Important Questions CBSE Class 10 Hindi A-नौबतखाने में इबादत | नौबतखाने में इबादत (अति महत्त्वपूर्ण प्रश्न)
नौबतखाने में इबादत (अति महत्त्वपूर्ण प्रश्न)
प्रश्न 1.
बिस्मिल्ला खाँ काशी क्यों नहीं छोड़ना चाहते थे? कोई दो कारण लिखिए। 2015
उत्तर:
• बिस्मिल्ला खाँ काशी इसलिए नहीं छोड़ना चाहते थे क्योंकि वे गंगा मैया से अपना अटूट संबंध मानते थे और कहते थे कि उनके खानदान की कई पुश्तों ने यहाँ शहनाई बजाई है।
• जहाँ से अदब हासिल हुआ, जिस ज़मीन ने उन्हें ये हुनर दिया उस जन्नत को छोड़कर जीते जी जाना संभव नहीं है।
प्रश्न 2.
बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की कौन-कौन सी विशेषताओं ने आपको प्रभावित किया? आप इनमें से किन विशेषताओं को अपनाना चाहेंगे? कारण सहित किन्हीं दो का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
बिस्मिल्ला खाँ असाधारण प्रतिभा के धनी थे। उनकी सादगी, मेहनत, लगन, शहनाई के प्रति साधना, मातृभूमि से प्रेम, सभी धर्मों के प्रति समान भाव, खुदा के प्रति आस्था, सरलता, अपने संगीतकारों के प्रति आदर, विनम्रता और सांप्रदायिक सौहार्द की भावना ने हमें ही नहीं सभी के दिलों को छू लिया। हम भी उनके असंख्य गुणों में से कुछ को अवश्य ही अपनाना चाहेंगे-
(i) उनकी सांप्रदायिक सौहार्द की भावना, ताकि इसे अपनाकर हम विभिन्न धर्मों में एकता और भाईचारे का विकास कर सकें, जो आज की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है।
(ii) हम उनकी सादगी व निराभिमान की भावना को भी अपनाना चाहेंगे। इतने प्रसिद्ध व 'भारत-रत्न' की सर्वोच्च उपाधि पाकर भी वे सादगी के साथ रहते थे। हमें भी इसे अपनाकर अपने कार्यों को देश के प्रति समर्पित कर सादगीपूर्ण जीवन-शैली को ही प्राथमिकता देनी चाहिए।
प्रश्न 3.
बिस्मिल्लाह खाँ जीवनभर ईश्वर से क्या माँगते रहे, और क्यों? इससे उनकी किस विशेषता का पता चलता है?
उत्तर:
बिस्मिल्ला जीवन भर ईश्वर से यही माँगते रहे कि खुदा उन्हें एक अच्छा सुर दे। ऐसा सुर जिसमें इतना असर हो कि आँखों से सच्चे मोती जैसे आँसू निकल आएँ। ऐसा वे इसलिए माँगते क्योंकि उन्होंने अपनी कला को कभी पूर्ण नहीं माना। निरंतर बेहतर होने की साधना में लगे रहे। इससे उनकी इस विशेषता का पता चलता है कि वे खुदा में बहुत आस्था व यकीन रखते थे और विनम्रता के साथ सुरों की साधना करते थे। वे कला को ईश्वर की देन मानते थे। वे अपने सुरों से बालाजी, विश्वनाथ में हज़रत इमाम हुसैन तीनों की ही सेवा समान रूप से करते थे।
प्रश्न 4.
एक संगीतज्ञ के रूप में खाँ साहब का जीवन हमें विद्यार्थी जीवन के लिए किन मूल्यों की शिक्षा देता है?
उत्तर:
एक संगीतज्ञ के रूप में खाँ साहब का जीवन विद्यार्थियों को अनेक मूल्यपरक शिक्षाएँ देता है। उनके जीवन से हम विद्यार्थी विनम्रता, सादगी, किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए परिश्रम व लगन जैसे गुण सीख सकते हैं। सफलता पर अभिमान न करना, सांप्रदायिक सद्भावना बनाए रखना, सभी धर्मों को समान मानना, देशहित सर्वोपरि रखना व अंत तक बेहतरी के लिए साधना व श्रमरत रहने जैसे जीवन मूल्यों की सीख हम खाँ साहब के जीवन से ग्रहण कर सकते हैं।
प्रश्न 5.
