कबीर की साखी : सप्रसंग व्याख्या (Kabir Ki Saakhi Class 10 Explanation)
नमस्कार विद्यार्थियों! आज के इस ब्लॉग पोस्ट में हम कक्षा 10वीं हिंदी (स्पर्श भाग-2) के पहले पाठ 'कबीर की साखी' का अध्ययन करेंगे। संत कबीरदास जी की ये साखियाँ हमें जीवन जीने की सही कला, ईश्वर भक्ति और नैतिकता का पाठ पढ़ाती हैं। परीक्षा की दृष्टि से यहाँ हर साखी का शब्दार्थ, प्रसंग, व्याख्या और विशेष विस्तार से दिया गया है।
साखियों का सार (Summary of Kabir Ki Saakhi)
कबीरदास जी अपनी साखियों में कहते हैं कि हमें ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जिससे दूसरों को सुख मिले और हमारा अहंकार भी नष्ट हो। वे बताते हैं कि ईश्वर हमारे हृदय में ही बसते हैं, उन्हें बाहर ढूँढना व्यर्थ है। अहंकार और ईश्वर एक साथ नहीं रह सकते। कबीर निंदा करने वालों को अपने पास रखने की सलाह देते हैं ताकि हम अपने स्वभाव को निर्मल कर सकें। अंत में वे कहते हैं कि किताबी ज्ञान से कोई विद्वान नहीं बनता, बल्कि प्रेम का एक अक्षर पढ़ने वाला ही सच्चा ज्ञानी है।
साखी 1: ऐसी बानी बोलिये...
ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोइ।
अपना तन शीतल करै, औरन को सुख होइ।।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- बानी : बोली / वचन
- आपा : अहंकार / घमंड
- खोइ : त्यागना / खो देना
- शीतल : ठंडा / शांत / प्रसन्न
- औरन : दूसरों को
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत साखी (दोहा) हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य को अपने मन का अहंकार (घमंड) त्यागकर ऐसी विनम्र और मीठी वाणी बोलनी चाहिए, जिससे सुनने वाले को तो सुख और शांति मिले ही, साथ ही साथ बोलने वाले का खुद का शरीर और मन भी शांत (शीतल) रहे। मीठा बोलने से लड़ाई-झगड़े नहीं होते और मन प्रसन्न रहता है।
विशेष (Vishesh):
- 'आपा खोइ' का अर्थ है अहंकार का त्याग करना।
- अनुप्रास अलंकार की छटा है (बानी बोलिये)।
- सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग है।
साखी 2: कस्तूरी कुंडलि बसै...
कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माहि।
ऐसैं घटि-घटि राम है, दुनिया देखै नाहि।।
शब्दार्थ:
- कस्तूरी : एक सुगंधित पदार्थ (Musk)
- कुंडलि : नाभि
- मृग : हिरण
- घटि-घटि : कण-कण में / हर हृदय में
प्रसंग:
प्रस्तुत साखी (दोहा) हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
कबीरदास जी कहते हैं कि जिस प्रकार कस्तूरी नामक सुगंधित पदार्थ हिरण की अपनी ही नाभि (कुंडलि) में होता है, लेकिन हिरण इस बात से अनजान होकर उस सुगंध को पूरे जंगल में ढूँढता फिरता है। ठीक उसी प्रकार, परमात्मा (राम) भी संसार के कण-कण में और हर मनुष्य के हृदय में निवास करते हैं, लेकिन अज्ञानी लोग उन्हें अपने अंदर देखने के बजाय बाहर मंदिरों और तीर्थों में ढूँढते रहते हैं।
विशेष:
- मृग और कस्तूरी का बहुत सुंदर उदाहरण (दृष्टांत अलंकार) दिया गया है।
- 'घटि-घटि' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
साखी 3: जब मैं था तब हरि नहिं...
