast) है: 'गंदगी के बीच खुशबू का निर्माण'।
- संवेदनापूर्ण (Emotional) वर्णन है।
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