कैसे कहा जा सकता है कि बिस्मिल्ला खाँ कला के अनन्य उपासक थे। 2014
उत्तर:
बिस्मिल्ला खाँ कला के अनन्य उपासक थे। यह निम्नलिखित बिंदुओं से स्पष्ट हो सकता है-
(i) अस्सी साल की उम्र में भी कला की साधना करते रहे अर्थात शहनाई बजाते रहे।
(ii) इतने कुशल और प्रसिद्ध शहनाई वादक होने के बावजूद भी मालिक से एक अच्छा सुर पाने की प्रार्थना करते रहे।
(iii) अपनी कला को उन्होंने कभी भी धन अर्जन करने का साधन नहीं बनाया। वे सच्चे संगीत साधक थे। इसी कारण उन्हें 'भारत-रत्न' की सर्वोच्च उपाधि से अलंकृत किया गया।
(iv) वे अपनी कला को ईश्वर का आशीर्वाद मानते और सदा बालाजी, विश्वनाथ के मंदिर में तथा हज़रत इमाम हुसैन के सज़दे में शहनाई वादन किया करते थे।
प्रश्न 6.
काशी विश्वनाथ के प्रति बिस्मिल्ला खाँ की श्रद्धा का सोदाहरण उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
अपने मज़हब के प्रति अत्यधिक समर्पित उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ की श्रद्धा काशी विश्वनाथ के प्रति भी अपार थी। वे नित्यप्रति विश्वनाथ, बाला जी मंदिर में आरती के समय शहनाई बजाते थे। बाबा विश्वनाथ व बिस्मिल्ला खाँ एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। काशी, गंगा व बाबा विश्वनाथ से बिस्मिल्ला खाँ को अलग करके नहीं देखा जा सकता। वे जब भी काशी से बाहर रहते तब विश्वनाथ व बालाजी मंदिर की तरफ़ मुँह करके बैठते और अपनी शहनाई का प्याला घुमा और सुर साध कर अपनी श्रद्धा प्रकट करते और भीतर की आस्था रीड के माध्यम से बजनी शुरू हो जाती थी।
प्रश्न 7.
बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की ऐसी दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए जिन्होंने आपको सर्वाधिक प्रभावित किया है।
उत्तर:
बिस्मिल्ला खाँ वैसे तो अनेक विशेषताओं के धनी थे पर उनकी निम्नलिखित विशेषताओं ने हमें बेहद प्रभावित किया है-
(i) बिस्मिल्ला खाँ जात-पाँत और धर्म-संप्रदाय से ऊपर उठकर सभी कामों में सांप्रदायिक सद्भावना का संचार करते थे। वे बालाजी के मंदिर में शहनाई बजाते, तो दूसरी तरफ पाँचों वक्त की नमाज़ भी पढ़ते थे।
(ii) वे अत्यंत विनम्रशील और सादगी पसंद थे। भारत के सर्वोच्च पुरस्कार 'भारतरत्न' मिलने के बाद भी उन्हें घमंड छू तक नहीं गया था। वे सीधा-सादा जीवन जीकर सादगी से रहते थे। वे ‘सादा जीवन, उच्च विचार' की भावना से प्रेरित थे।
प्रश्न 8.
बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की किन विशेषताओं ने आपको प्रभावित किया है और क्यों?
