संस्कृति (पठित गद्यांश)

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संस्कृति (पठित गद्यांश)






गद्यांश पर आधारित प्रश्न
प्रश्न 1. निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

संस्कृति के नाम से जिस कूड़े-करकट के ढेर का बोध होता है, वह न संस्कृति है न रक्षणीय वस्तु। क्षण-क्षण परिवर्तन होने वाले संसार में किसी भी चीज़ को पकड़कर बैठा नहीं जा सकता। मानव ने जब-जब प्रज्ञा और मैत्री भाव से किसी नए तथ्य का दर्शन किया है तो उसने कोई वस्तु नहीं देखी है, जिसकी रक्षा के लिए दलबंदियों की ज़रूरत है। मानव संस्कृति एक अविभाज्य वस्तु है और उसमें जितना अंश कल्याण का है, वह अकल्याणकर की अपेक्षा श्रेष्ठ ही नहीं, स्थायी भी है।

(क) लेखक ने किस संस्कृति को संस्कृति नहीं माना है और क्यों?
(ख) प्रज्ञा और मैत्री भाव किस नए तथ्य के दर्शन करवा सकता है और उसकी क्या विशेषता है।
(ग) मानव संस्कृति की विशेषता लिखिए।

उत्तर:
(क) आजकल संस्कृति के नाम पर जिस कूड़े-करकट के ढेर का बोध होता है उसे लेखक ने संस्कृति नहीं माना है क्योंकि संस्कृति एक अविभाज्य वस्तु है और इसमें कल्याण का अंश है, जबकि आजकल की संस्कृति अकल्याणकारी व दलबंदियों पर टिकी है।

(ख) प्रज्ञा और मैत्री भाव किसी नए तथ्य का दर्शन करा सकता है, जिसने ऐसी कोई वस्तु नहीं देखी है, जिसकी रक्षा के लिए दलबंदियों की ज़रूरत हो। प्रज्ञा जिस संस्कृति के दर्शन कराती है, वह अविभाज्य है।

(ग) मानव संस्कृति एक अविभाज्य वस्तु है वह अकल्याणकर की अपेक्षा श्रेष्ठ ही नहीं, स्थायी भी है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

पेट भरने और तन ढकने की इच्छा मनुष्य की संस्कृति की जननी नहीं है। पेट भरा और तन ढका होने पर भी ऐसा मानव जो वास्तव में संस्कृत है, निठल्ला नहीं बैठ सकता। हमारी सभ्यता का एक बड़ा अंश हमें ऐसे संस्कृत आदमियों से ही मिला है, जिनकी चेतना पर स्थूल भौतिक कारणों का प्रभाव प्रधान रहा है, किंतु उसका कुछ हिस्सा हमें मनीषियों से भी मिला है, जिन्होंने तथ्य-विशेष को किसी भौतिक प्रेरणा के वशीभूत होकर नहीं, बल्कि उनके अपने अंदर की सहज संस्कृति के ही कारण प्राप्त किया है। रात के तारों को देखकर न सो सकने वाला मनीषी हमारे आज के ज्ञान का ऐसा ही प्रथम पुरस्कर्ता था।

(क) संस्कृत व्यक्ति की कौन-सी विशेषताएँ बताई गई हैं।
(ख) रात के तारों को देखकर न सो सकने वाले मनीषी को प्रथम पुरस्कर्ता क्यों कहा गया है?
(ग) पेट भरना या तन ढंकना मनुष्य की संस्कृति की जननी क्यों नहीं है?

उत्तर: 
(क) संस्कृत व्यक्ति कभी खाली नहीं बैठता। वह सदा अपनी बुद्धि व विवेक के द्वारा नए अनुसंधान व खोजों में लगा रहता है। अपनी योग्यता के बल पर वह नई खोजों का आविष्कार कर संस्कृत व्यक्ति कहलाता है।

(ख) रात के तारों को देखकर न सो सकने वाले मनीषी को प्रथम पुरस्कर्ता इसलिए कहा गया है क्योंकि पेट भरा व तन ढका होने के बाद भी वह निठल्ला नहीं बैठा और तारों भरे मोती के थाल के रहस्य को जानने में लगा रहा अर्थात नए आविष्कारों के अनुसंधान में लगा रहा।

(ग) पेट भरना या तन ढकना मनुष्य की संस्कृति की जननी नहीं है क्योंकि यह ज्ञान तो मनुष्य को अपने पूर्वजों से मिला है, जबकि संस्कृत व्यक्ति तो किसी नए ज्ञान की खोज करता है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

और सभ्यता ? सभ्यता है संस्कृति का परिणाम। हमारे खाने-पीने के तरीके, हमारे ओढ़ने-पहनने के तरीके, हमारे गमनागमन के साधन, हमारे परस्पर कट-मरने के तरीके; सब हमारी सभ्यता हैं। मानव की जो योग्यता उससे आत्म-विनाश के साधनों का आविष्कार कराती है, हम उसे उसकी संस्कृति कहें या असंस्कृति? और जिन साधना के बल पर वह दिन-रात आत्म-विनाश में जुटा हुआ है, उन्हें हम उसकी सभ्यता कहें या असभ्यता? संस्कृति का यदि कल्याण की भावना से नाता टूट जाएगा तो वह असंस्कृति होकर ही रहेगी और ऐसी संस्कृति का अवश्यंभावी परिणाम असभ्यता के अतिरिक्त दूसरा क्या होगा?

(क) सभ्यता को संस्कृति का परिणाम क्यों कहा गया है?
(ख) आत्म-विनाश के साधनों का आविष्कार कराने की मानव की योग्यता को हम उसकी संस्कृति कहें या असंस्कृति? ऐसा क्यों?
(ग) कल्याण-भाव से रहित संस्कृति का क्या परिणाम होगा?