जब मैं था तब हरि नहिं, अब हरि हैं मैं नाहि।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माहि।।
शब्दार्थ:
- मैं : अहंकार / घमंड (Ego)
- हरि : ईश्वर
- अँधियारा : अज्ञान रूपी अँधेरा
- माहि : अपने अंदर / मन में
प्रसंग:
प्रस्तुत साखी (दोहा) हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
कबीर जी कहते हैं कि जब तक मेरे अंदर 'मैं' (अहंकार) था, तब तक मुझे हरि (ईश्वर) के दर्शन नहीं हुए। अब जब मुझे ईश्वर की प्राप्ति हो गई है, तो मेरे अंदर का अहंकार पूरी तरह मिट गया है। जैसे ही मैंने ज्ञान रूपी दीपक को अपने मन में जलाया, वैसे ही अज्ञानता का सारा अँधेरा मिट गया और मुझे सत्य का ज्ञान हो गया।
विशेष:
- 'दीपक' ज्ञान का और 'अँधियारा' अज्ञान का प्रतीक है (रूपक अलंकार)।
- 'मैं' शब्द का प्रयोग अहंकार के लिए किया गया है।
साखी 4: सुखिया सब संसार है...
सुखिया सब संसार है, खायै अरु सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै।।
शब्दार्थ:
- सुखिया : सुखी
- अरु : और
- सोवै : सोता है (अज्ञान में)
- रोवै : रोता है (प्रभु विरह में)
प्रसंग:
प्रस्तुत साखी (दोहा) हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
कबीरदास जी कहते हैं कि यह सारा संसार सुखी है क्योंकि लोग केवल खाने और सोने (भौतिक सुख-सुविधाओं) में व्यस्त हैं, उन्हें ईश्वर की कोई चिंता नहीं है। लेकिन कबीर दुखी हैं क्योंकि वे जाग रहे हैं (उन्हें ज्ञान है कि जीवन नश्वर है)। वे ईश्वर से बिछड़ने के गम में रो रहे हैं और प्रभु मिलन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सांसारिक लोग अज्ञान में सो रहे हैं, जबकि संत ज्ञान के कारण जाग रहे हैं।
विशेष:
- 'सोना' अज्ञान का और 'जागना' ज्ञान का प्रतीक है।
- सुखिया-दुखिया, जागै-सोवै में विलोम शब्दों का प्रयोग है।
साखी 5: बिरह भुवंगम तन बसै...
बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।
राम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ।।
शब्दार्थ:
- बिरह : बिछड़ने का गम (Separation)
- भुवंगम : साँप (Snake)
- बियोगी : प्रेमी / बिछड़ने वाला
- बौरा : पागल / सुध-बुध खोने वाला
प्रसंग:
प्रस्तुत साखी (दोहा) हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
कबीर कहते हैं कि जब किसी के शरीर में ईश्वर के विरह (जुदाई) रूपी साँप बस जाता है, तो उस पर कोई भी मंत्र या दवा असर नहीं करती। राम (ईश्वर) से बिछड़कर भक्त जीवित नहीं रह पाता, और यदि वह जीवित रह भी जाता है, तो वह पागल (बौरा) जैसा हो जाता है। अर्थात, उसका मन संसार में नहीं लगता, वह बस ईश्वर की याद में डूबा रहता है।
विशेष:
- 'बिरह भुवंगम' में रूपक और अनुप्रास अलंकार है।
- ईश्वर प्रेम की तीव्रता (Intensity) दिखाई गई है।
साखी 6: निंदक नेड़ा राखिये...