उत्तर:
बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व में अनेक विशेषताएँ हैं जिन्होंने हमें प्रभावित किया है जैसे-
(1) बिस्मिल्ला खाँ जात-पात और धर्म-संप्रदाय से ऊपर उठकर सभी क़ौमों में सांप्रदायिक सद्भावना का संचार करते थे। एक तरफ़ यदि वे बालाजी के मंदिर में जाकर शहनाई बजाते, तो दूसरी तरफ पाँचों वक़्त की नमाज़ भी पढ़ते थे।
(ii) वे अत्यंत विनम्रशील और सादगी पसंद थे। भारत के सर्वोच्च पुरस्कार 'भारतरत्न' मिलने के बाद भी उन्हें घमंड छू तक नहीं गया। वे ‘सादा जीवन, उच्च विचार' की भावना से प्रेरित थे।
(iii) अपने संगीतकारों के प्रति उनके मन में आदर और सहयोग की भावना थी।
(iv) शहनाई के क्षेत्र में सफलता के शिखर पर पहुँचकर भी विनम्रता से ओत-प्रोत थे। वे एक आस्थावान व्यक्ति थे। सभी धर्मों, काशी, गंगा व देश के प्रति उनके मन में आस्था थी। उनकी उपर्युक्त विशेषताओं ने हमें प्रभावित किया क्योंकि इस प्रकार की असाधारण खूबियों विरले लोगों में ही दिखाई पड़ती हैं। इतनी विशेषताएँ होने के बाद भी वे धरातल से जुड़े रहे और ताउम्र संगीत की सेवा निःस्वार्थ भाव से करते रहे।
प्रश्न 9.
बिस्मिल्ला खाँ ने आपस में भाईचारे के साथ रहने की प्रेरणा देशवासियों को किस प्रकार दी?
उत्तर:
बिस्मिल्ला खाँ जाति से मुसलमान थे और धर्म की दृष्टि से इस्लाम धर्म को भजने वाले तथा पाँच वक्त नमाज़ पढ़ने वाले मुसलमान थे। मुर्हरम से उनका विशिष्ट जुड़ाव था। धर्म एवं जातिभेद उनके मन में दूर-दूर तक न था। वे बिना किसी भेदभाव के हिंदू एवं मुसलमान दोनों के उत्सवों में मंगल ध्वनि बजाते थे। उनके मन में बालाजी के प्रति विशेष श्रद्धा थी। वे काशी से बाहर होने पर भी विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की दिशा की ओर मुँह करके बैठते और शहनाई बजाते थे। इस प्रकार वह आपसी भाईचारे के साथ देशवासियों को एक साथ मिल-जुलकर रहने की प्रेरणा देते थे।
प्रश्न 10.
बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की कौन-सी विशेषताओं ने आपको प्रभावित किया है?
उत्तर:
हमें बिस्मिल्ला का सरल, सादगी पूर्ण व्यक्तित्व, फकीरी स्वभाव, स्वाभिमान, कला के प्रति उनकी अनन्य भक्ति और समर्पण ने प्रभावित किया है। वे अपने जीवन में अपने मज़हब के प्रति अत्यधिक समर्पित होते हुए भी किसी धर्म और जाति की संकीर्णताओं में नहीं बँधे थे। सच्चे मुसलमान होते हुए काशी के बाबा विश्वनाथ और बालाजी के प्रति श्रद्धा रखना उनके व्यक्तित्व की अन्यतम विशेषता थी। भारतरत्न जैसी सम्मानित उपाधि प्राप्त करने के उपरांत भी उनके व्यक्तित्व में विनम्रता की पराकाष्ठा देखी जा सकती थी। उन्होंने हमेशा अपने गायन को अपूर्ण माना तथा सदैव अच्छे से अच्छे सुर की प्राप्ति की आकांक्षा की। काशी के प्रति उनके मन में अपार श्रद्धा थी। वे काशी को अपने लिए जन्नत मानते थे। वे धुन के पक्के थे तथा अथक परिश्रम को अपने जीवन का आधार मानते थे। उनके जीवन की ऐसी अनेक विशेषताएँ हैं, जो हमें प्रभावित करती हैं।
प्रश्न 11.