उत्तर:
(क) सभ्यता को संस्कृति का परिणाम इसलिए कहा है क्योंकि सभ्यता संस्कृति से उत्पन्न होती है। संस्कृति आविष्कार का मानव कल्याण करती है और सभ्यता संस्कृति से खान-पान, व्यवहार व जीवन जीने की कला सीखाती है।

(ख) जब मानव का ज्ञान आत्मविनाश के साधनों का आविष्कार करने लगता है, तब यह संस्कृति न रहकर असंस्कृति बन जाता है क्योंकि संस्कृति मानव कल्याण से जुड़ी है और जो आविष्कार मानव का अहित करें व संस्कृति नहीं हो सकता।

(ग) कल्याण-भाव से रहित संस्कृति विनाशकारी सभ्यता को जन्म देगी और असंस्कृति कहलाएगी, जिससे मानवता खतरे में पड़ जाएगी।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

जिस योग्यता, प्रवृत्ति अथवा प्रेरणा के बल पर आग का व सुई-धागे का आविष्कार हुआ, वह है, व्यक्तिविशेष की संस्कृति; और उस संस्कृति द्वारा जो आविष्कार हुआ, जो चीज़ उसने अपने तथा दूसरों के लिए आविष्कृत की उसका नाम है- सभ्यता। जिस व्यक्ति में पहली चीज़, जितनी अधिक व जैसी परिष्कृत मात्रा में होगी, वह व्यक्ति उतना ही अधिक व वैसा ही परिष्कृत आविष्कर्ता होगा।

(क) आग और सुई-धागे के आविष्कार के प्रेरक कारण क्या माने गए हैं?
(ख) लेखक संस्कृति और सभ्यता की क्या पहचान बताता है?
(ग) परिष्कृत आविष्कर्ता में कौन-सा गुण अपेक्षित है और क्यों?

उत्तर:
(क) आग और सुई के आविष्कार का प्रेरक कारण मुख्य रूप से मनुष्य की आवश्यकता रहा है क्योंकि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है। भोजन को पकाकर खाना, शीतोष्ण से बचना आदि आग के आविष्कार के प्रेरक कारण रहे हैं। इसी क्रम में तन को ढकने और शरीर को सजाने की प्रवृत्ति ने सुई-धागे का आविष्कार किया और उसके प्रेरक कारण बने।

(ख) व्यक्ति की योग्यता, प्रवृत्ति अथवा प्रेरणा संस्कृति है, जिसके बल पर वह आविष्कार करता है, जबकि उसके द्वारा अपने लिए तथा दूसरों के लिए किया गया आविष्कार सभ्यता है। आग व सुई-धागे का आविष्कार व्यक्ति विशेष की संस्कृति है और जो चीज़ उसने अपने तथा दूसरों के लिए आविष्कृत की है, उसका नाम सभ्यता है।

(ग) परिष्कृत आविष्कर्ता में सुसंस्कृत होने का गुण अपेक्षित है क्योंकि जो चीज़ जितनी परिष्कृत होगी, अच्छी होगी, उतना ही आविष्कार करने वाले सुसंस्कृत होंगे।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लीखिए-

हमारी समझ में मानव-संस्कृति की जो योग्यता आग व सुई-धागे के आविष्कार कराती है, वह भी संस्कृति है, जो योग्यता तारों की जानकारी कराती है, वह भी है; और जो योग्यता किसी महामानव से सर्वस्व त्याग कराती है, वह भी संस्कृति है। और सभ्यता? सभ्यता है संस्कृति का परिणाम। हमारे खाने-पीने के तरीके, सब हमारी सभ्यता है। मानव की जो योग्यता उससे आत्मविनाश के साधनों का आविष्कार कराती है, हम उसे संस्कृति कहें या असंस्कृति? और जिन साधनों के बल पर वह दिन-रात आत्म-विनाश में जुटा हुआ है, उन्हें हम उसकी सभ्यता समझें या असभ्यता? संस्कृति का यदि कल्याण की भावना से नाता टूट जाएगा तो वह असंस्कृति होकर ही रहेगी और ऐसी संस्कृति का अवश्यंभावी परिणाम असभ्यता के अतिरिक्त दूसरा क्या होगा?

(क) लेखक ने योग्यता के किन-किन रूपों को संस्कृति माना है?
(ख) सभ्यता के विषय में लेखक की धारणा क्या है? वह किसे असभ्यता मानता है?
(ग) लेखक की दृष्टि में संस्कृति का मूल आधार क्या है? उसके अभाव में वह क्या कहलाती है?

उत्तर:
 (क) लेखक ने आवश्यकताजन्य आविष्कार करने की योग्यता को, सुदूर स्थित तारों तथा अन्य खगोलीय पिंडों के बारे में जानकारी प्राप्त करने की योग्यता को तथा सर्वस्व त्याग कर सकने की योग्यता को संस्कृति माना है।

(ख) लेखक संस्कृति के परिणाम को ही सभ्यता मानता है जिसमें हमारे समस्त तौर-तरीके तथा व्यवहार आदि सम्मिलित रहते हैं। लेखक की दृष्टि में अपनी क्षमता का अनुचित उपयोग करना तथा मानव मात्र का हित नहीं, बल्कि अहित सोचना और करना ही असभ्यता है।

(ग) संस्कृति का मूल आधार मानव जाति का कल्याण और विकास है। इन धारणाओं के अभाव में संस्कृति, असंस्कृति और सभ्यता, असभ्यता कहलाती है।


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