निंदक नेड़ा राखिये, आँगणि कुटी बँधाइ।
बिन साबण पाँणी बिना, निर्मल करै सुभाइ।।
शब्दार्थ:
- निंदक : बुराई करने वाला (Critic)
- नेड़ा : निकट / पास
- आँगणि : आँगन में
- साबण : साबुन
- सुभाइ : स्वभाव / चरित्र
प्रसंग:
प्रस्तुत साखी (दोहा) हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
कबीरदास जी कहते हैं कि हमें अपनी निंदा (बुराई) करने वाले व्यक्ति को हमेशा अपने पास (निकट) रखना चाहिए। हो सके तो उसे अपने घर के आँगन में कुटिया बनाकर दे देनी चाहिए। क्योंकि निंदक बिना साबुन और पानी के ही हमारे स्वभाव को निर्मल (साफ) कर देता है। वह हमारी कमियाँ बताता रहता है, जिससे हम उन्हें सुधारकर पवित्र बन जाते हैं।
विशेष:
- 'निंदक नेड़ा' में अनुप्रास अलंकार है।
- विरोधाभास है—बिना पानी-साबुन के सफाई करना।
साखी 7: पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ...
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोइ।
एकै आषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ।।
शब्दार्थ:
- पोथी : मोटी धार्मिक पुस्तकें
- मुआ : मर गया
- आषिर : अक्षर / शब्द
- पीव : प्रियतम / ईश्वर / प्रेम
प्रसंग:
प्रस्तुत साखी (दोहा) हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
कबीर जी किताबी ज्ञान को व्यर्थ बताते हुए कहते हैं कि मोटी-मोटी किताबें पढ़-पढ़कर संसार के कितने ही लोग मर गए (गुजर गए), लेकिन कोई भी सच्चा ज्ञानी (पंडित) नहीं बन सका। जो व्यक्ति ईश्वर प्रेम या मानवता का केवल एक अक्षर भी पढ़ लेता है (अर्थात प्रेम के महत्व को समझ लेता है), वही सच्चा ज्ञानी या पंडित होता है।
विशेष:
- 'पढ़ि-पढ़ि' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
- प्रेम और व्यावहारिकता को शिक्षा से ऊपर माना गया है।
साखी 8: हम घर जाल्या आपणा...
हम घर जाल्या आपणा, लिया मुराड़ा हाथि।
अब घर जालौं तास का, जे चलै हमारे साथि।।
शब्दार्थ:
- जाल्या : जलाया
- आपणा : अपना
- मुराड़ा : जलती हुई लकड़ी / मशाल
- तास का : उसका
प्रसंग:
प्रस्तुत साखी (दोहा) हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या:
कबीरदास जी कहते हैं कि मैंने ज्ञान और भक्ति की जलती हुई मशाल (मुराड़ा) हाथ में लेकर अपने ही हाथों से अपना घर (सांसारिक मोह-माया और अहंकार का घर) जला डाला है। अर्थात मैंने वैराग्य धारण कर लिया है। अब जो भी भक्त मेरे साथ भक्ति के इस मार्ग पर चलना चाहता है, मैं उसका घर भी जला डालूँगा। अर्थात उसे भी अपने मोह-माया और अहंकार का त्याग करना होगा, तभी वह मेरे साथ चल पाएगा।
विशेष:
- 'घर जलाना' एक मुहावरा है जिसका अर्थ है मोह-त्याग करना।
- मस्तमौला और फक्कड़ स्वभाव का परिचय मिलता है।
आशा है कि आपको Class 10 Hindi Kabir Ki Saakhi Explanation का यह लेख उपयोगी लगा होगा। इसे अपने दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें।

Sir aap bahut achha padhate hai thank you for the notes !!
ReplyDeletesir mazza aagya
ReplyDeleteHe is so selfless and provides best education without charges !!
ReplyDeleteTHANK YOU SO MUCH SIRR MARKS MERE ABHI BHI ITNE NI AATEY BUT AAPNE ITNI MEHNTA KARI H WOHI KAAFI HAIN
ReplyDeletefrrrrrr
Deleteim gonna write "hello bacchonn mera naam aashish hai" in my exam
ReplyDeleteno batch , no fees just pure teaching and love for us. TYSM Ashish Sir
ReplyDelete