विद्यापति के पद : सप्रसंग व्याख्या (Vidyapati Ke Pad Class 12 Explanation)
नमस्कार विद्यार्थियों! आज के इस ब्लॉग पोस्ट में हम कक्षा 12वीं हिंदी (अंतरा भाग-2) के पाठ 9 का विस्तृत अध्ययन करेंगे। इसमें 'मैथिल-कोकिल' कहे जाने वाले महाकवि विद्यापति के तीन पद शामिल हैं। इन पदों में कवि ने राधा और कृष्ण के अनूठे प्रेम और वियोग (विरह) का वर्णन अपनी मधुर मैथिली भाषा में किया है।
पदों का सार (Summary)
पहला पद: राधा श्री कृष्ण के वियोग में दुखी हैं। कृष्ण गोकुल छोड़कर मथुरा चले गए हैं। सावन का महीना आ गया है और राधा अपनी सखियों से पूछती हैं कि उनका पत्र (प्रेम संदेश) लेकर प्रियतम के पास कौन जाएगा?
दूसरा पद: राधा अपनी सखी को बताती हैं कि प्रेम का अनुभव शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। सच्चा प्रेम वही है जो हर पल नया लगे। जन्मों-जन्मों तक देखने के बाद भी आँखों की प्यास नहीं बुझती।
तीसरा पद: विरह में राधा की शारीरिक दशा इतनी खराब हो गई है कि वह खिले हुए फूलों को देखकर अपनी आँखें बंद कर लेती हैं। वह इतनी कमजोर हो गई हैं कि धरती पर बैठ जाएं तो बिना सहारे के उठ भी नहीं पातीं।
पद 1: के पतिया लय जायत रे...
के पतिया लए जाएत रे, मोरा पिअतम पास।
हिए नहि सहए असह दुख रे, भेल साओन मास।।
एकसरि भवन पिआ बिनु रे, मोहि रहलो न जाए।
सखि अनकर दुख दारुन रे, जग के पतिआए।।
मोर मन हरि हर लए गेल रे, अपनो मन गेल।
गोकुल तेजि मधुपुर बस रे, कन अपजस लेल।।
विद्यापति कवि गाओल रे, धनि धरु मन आस।
आओत तोर मन भावन रे, एहि कातिक मास।।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- पतिया : पत्र / चिट्ठी
- लए जाएत : ले जाएगा
- पिअतम : प्रियतम (कृष्ण)
- भेल : हो गया / आ गया
- साओन : सावन का महीना
- एकसरि : अकेली
- अनकर : दूसरों का
- पतिआए : विश्वास करे
- हरि : कृष्ण / हरने वाला
- तेजि : त्यागकर / छोड़कर
- मधुपुर : मथुरा
- अपजस : अपयश / बदनामी
- धनि : स्त्री (राधा)
- कातिक : कार्तिक मास
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
राधा कहती हैं— "हे सखी! ऐसा कौन है जो मेरा पत्र (प्रेम संदेश) लेकर मेरे प्रियतम (कृष्ण) के पास जाएगा? सावन का महीना आ गया है और मेरा हृदय इस असहनीय दुख को सह नहीं पा रहा है।
इस भरे-पूरे भवन (घर) में मैं पिया के बिना बिल्कुल अकेली हूँ, अब मुझसे यहाँ रहा नहीं जाता। हे सखी! इस दुनिया में दूसरों के दारुण (भयानक) दुख को कोई नहीं समझता, भला मेरे दुख पर कौन विश्वास (पतिआए) करेगा?
मेरे मन को हरि (कृष्ण) हर कर ले गए हैं और साथ में मेरा अपना मन भी ले गए हैं (अब मेरा मन मेरे पास नहीं है)। वे गोकुल छोड़कर मथुरा (मधुपुर) में जा बसे हैं, उन्होंने (प्रेमिका को छोड़ने का) यह कैसा अपयश ले लिया है?
अंत में कवि विद्यापति कहते हैं— "हे सुंदरी (धनि)! तुम अपने मन में धीरज (आशा) रखो। तुम्हारे मन को भाने वाले (कृष्ण) इसी कार्तिक के महीने में अवश्य आएँगे।"
विशेष (Vishesh):
- वियोग श्रृंगार रस का वर्णन है।
- भाषा: मधुर मैथिली है।
- 'सावन' उद्दीपन विभाव (दुख बढ़ाने वाला) के रूप में आया है।
- 'हरि हर लए गेल' में यमक अलंकार है।
पद 2: सखि हे, कि पूछसि अनुभव मोए...