मुहर्रम से बिस्मिल्ला खाँ के जुड़ाव को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
मुहर्रम से बिस्मिल्ला खाँ का गहरा संबंध था। मुहर्रम के महीने में बिस्मिल्ला खाँ और उनका पूरा खानदान शिया मुसलमान हज़रत इमाम हुसैन एवं उनके वंशजों के प्रति शोक प्रकट करता था। यह शोक दस दिन तक चलता था। उनके खानदान में कोई भी व्यक्ति मुहर्रम के दिनों में न तो शहनाई बजाता था और न ही संगीत के किसी कार्यक्रम में शामिल होता था। मुहर्रम की आठवीं तारीख उनके लिए विशेष महत्त्व रखती थी। इस दिन खाँ साहब खड़े होकर शहनाई बजाते थे। वे करीब आठ किलोमीटर पैदल रोते हुए नौहा बजाते चलते थे। इस दिन कोई राग नहीं बजाया जाता था।
प्रश्न 12.
“नौबतखाने में इबादत' शीर्षक का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘नौबतखाने' का अर्थ है- प्रवेश द्वार के ऊपर मंगल ध्वनि बजाने का स्थान और इबादत का अर्थ है- उपासना। काशी में पंचगंगा घाट स्थित बाला जी के मंदिर की ड्योढ़ी थी। ड्योढ़ी के नौबतखाने में बिस्मिल्ला खाँ बचपन से शहनाई बजाया करते थे। उनके हर दिन की शुरुआत इस ड्योढ़ी से हुआ करती थी। उनके अब्बाजान भी यहीं ड्योढ़ी पर शहनाई बजाते थे। नौबतखाने में इबादत उनके जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग था। शहनाई का रियाज़ और सच्चे सुर की पकड़ का अभ्यास यहीं से हुआ था। उनकी यह इबादत केवल शहनाई बजाने तक सीमित नहीं थी, अपितु उनकी धार्मिक उदारता को भी प्रकट करती थी। पाँचों वक्त की नमाज़ पढ़ने वाले बिस्मिल्ला खाँ की बालाजी, विश्वनाथ एवं संकटमोचन पर गहरी आस्था थी। इस प्रकार 'नौबतखाने में इबादत' शीर्षक बिस्मिल्ला की शहनाई वादन कला और उनकी गहरी आस्था को प्रकट करता है।
प्रश्न 13.
‘नौबतखाने में इबादत' पाठ के आधार पर उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का प्रारंभिक परिचय देते हुए बताइए कि उनमें संगीत के प्रति आसक्ति किनके गायन और संगीत को सुनकर हुई थी?
उत्तर:
उस्ताद बिस्मिल्ला खां सुप्रसिद्ध शहनाई वादक थे। संगीत में उनकी गहरी आस्था थी। उनका जन्म डुमराँव गाँव (बिहार) में हुआ था। वे बचपन में अपने नाना के घर काशी आ गए थे। उनके दोनों मामा सादिक हुसैन और अलिबख्श देश के जाने माने शहनाई वादक थे। परंतु संगीत के प्रति उनकी आसक्ति जगाई थी दो बहनों- रसूलनवाई और बलूलनबाई के गायन ने। बचपन में बिस्मिल्ला खाँ को नौबतखाने रियाज़ के लिए जाना पड़ता था। वहीं जाने का रास्ता उन दोनों बहनों के यहाँ से होकर जाता था। रास्ते में ही कितनी तरह के बोल-बनाव, कभी ठुमरी, कभी टप्पे, दादरा आदि सुन-सुन कर उन्हें भी संगीत के प्रति आसक्ति जागृत हुई।
Good
ReplyDeleteSir,u r great the best part of your lecture is that u focus on key words and theme of ch not just reading of ch just like other hindi teachers. 😊 Wish u a very hpy life sir
ReplyDeleteMadarchod hai tu teri behan ke chut me mera lauda khused duga.
DeleteUkr
ReplyDeletePyq
ReplyDeleteKhan sahab shehnai baja gaye lekin ab Boards wale hamari bajane me lage hai 😢
ReplyDeleteThank you sir
ReplyDeletesir ek grammar ka full video dal dijiyega 21 feb ko hindi ka exam hai
ReplyDeleteGoooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooood
ReplyDeleteThanks sir🥰
ReplyDeleteSir thank you for this kecture
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