सखि हे, कि पूछसि अनुभव मोए।
सेह पिरिति अनुराग बखानिअ तिल तिल नूतन होए।।
जनम अबधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल।।
सेहो मधुर बोल स्रवनहिं सूनल स्रुति पथ परस न गेल।।
कत मधु-जामिनि रभस गमाओलि न बूझल कइसन केलि।।
लाख लाख जुग हिअ हिअ राखल तइओ हिअ जरनि न गेल।।
कत विदगध जन रस अनुमोदए अनुभव काहु न पेख।।
विद्यापति कह प्रान जुड़ाइते लाखे न मीलल एक।।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- पिरिति : प्रीत / प्रेम
- बखानिअ : वर्णन करना / बखान करना
- नूतन : नया
- निहारल : देखा
- तिरपित : तृप्त / संतुष्ट
- स्रवनहिं : कानों में
- परस : स्पर्श
- मधु-जामिनि : मधुर रात्रियाँ (मिलन की रातें)
- रभस : रमण / आनंद (संभोग)
- केलि : क्रीड़ा / खेल
- जुग : युग
- जरनि : जलन / तड़प
- विद्गध : विद्वान / रसिक
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
राधा कहती हैं— "हे सखी! तुम मुझसे मेरे प्रेम का अनुभव क्या पूछती हो? प्रेम (प्रीति) का वर्णन तो किया ही नहीं जा सकता। सच्चा प्रेम (अनुराग) वही है जो हर पल (तिल-तिल) नया महसूस हो।
मैंने जन्म भर (जीवन भर) अपनी आँखों से उनके (कृष्ण के) रूप को निहारा है, फिर भी मेरी आँखें तृप्त नहीं हुईं (प्यास नहीं बुझी)। मैंने कानों से उनकी मीठी बातें सुनी हैं, फिर भी कानों को लगता है कि अभी पूरी तरह सुना ही नहीं (स्पर्श नहीं हुआ)।
कितनी ही मधुर मिलन की रातें (मधु-जामिनि) हमने आनंद (रभस) में बिता दीं, फिर भी मुझे यह समझ नहीं आया कि वह प्रेम-क्रीड़ा (केलि) कैसी थी (उसका अंत नहीं हुआ)।
लाखों युगों तक मैंने उन्हें अपने हृदय में बसाकर रखा, फिर भी मेरे हृदय की जलन (मिलने की तड़प) शांत नहीं हुई।
कितने ही रसिक और विद्वान लोग (विद्गध जन) प्रेम का अनुभव करते हैं, लेकिन उसका सच्चा अनुभव कोई नहीं देख पाया।
अंत में विद्यापति कहते हैं कि इस संसार में लाखों में कोई एक भी ऐसा नहीं मिला जो यह कह सके कि उसका प्राण प्रेम में पूरी तरह तृप्त (जुड़ा) गया है (प्रेम अतृप्ति का ही नाम है)।"
विशेष (Vishesh):
- अतिशयोक्ति अलंकार: 'लाख-लाख जुग' (लाखों युगों तक)।
- पुनरुक्ति प्रकाश: 'तिल-तिल', 'लाख-लाख'।
- प्रेम की परिभाषा दी गई है— "नित्य नूतन" (Always New)।
पद 3: कुसुमित कानन हेरि कमलमुखि...
कुसुमित कानन हेरि कमलमुखि, मूदि रहए दु नयन।
कोकिल-कलरव, मधुकर-धुनि सुनि, कर दे झाँपइ कान।।
माधव, सुन-सुन बचन हमारा।
तुअ गुन सुंदरि अति भेल दूबनि, गुनि-गुनि प्रेम तोहारा।।
धरनी धरि धनि कत बेरि बइसइ, पुनि तहि उठइ न पारा।
कातर दिठि करि, चौदिस हेरि-हेरि, नयन गरए जल-धारा।।
तोहर बिरह दिन छन-छन तनु छिन, चौदसि-चाँद-समान।
भनइ विद्यापति सिबसिंह नर-पति, लखिमादेइ-रमान।।
शब्दार्थ (Word Meanings):
- कुसुमित कानन : फूलों से भरा जंगल
- हेरि : देखकर
- कमलमुखि : कमल जैसे मुख वाली (राधा)
- मूदि : बंद करना
- कलरव : पक्षियों की आवाज
- झाँपइ : ढक लेना / बंद करना
- दूबनि : दुबली / कमजोर
- धरनी : धरती
- बइसइ : बैठती है
- कातर दिठि : दीन (दुखी) नजरों से
- तनु छिन : शरीर क्षीण (कमजोर) होना
- लखिमादेइ : राजा शिवसिंह की रानी लखिमा देवी
प्रसंग (Context):
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक
व्याख्या (Explanation):
सखी कृष्ण से कहती है— "हे माधव! हमारी बात सुनो। वह कमलमुखी (राधा) फूलों से भरे हुए वन को देखकर अपनी दोनों आँखें बंद कर लेती है (क्योंकि वह दृश्य उसे तुम्हारे साथ बिताए पलों की याद दिलाकर दुख देता है)। कोयल की कूक और भंवरों की गुंजन सुनकर वह अपने कानों को हाथों से ढक लेती है (उसे यह शोर अच्छा नहीं लगता)।
तुम्हारे गुणों और प्रेम को याद कर-करके (गुनि-गुनि) वह सुंदरी बहुत दुबली (दूबनि) हो गई है। वह इतनी कमजोर हो गई है कि जब धरती पर बैठती है, तो दोबारा उठ नहीं पाती।
वह कातर (बेबस) नजरों से चारों दिशाओं में तुम्हें ढूँढती है (हेरि-हेरि) और जब तुम नहीं मिलते, तो उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगती है।
तुम्हारे विरह में उसका शरीर दिन-प्रतिदिन और क्षण-क्षण वैसे ही क्षीण (कमजोर/पतला) होता जा रहा है, जैसे शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के बाद चौदस का चाँद घटता जाता है।
कवि विद्यापति कहते हैं कि यह दशा राजा शिवसिंह और उनकी रानी लखिमा देवी जानते हैं (वे रसिक हैं)।"
विशेष (Vishesh):
- उपमा अलंकार: 'चौदसि चाँद समान' (राधा की क्षीणता की तुलना घटते चाँद से की गई है)।
- 'गुनि-गुनि', 'हेरि-हेरि' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
- प्रकृति का उद्दीपन रूप (Stimulating nature) में चित्रण है।
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